जेम्स वेब टेलिस्कोप की अहमियत - तर्कशील भारत

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Tuesday, December 21, 2021

जेम्स वेब टेलिस्कोप की अहमियत

 सदियों से हम यह मानते आये थे कि हमारी कायनात में सूरज चांद और धरती के अलावा चन्द सितारे हैं जो रात के आकाश में टिमटिमाते हैं 16वी सदी तक यही यूनिवर्स के बारे में हमारी समझ थी 1609 में पहली बार गेलिलियो ने अपने 3 बाई 8 के टेलिस्कोप का रुख रात के आसमान की ओर किया और पाया कि जुगनुओं की तरह रात के आकाश में टिमटिमाते से दिखने वाले सितारों का भी अपना एक संसार है उन्होंने जुपिटर पर फोकस किया और उसके चार चंद्रमाओं को खोज निकाला यहीं से अंतरिक्ष के बारे में इंसानी जिज्ञासाओं को जैसे पंख लग गए यह एस्ट्रोनॉमिकल रेवोल्यूशन की शुरुआत थी और दुनिया को दूरबीन की असली कीमत का अंदाजा भी गेलिलियो की वजह से ही हुआ.


गेलिलियो ने जब बताया कि हमारी धरती यूनिवर्स के सेंटर में नहीं बल्कि यह दूसरे कई प्लेनेट्स की तरह ही एक ग्रह है जो सूरज का चक्कर लगाती है तब गेलिलियो की इस बात को कोई नहीं समझा लेकिन गेलिलियो दुनिया को यह समझाने में कामयाब हुए थे कि आकाश में ऐसी चीजें भी मौजूद हैं जिन्हें केवल दूरबीन से ही देखा जा सकता है.

इसी वजह से हर दौर में दूरबीनें एडवांस्ड होती गईं और इन दूरबीनों की देखने की सीमाओं के साथ ही यूनिवर्स का विस्तार भी लगातार होता गया कभी सौरमण्डल को ही यूनिवर्स समझा जाता था लेकिन दूरबीन की आंखों से हमने देखा कि हमारा सौरमण्डल तो हमारी आकाशगंगा का एक मामूली जर्रा भर ही है 20 वी सदी तक हमारी कायनात हमारी आकाशगंगा की जद तक ही समाई थी लेकिन आकाशगंगा भी हमारी कायनात में जर्रे की औकात रखती है यह हमने पिछली सदी की दूरबीनों के जरिये ही जाना.

1990 में जब हब्बल टेलिस्कोप को स्पेस में भेजा गया तब तक हमे यूनिवर्स के विस्तार के बारे में ज्यादा कुछ अंदाजा नहीं था केवल थ्योरीज के आधार पर हम कायनात का अंदाजा लगा रहे थे लेकिन हब्बल डीप फील्ड में तैरती आकाशगंगाओं को देखकर हमने जाना कि यूनिवर्स में हमारी असली औकात क्या है ?

हब्बल ने यूनिवर्स के अंधेरे कोनों की एक से बढ़कर एक हैरतअंगेज तस्वीरें ली हैं लेकिन हब्बल की एक तस्वीर ने दुनिया को सबसे ज्यादा हैरान किया वो है हब्बल डीप फील्ड. 

धरती की दूरबीनों से जो जगह शून्य दिखाई दे रही थी उस सुनी जगह पर हमें हब्बल टेलिस्कोप के जरिये ही एक विशाल संसार मिला 

इस तस्वीर पर गौर करें 1995 में हब्बल टेलिस्कोप द्वारा ली गई यह तस्वीर एक रुपये के सिक्के के दसवें हिस्से के बराबर के जगह की है हब्बल की इस पिक्चर में यूनिवर्स के इतने छोटे से हिस्से में भी सैंकड़ों आकाशगंगाएं नजर आ रही हैं कायनात में हम कितने छोटे हैं इस तस्वीर से इस बात का अंदाजा तो होता ही है साथ ही हमें यह भी अंदाजा हो जाता है कि मानवता के लिए हब्बल जैसी दूरबीनों की अहमियत कितनी बड़ी है.

जब हम पिछले 35 सालों के दरम्यान हब्बल के महान काम को देखते हैं तब हमें जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की जरूरत महसूस होती है क्योंकि हब्बल पुराना हो चुका है इसकी मियाद भी अब खत्म होने वाली है यूनिवर्स में अरबों प्रकाशवर्ष के फासले को छू लेने के बावजूद वह बिगबैंग की शुरुआती आकाशगंगाओं की पड़ताल करने के काबिल नहीं है इसी वजह से हमें अगली पीढ़ी की दूरबीन की जरूरत है जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप हब्बल के काम को नई ऊंचाइयां दे सकता है साथ ही नई पीढ़ी का यह टेलीस्कोप हमें उन सवालों के जवाब भी दे सकता है जो हब्बल ने पैदा किये हैं.

हब्बल टेलिस्कोप का लेंस 2.4 मीटर का है इसके मुकाबले जेम्स वेब टेलिस्कोप का लेंस 6.5 मीटर है इसी बात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मानवता के लिए यह प्रोजेक्ट कितना जरूरी है ? किसी भी टेलिस्कोप का मिरर जितना बड़ा होता है वो उतना ही ज्यादा लाइट को कैप्चर करने के काबिल होता है इस हिसाब से जेम्स वेब हब्बल के मुकाबले साढ़े पांच गुना ज्यादा लाइट कैप्चर कर सकता है दोनों दूरबीनों में दूसरा सबसे बड़ा अंतर यह है कि हब्बल ऑप्टिकल दूरबीन है यूँ समझिए कि अंतरिक्ष मे बड़ी सी आंख लेकिन नई पीढ़ी की जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप ऑप्टिकल दूरबीन नहीं है यह पूरी तरह इंफ्रारेड तकनीक पर आधारित है ऑप्टिकल होने की वजह से हब्बल टेलीस्कोप जिन शुरुआती आकाशगंगाओं को ऑब्जर्व करने में सक्षम नहीं है इंफ्रारेड के जरिये जेम्स वेब उन्हें ढूंढ सकता है और यह पता लगा सकता है की शुरुआती आकाशगंगाओं का निर्माण कैसे हुआ ?

जेम्स वेब टेलिस्कोप को बनाने का काम 1996 मे शुरू हो चुका था लेकिन तब इतने बड़े मिरर को अंतरिक्ष मे ले जाने की टेक्नोलॉजी नासा के पास नहीं थी मिरर को फोल्ड कर स्पेस में ले जाना बहुत बड़ी चुनौती का काम है इसके मिरर बेरिलियम के बने हैं बेरिलियम बहुत हल्का होने का साथ ही बहुत कठोर भी होता है जिससे इस पर स्क्रेच लगने का खतरा नही है इसकी प्लेटों पर हल्की सी सोने की परत भी मौजूद है जिससे मिरर की उम्र बढ़ सके. 

इसके साथ ही इस पर एक बड़ी सी सनशील्ड भी लगी है जो सूरज से निकलने वाले इंफ्रारेड रेडिएशन को ब्लॉक कर सके ताकि इसका लेंस ठीक से काम कर सकें.

जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप के लेंस तो फोल्ड होंगे ही साथ ही इसकी यह शील्ड भी फोल्ड होगी और इस विशाल दूरबीन को इस यूरोपियन रॉकेट में फिट कर स्पेस में धरती से 15 लाख किलोमीटर दूर भेज दिया जाएगा हब्बल महज 2 सौ किलोमीटर ऊपर पृथ्वी के ऑर्बिट में मौजूद है जहां से उसे मरम्मत करना आसान है लेकिन धरती से 15 लाख किलोमीटर दूर के ऑर्बिट में होने की वजह से कोई गड़बड़ होने पर उस तक पहुंचना नामुमकिन है इसी वजह से 2007 में लांच होने वाला यह टेलिस्कोप अब 2021 में जाकर लॉन्च हो रहा है कोई भी गड़बड़ होने की मामूली संभावनाओं को भी दुरुस्त करने के बाद 22 दिसम्बर को इसे लॉन्च करने की फाइनल डेट नासा ने अनाउंस कर दी है.

धरती से 15 लाख किलोमीटर की ऑर्बिट तक पहुंचने में इस दूरबीन को तकरीबन एक महीना लग जायेगा वहां पहुंचने के बाद इसकी सनशील्ड खुलनी शुरू होगी और इसके कैमरे भी काम करना शुरू कर देंगे मामूली चूक होने पर ही यह दस अरब डॉलर की दूरबीन स्पेस में कूड़ा बन कर रह जाएगा?

शुरुआती आकाशगंगाओं को ढूंढने के साथ ही इस टेलीस्कोप का दूसरा सबसे अहम काम है एक्सोप्लेनेट्स कि खोज किसी एक्सोप्लेनेट को उसके सूरज की लाइट में आई मामूली कमी के आधार पर ऑब्जर्व किया जाता है जब भी किसी सितारे की ऑर्बिट में कोई प्लेनेट उसके चक्कर लगाता है उस सितारे की रोशनी में मामूली कमी नजर आती है इसी मेथड से तकरीबन 4 हजार ग्रहों को ढूंढा गया है जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप एक्सोप्लेनेट्स की खोज में क्रांति ला सकता है क्योंकि यह टेलिस्कोप बड़ी ही बारीकी से यह काम कर सकता है साथ ही यह किसी ग्रह के एटमॉस्फियर में मौजूद गैसों को भी ऑब्जर्व कर सकता है जिससे धरती जैसे ग्रहों की तलाश और भी आसान हो जाएगी.

गेलिलियो के बाद हर सदी में एडवांस्ड होती दूरबीनों ने पिछली जिज्ञासाओं को शांत किया लेकिन हर बार नए सवालों को पैदा भी किया हब्बल टेलिस्कोप के साथ भी यही हुआ हब्बल ने कई पुरानी कहकशाओं को खोजा हब्बल और केप्लर ने मिलकर तकरीबन 4 हजार ग्रहों के वजूद के सबूत दिए लेकिन बीसवीं सदी की इन दूरबीनों की भी अपनी सीमाएं हैं जिसकी वजह से इनकी तमाम उपलब्धियों के बावजूद कई सवाल अनसुलझे ही रह गए हैं इसी वजह से हमें 21वी सदी की जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप की जरूरत है जो हमें उन सवालों के जवाब दे सके जो बीसवीं सदी की दूरबीनें न दे पाई थीं.

हमारी कायनात कैसे वजूद में आई ? बिगबैंग क्यों हुआ बिगबैंग के वक्त क्या हुआ ? क्या कायनात में हम अकेले हैं आज के समय मे एस्ट्रोनॉमी के सबसे बड़े सवाल यही है जो 4 हजार ग्रह खोजे गए हैं उनमें 10 प्रतिशत से ज्यादा प्लेनेट्स हमारी धरती की तरह ही अपने सूर्य के हेबिटेबल जोन में मौजूद हैं लेकिन इतनी जानकारी होने के बावजूद हम यह नहीं जानते कि उन ग्रहों पर पानी है ? क्या वहां जीवन पनपने की संभावनाएं मौजूद हैं ? क्या किसी ग्रह पर बुद्धिमान सभ्यताएं भी हो सकती हैं ? जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप शायद हमारे इन सभी प्रश्नों के जवाब न दे पाए लेकिन इतना तो जरूर है कि इस दूरबीन के जरिये हमारे कई अनसुलझे प्रश्नों का जवाब तो मिल ही जायेगा.

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