परम्पराओं को तोड़ने के लिए उदाहरण जरूरी है - तर्कशील भारत

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Friday, July 2, 2021

परम्पराओं को तोड़ने के लिए उदाहरण जरूरी है

हिन्दू समाज में परम्पराओं के रूप में मौजूद रूढ़िवाद जितना पुराना है रूढ़ियों को तोड़ने की परंपराएं भी उतनी ही पुरानी है हिन्दू समाज की लगभग हर प्रथा का विरोध हुआ है जिससे कई मान्यताएं खत्म हुईं तो कई में लगातार सुधार हुआ है जो परम्पराएं जितनी कठोर थीं सुधारकों के हाथों उन पर उतनी ही गहरी चोट पड़ी और वो हमेशा के लिए टूट गईं या फिर कमजोर हो गईं हालांकि आज भी हिन्दू समाज रूढ़ियों से मुक्त नहीं हुआ है लेकिन इन रूढ़ियों पर सुधारको के द्वारा चोट भी लगातार जारी है.

मृत्युभोज या श्राद्धकर्म के नाम पर होने वाले ढकोसले के खिलाफ हिन्दू समाज पहले से ज्यादा जागरूक हुआ है इसी वजह से शहरों में तो मृत्युभोज की परंपरा लगभग टूट सी गई है और ग्रामीण क्षेत्रों में भी मृत्युभोज के बहिष्कार की खबरें लगातार सुनने को मिलने लगीं हैं.

मुस्लिम समाज मे ब्राह्मणभोज जैसा तो कुछ नहीं होता लेकिन जनाजे की नमाज फातिहा कुरानख्वानी से लेकर चालीसवाँ के भोज तक की नौटंकी चलती है गरीब हो या अमीर सब को यह ढोंग करवाना ही पड़ता है.

ताऊ या अन्य रिश्तेदारों की मृत्यु को छोड़कर मेरे खुद के परिवार में 1986 में दादा की मौत हुई थी इतने लंबे अंतराल के बाद 29 अप्रेल को मेरी मम्मी की डेथ हुई 28 अप्रेल की दोपहर तक मैं बिहार में था माँ की तबियत ज्यादा खराब होने की खबर सुनते ही मैंने ट्रेन पकड़ी और दिल्ली के लिए रवाना हो गया अगली सुबह घर पहुंचते ही मां ने दम तोड़ दिया.

कुछ बहुत करीबी रिश्तेदार खबर मिलते ही घर पहुंच गए और क्या करना है कैसे करना है इसका कंट्रोल उन्होंने अपने हाथों में ले लिया अब आगे कुछ भी निर्णय लेने की कमांड मैं खो चुका था जीजा और करीबी रिश्तेदारों द्वारा मय्यत को मस्जिद के अहाते तक ले जाया गया जहां जनाजे की नमाज अदा होनी थी बड़ा लड़का होने के बावजूद मैं जनाजे की नमाज में शामिल नहीं हुआ यही नहीं कब्रिस्तान की कवायदों में शुरुआत से लेकर दफनाने के बाद तक के किसी भी ढकोसले से मैंने उचित दूरी बनाए रखा.

इस दौरान कुरानख्वानी फातिहा और चालीसवाँ के भोज तक का मैंने बहिष्कार कर दिया जो लोग मेरी मां की मृत्यु के समय सम्वेदनाएँ व्यक्त करने मेरे घर तक पहुंचे थे उनके लिए सामूहिक भोज का छोटा सा इंतजाम किया इसमे कोई भी धार्मिक एंगल नहीं था.

मेरे इस रवैये से बहुत से करीबी लोग नाराज हुए लेकिन मुझे इस बात की कोई परवाह नहीं हुई बल्कि मुझे इस बात से सुकून हासिल हुआ कि कम से कम मैंने 1400 साल पुरानी इस्लामिक जहालत की कुछ बेड़ियों को तोड़ने का उदाहरण तो दिया ही है क्योंकि ऐसा मैंने कभी न देखा था न सुना था मेरे सामने ऐसा कोई उदाहरण नहीं था लेकिन इतना तो तय है कि अब मेरे बच्चों के सामने एक उदाहरण तो होगा ही.

मैं जानता हूँ कि मेरे इस कदम से फिलहाल कुछ भी बदलने वाला नहीं लेकिन यह उदाहरण भी एक मिसाल है कि इस्लाम की सख्त रूढ़ियों को भी तोड़ा जा सकता है.

माँ बाप से मुहब्बत का इजहार करने के लिए जरूरी नहीं कि आप उनके मरने के बाद उनके नाम पर भेड़चाल का हिस्सा बनकर बेवकूफियत भरे लूटतंत्र का शिकार हो जाएं.

यदि आप सच मे माँ बाप से मुहब्बत करते हैं तो उनके नाम पर किसी बेसहारा हाथ को थाम कर जिंदगी की सड़क पार करने में उसकी मदद कीजिये कुछ आंखों में ख्वाब दे दीजिए कुछ पंखों को परवाज दीजिए कुछ होंठों पर मुस्कान दीजिये या गुरबत की सडांध में फंसे करोड़ों बच्चों में से किसी एक मासूम बच्चे की जिंदगी बदलने की जिम्मेदारी स्वीकार कीजिये.

आत्मा नाम की चीज तो होती नहीं फिर भी अगर सब लफड़ा आत्मा को शांति दिलाने का ही है तो क्या आपके इस नेक कदम से उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी ?

लोग क्या कहते हैं इसकी परवाह करेंगे तो आप कुछ बदल नहीं पाएंगे.

सुधार खुद से ही शुरू होता है जब तक आप उदाहरण पेश नहीं करते तब तक आपकी तमाम आदर्शवादी बातें सिर्फ हवाई ही साबित होती हैं आपके विचारों का प्रतिबिंब आपके व्यवहार में भी झलकना जरूरी है वर्ना आपकी जिंदगी में सत्य प्रेम और परिवर्तन के कोई मायने ही नहीं रह जाते.

राहुल सांस्कृत्यायन ने कहा था "लोग रूढ़ियों को इसलिए मानते हैं क्योंकि उनके पास रूढ़ियों को तोड़ने के उदाहरण नही होते"



 

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