दो जवां इंसानों को साथ रहने के लिए शादी की जरूरत क्यों ? - तर्कशील भारत

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Thursday, July 1, 2021

दो जवां इंसानों को साथ रहने के लिए शादी की जरूरत क्यों ?

 मलाला ने जो कहा उसमे गलत क्या है ?


स्त्री को पुरुष की और पुरुष को स्त्री की जरूरत है इसी जरूरत को पूरा करने की खातिर कबीलाई युग मे शादियों का प्रचलन शुरू हुआ उससे पहले नर और मादा स्वछन्द होकर जोड़ियां बनाते थे और तब तक साथ रहते थे जब तक दोनों को एक दूजे की जरूरत होती थी मातृसत्तात्मक समाज मे औरत के लिए बन्दिशें नहीं थीं लेकिन जैसे जैसे हम कबीलों से सभ्यताओं की ओर आगे बढ़ते गए औरतों के दायरे सिमटते चले गये सभ्यताओं के विस्तार का यह दौर सत्ता ताकत और वर्चस्व की होड़ में बदल गया.

सैनिकों की जरूरत हुई ताकत सत्ता या वर्चस्व की लड़ाई में मरने मारने वाले लोगों में औरतें नहीं होती थीं घर मे रहकर पति के लौटने के इंतजार के अलावा उसे घर भी संभालना होता था यहीं से लगभग सभी सभ्यताओं में "आदर्श नारी" की परिकल्पना तैयार हुई जो औरत जितनी आज्ञाकारी होगी वह उतनी ही अच्छी मानी जायेगी 

सहना औरत का गहना हो गया उसका आस्तित्व पति पिता भाई और बेटा के बिना कुछ नहीं था इस तरह धीरे धीरे आधी आबादी गुलाम होकर रह गई आदर्श नारी के इस कॉन्सेप्ट में बदचलनी के लिए कोई जगह नहीं थी किसी भी मामले में नारी की मर्जी का तो सवाल ही नहीं था शादी से पहले उसके जीवन की डोर उसके पिता या भाई के हाथों में थी तो शादी के बाद उसका पति ही उसका मालिक था ऐसे दौर में लड़कियां खरीदी जाती थी बेची जाती थी जीती जाती थी या चुरा ली जाती थी सब ताकत का खेल था जो जितना धनी था उसके पास उसी अनुपात में औरतें होती थीं एक मर्द कई शादियां कर सकता था इस तरह औरत भोग की वस्तु बना दी गई 

सम्वेदनाओं और मानवता के धरातल पर औरतों की कीमत लगातार घटती चली गई और एक वक्त आया जब औरत बोझ हो गई बोझ को निपटाने की खातिर धन खर्च किया जाने लगा इस तरह पूरब की दुनिया मे दहेज प्रथा की शुरुआत हुई लड़की की मर्जी के कोई मायने नहीं थे शादी के नाम पर हवस की शिकार होने के साथ वह बच्चे पैदा करने की मशीन से ज्यादा कुछ नहीं थी पति के घर में बंधुआ मजदूर बन कर जीवन गुजार देने के बदले उसे "आदर्श नारी" का खिताब जरूर मिल जाता था जिसके उदाहरण पर उसकी बेटियां चल सकें.

आप कहेंगे कि जमाना बदल गया है आज कल की शादियां वैसी नहीं होतीं आज लड़की की रजामंदी भी पूछी जाती है आज लड़कियों को तालीम दी जा रही है वो नौकरियां कर रही हैं लेकिन यह पूरा सच नहीं है समाज के बहुसंख्यक हिस्से में आज भी लड़कियों की मर्जी के कोई मायने नहीं हैं वो पढ़ रही है ताकि दहेज कम लगे वो नौकरियों में भी खुद की मर्जी से नहीं है घरवालों ने बाकायदा इसके लिए इजाजत दी है.

कोई लड़की अपनी मर्जी से अपनी पसंद के लड़के के साथ शादी नहीं कर सकती जो ऐसा कर पाने में सक्षम होती हैं उसे बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं और बहुत कुछ झेलना पड़ता है. खाप पंचायतों से बच गई तो ऑनर किलिंग का खतरा तो होता ही है इससे भी बच गई तो उसे जीवन भर सामाजिक तिरस्कार का सामना करना ही पड़ता है.  

पवित्रता की आड़ में और नैतिकता के नाम होने वाले कुंठाओं के इस प्रायोजित कार्यक्रम में पवित्रता और नैतिकता जैसी कोई बात होती ही नहीं लड़की की 12 साल में शादी कर देने में कैसी पवित्रता है ? कन्या को दान की वस्तु समझ कर झट पट उसे निपटा देने में कौन सी नैतिकता है ? कन्या अगर दान की सामग्री ही है तो दामाद को मोटा रिश्वत क्यों ? 

गरीब हो या मिडिल क्लास, विवाह सभी के लिए खुशी कम और मुसीबत ज्यादा है सक्षम वर्ग या एलीट क्लास के लिए परंपराएं कभी बेड़ियाँ नहीं बनती 90 प्रतिशत आबादी जिन परम्पराओं के बोझ तले दबकर कराह रही होती है ऊपर की 10 परसेंट आबादी उन्हीं अक़ीदों को एन्जॉय करती है शादियों के मामले में भी यही होता है.

अपनी दादी की शादी की उम्र का पता कीजिये 10/12 साल में शादी और फिर यौवन की दहलीज तक पहुंचने तक  10/12 बच्चे. 30 की आयु तक तो औरतें नानी दादी बन जाती थीं 10/12 साल की बच्चियों के साथ विवाह के नाम पर हर घर मे पवित्र बालात्कार होता था.

13 साल की उम्र में बच्चा पैदा करते समय लड़की की दर्दनाक मौत पर संवेदनाएं दर्ज करवाने की कोई परंपरा विकसित नहीं हुई थी यह तो भाग्य का खेल था लड़की की मय्यत दफनाने के साथ ही लड़के की दूसरी शादी की तैयारियां शुरू हो जाती थीं.

मलाला को शादी की व्यवस्था अटपटी लगती है तो इसमें गलत क्या है ? नबी ने शादियों के नाम पर जो उदाहरण पेश किया है क्या आप अपनी बेटियों को ऐसी शादी का हिस्सा बनने दे सकते हैं ? 

मेरी राय में आज शादी जैसी प्रथा को ढोते रहने की कोई जरूरत ही नहीं है इसके लिए जरूरी है कि हम मानवीय होकर स्त्री और पुरुष के नैसर्गिक सम्बन्धों पर तार्किक होकर सोचना शुरू करें इश्क को हवा दें दो जवां दिलों के बीच की मुहब्बत को स्वीकार करें को एजुकेशन को बढ़ावा दे फिलहाल लिव इन रिलेशनशिप परम्परागत शादीयों का विकल हो सकती है इसे समाज का हिस्सा बनने दें 

शादियों पर होने वाले खर्च के मामले में भारत सबसे आगे है और शादियों के बाद दहेज उत्पीड़न कलह या घरेलू हिंसा के मामले में भी हमारा देश दुनिया मे सबसे आगे है.

मैं समझता हूँ की जो सवाल मलाला ने किया वह सवाल बुद्धिजिवीयों का होना चाहिए

दो जवां इंसानों को साथ रहने के लिए शादी की जरूरत क्यों ? 

शादी की व्यवस्था कई सामाजिक बुराइयों को जन्म देती है क्योंकि गरीब तबके की ज्यादातर शादियों में लड़की मेच्योर नहीं होती जब तक उसे दुनियादारी की समझ होती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है ऐसे में उसके पास रिश्ते को झेलने के अलावा कोई विकल्प बचता ही नहीं.

शादी खत्म तो तलाक का झंझट भी खत्म और दोनों के खत्म होते ही शादियों के नाम पर होने वाली धार्मिक हरामखोरी भी खत्म हो जाएगी 

जब तक दिल मिले साथ रहें जब रिश्ता बोझ बन जाये तो अलग हो जाएं इसमें गलत क्या है ? 

हमारा समाज नर और मादा की नेचुरल नीड को जन्म जन्मांतर का रिश्ता बताकर एक औरत को एक मर्द के साथ संस्कारों की मजबूत जंजीरों से बांधकर आशीर्वाद के रूप में दोनों को ताउम्र साथ रहने की जिद थमा देता है और इस गठबंधन पर ईश्वरीय मोहर लगाकर इसे विवाह का नाम दे देता है इस अमानवीय और अप्राकृतिक प्रायोजन में नारी की सम्वेदनाओं के लिए कोई जगह नहीं होता भारतीय उपमहाद्वीप में विवाह पद्वति चाहे जो हो किसी भी धर्म/पन्थ को मानने वाला समाज हो शादी का मतलब बस यही होता है.



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