राजनीति अल्पकालिक धर्म है और धर्म दीर्घकालिक राजनीति - तर्कशील भारत

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Thursday, July 8, 2021

राजनीति अल्पकालिक धर्म है और धर्म दीर्घकालिक राजनीति

 राजनीति अल्पकालिक धर्म है

और धर्म दीर्घकालिक राजनीति

लोहिया के 

इन शब्दों की गहराई को समझइए


समय के साथ

सत्ता हमेशा बदलती रहती है

और बदल जाती है 

राजनीति की तस्वीर भी

लेकिन

धर्म

चाहे कितना ही रूढ़ हो 

धर्म की दलीलें चाहे कितनी ही

पुरातन हों

धर्म की रवायतें 

चाहें कितनी ही जर्जर हों

और धर्म की दीवारें 

चाहे कितनी ही कमजोर हों

धर्म का स्वभाव 

और धर्म का प्रभाव 

दीर्घकालिक होता है

जो

समय के आवेग से 

हमेशा आगे होता है 

इसलिए

राजनीति 

अल्पकाल का धर्म होती है

लेकिन धर्म 

दीर्घकाल की राजनीति होती है


जो गद्दी पर होता है

उसकी नियत पर

उसकी नीति तय होती है

और उसकी नीतियों पर ही

उसकी राजनीति चलती है

लेकिन

शासक कितना ही सशक्त हो

उसकी नियत कितनी ही 

महान हो

उसकी नीतियां कितनी ही 

युगान्तकारी हो

और उसकी राजनीति 

कितनी ही परिवर्तनकारी हो

वक्त के साथ 

सब धूमिल हो जाता है


कल जो खुद को 

पूरी दुनिया का बादशाह समझते थे

आज उनके खण्डहरों में

उन्हें तालशने वाला भी कोई नहीं 


कल जो खुद को विश्वविजेता 

कहते थे

आज उनकी कब्रों पर

दो फूल चढ़ाने वाला भी कोई नहीं


राजनीति का धर्म 

यही है की यह अल्पकालिक होती है

सत्ता का मर्म भी यही है की

वक्त के आगे इसका जोर नहीं चलता


लेकिन

धर्म का स्वभाव

और धर्म का प्रभाव 

चिरस्थाई होता है 


राजनीति के साथ 

धर्म का गठजोड़ होते ही

अल्पकालिक राजनीति 

दीर्घकालिक धर्म का हिस्सा हो जाती है

और दीर्घकालिक धर्म को भी

नई ऊर्जा मिल जाती है

जब

सत्ता में धर्म 

और धर्म मे सत्ता की 

घुसपैठ हो जाती है

तब दोनों 

एक दूजे को

मजबूत करने लगते हैं

और 

दोनों के इस "महान" 

गठबंधन के साथ ही

हाशिये पर धकेल दी जाती हैं

न्याय 

समता

बन्धुता

और

प्रेम की वो तमाम वाहियात बातें 

जो धर्म और राजनीति के लिए

रुकावटें पैदा करती हैं 

साथ ही 

कूड़ेदान में

फेंक दी जाती हैं 

लोकतंत्र और स्वतंत्रता की 

वो तमाम फिजूल दलीलें

जो धर्म और राजनीति के उत्थान में

रोड़ा बनती हैं


लोहिया ने बिल्कुल सही कहा था

राजनीति अल्पकालिक धर्म है

और धर्म दीर्घकालिक राजनीति


-शकील प्रेम


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