बिहार और बाढ़ - तर्कशील भारत

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Thursday, September 23, 2021

बिहार और बाढ़

 जहां हर साल 

डूब जाता है सबकुछ 

जमीन ख्वाब जिंदगी 

के साथ ही 

डूब जाता है लोकतंत्र

और लोकतंत्र के डूबते ही

डूब जाती है 

प्रस्तावना में लिखी वो तमाम बातें 

जो हमें 

नागरिक होने का एहसास देती है


जहां हर साल 

डूब जाता है सबकुछ

चूल्हा अनाज 

और फसल के साथ ही

डूब जाती है किस्मत

और किस्मत के डूबते ही 

डूब जाती है

हाथों की वो चन्द लकीरें

जो हमें

भाग्यशाली होने का 

एहसास देती हैं


डूबी हुई फसलों में

किस्मत को खोज रहे 

किसान का 

और भी बहुत कुछ 

पानी मे डूब जाता है

आंगन धूप और भीत 

रस्म रिवाज और रीत 


बिहार की इस बाढ़ में 

जनता का ही 

सबकुछ नहीं डूबता

सरकारों की 

बेशकीमती योजनाएं भी 

बाढ़ के पानी मे डूब जाती हैं 

सारा जल 

नल से निकल कर

नली से होते हुए 

गली में बह जाता है 

और बाढ़ के उतरने तक

टँकी पाइप 

और नल ही बाकी रह जाता है


बाढ़ के इस पानी मे

देवालय शौचालय विद्यालय 

संलग्न हो जाता है 

और सड़क विधानसभा सचिवालय

जलमग्न हो जाता है


कस्बे डूब जाते हैं

गांव डूब जाते है

दरख्त डूब जाते हैं

छांव डूब जाते है

रास्ते डूब जाते हैं 

और इन रास्तों पर

चलने वाले 

पाँव डूब जाते हैं


आम आदमी के ख्वाब

और उन ख्वाबों में देखी गई

भविष्य की 

सुनहरी तस्वीरों के साथ ही

पुआल पर बिछी वो गुदड़ी भी

बाढ़ में डूब जाती है

जिस पर लेट कर 

उसकी कई पीढ़ियों ने

भविष्य के सुनहरे 

ख्वाब पाले थे


आम आदमी के

सर के ऊपर का बोझा और

और उस बोझे को रखने की 

जगह के साथ ही

पैरों के नीचे की जमीन, 

और उस जमीन पर खड़ी

आदिम युग की उसकी 

वह फूस की इमारत 

भी डूब जाती है 

जिसकी नींव में

उसकी सैंकड़ों पीढ़ियों का 

दर्द शामिल था


लेकिन 

इस भयंकर बाढ़ में

आम आदमी के पास

कुछ ऐसी अदभुत चीजें होती हैं 

जो कभी नहीं डूबती


आदमी और उसकी परेशानियां

बुजुर्गों के संघर्षों की कहानियां 

पाषाण काल के बचे खुचे बर्तन और

इतिहास की धूमिल सी निशानियां 


प्राइम टाइम में

चीन और पाकिस्तान

हिन्दू और मुसलमान

जैसे

राष्ट्रीय मुद्दों की भरमार के बीच 

बाढ़ की मामूली खबरें 

ड्राइंगरूम में 

बैठे प्रबुद्ध भारत को

बोरियत का एहसास कराने 

के लिए काफी होती हैं

मुख्य चुनावी खबरों के दरम्यान 

नीचे की पट्टी पर

"बिहार में भयानक बाढ़"

की हेडलाइन के अलावा

उफान मारती नदी

डूबे हुए गांव

और पलायन करती

भेड़ बकरियों की

कुछ शानदार तस्वीरों के जरिये

बाढ़ की वर्चनाओं को

और बाढ़ में फंसे लोगों की 

वेदनाओं को

टीआरपी के पैमाने पर

जितनी कवरेज मिलनी चाहिए 

उतनी मिल ही जाती हैं


बाढ़ में तैरती जिंदगियों से ज्यादा 

मुख्यमंत्री का हवाई दौरा 

टीआरपी दे जाता है


भूखे पेट को

राशन मिले न मिले

लेकिन

भरे पेट वालों की ओर से

मिलने वाला आश्वाशन ज्यादा

टीआरपी दे जाता है


बाढ़ में कराहती प्रजा के 

बेवतन होने की बात 

कोई नहीं सुनता

लेकिन 

राजा के मन की बात

फिजाओं में गूंज उठती है


मिड डे मील की पंक्तियों से

जीवन की 

शुरुआत करने वाले बच्चे 

राशन की लाइनों में 

जवां होते हैं 

और

बाढ़ के दौरान

हैलीकॉप्टर से बरसते

राहत सामग्री के थैलों को 

लपकते लपकते 

बूढ़े हो जाते हैं


आखिरकार

बाढ़ का यह इवेंट

खत्म हो जाता है और

बाढ़ का सीजन ऑफ होते ही

धर्म का सीजन शुरू हो जाता है

बाढ़ के दौरान 

लापता खुदाओं की टोली

हंसी ठिठोली करती हुई 

गांव गांव पहुंचती है

और ये रंग बिरंगे खुदा मिलकर

अपने अपने

भक्त और बन्दों को समझाते हैं

जो होता है

ऊपरवाले की मर्जी से होता है

ये दुनिया तो कैद खाना है

सजा काटकर जाना है

इतना समझते ही

बाढ़ में ढहे

संकटमोचन के

मन्दिरों की तामीर

और

रहमतुलआलमीन के 

मस्जिदों का निर्माण

पूरे दम खम के साथ 

पूरा कर लिया जाता है


-शकील प्रेम


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