एक आदमी मुल्हिद क्यों हो जाता है ? - तर्कशील भारत

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Tuesday, June 29, 2021

एक आदमी मुल्हिद क्यों हो जाता है ?

 थोड़ा सा विवेक

और जरा सी सम्वेदनाएं रखने वाला
एक साधारण आदमी भी
आपके महानतम धर्म को
ठोकर मारकर
नास्तिक या मुल्हिद हो जाता है

जिन्हें मरने के बाद 
जन्नत की जरूरत होती है
वो जीते जी धरती को
जहन्नम बना देते हैं
और जिन्हें 
मरने के बाद की किसी
जन्नत पर यकीं नहीं  
वो मरने से पहले 
धरती को स्वर्ग बना देते हैं

यह दुनिया
जीने लायक बनी है तो इसमें
सबसे बड़ी जद्दोजहद
उन मुल्हिदों की है
जो आपके 
आसमानी खुदाओं पर 
यकीन नहीं रखते
आप जिसके नाम पर
रक्त बहाते हो
वे आपके उस 
श्रेष्ठतम 
धर्म को नहीं मानते
आप जिसके नाम पर
आतंक मचाते हो
वे आपके उस
पाक मजहब का इनकार करते हैं
जिन खुदाओं को 
आप माथा रगड़ रगड़ कर 
पुकारते हो
उन तमाम खुदाओं को
वे सिरे से खारिज कर देते हैं
वे आपके बुतों के आगे
नतमस्तक नहीं होते
वे आपके गिरजाघरों में
दस्तक नहीं देते
वे आपके चर्चों को 
बेकार कहते हैं
और आपके पादरियों को
मक्कार समझते हैं
वे आपके 
मदारिस का सच जानते हैं
और आपकी मसाजिदों को
फसाद की जड़ मानते हैं

ऐसे तमाम लोगों को
आप नास्तिक या मुल्हिद कह कर 
निकल जाते हो

लेकिन 
आप कभी 
दिमाग नहीं लगाते की
जिन परम्पराओं को आप
पीढ़ी दर पीढ़ी 
ढोते चले आ रहे हैं
उसमे रखा क्या है ?

आप कभी
अपने गिरेबां में
झांककर नहीं देखते की
जिन अक़ीदों पर आप
पीढ़ी दर पीढ़ी
चलते आ रहे हैं 
वो रास्ता 
आखिर कहां तक जाता है ? 

मजहब की
इन युगों पुरानी 
भटकती राहों पर
जो आपके साथ नहीं चलते
ऐसे तमाम लोगों को
आप 
नास्तिक या मुल्हिद कह कर 
निकल जाते हो

लेकिन आपको 
एक नास्तिक के 
आस्तित्व की गरिमा का
तनिक भी अंदाजा नहीं 

कभी सोचा है आपने 
की एक आदमी 
मुल्हिद क्यों बनता है ?

यही मुल्हिद आपके 
रब्बुलआलमीन
का इनकार क्यों करता है ?

आपके फर्जी 
सिरातुल मुस्तकीम 
पर चलने की बजाए
वो अपने रास्ते 
खुद तय क्यों करता है ?

क्योंकि 
आपके पास 
आपकी फर्जी किताबों 
और उन किताबों में लिखी
अफवाहों का कोई सबूत नहीं 

आपके पास
आपके फर्जी खुदाओं
और उन खुदाओं की
हवाई बातों का
कोई प्रमाण नहीं 

एक नास्तिक जानता है कि
आपके दो कौड़ी के 
दर्शन में
या दर्शनशास्त्रों में
या उन शास्त्रों में लिखी गाथाओं में
या उन गाथाओं में मौजूद नायकों में
कोई ऐसी बात नहीं
जिससे समाज को
गति हासिल हो 

आपकी सड़ी गली 
मान्यताओं में
या उन मान्यताओं पर आधारित 
संस्कारों में 
या उन संस्कारों से निकले विचारों में
या उन विचारों पर आधारित 
आपके व्यवहार में
कोई ऐसी बात नहीं
जिससे दुनिया को
प्रगति हासिल हो 

क्योंकि
आपके मजहब को अक्ल से 
कोई मोहब्बत नहीं  
धर्म को धारण करने के लिए
बुद्धि की जरूरत नहीं

नासमझी की बड़ी बड़ी डींगें 
जरा सी समझ के आगे
फेल हो जाती हैं
मजहब की तमाम बकवासें
मुट्ठी भर तर्क के आगे 
ढेर हो जाती हैं 

इसलिए 
थोड़ा सा विवेक
और जरा सी सम्वेदनाएं रखने वाला
एक साधारण आदमी भी
आपके महानतम धर्म को
ठोकर मारकर 
नास्तिक या मुल्हिद हो जाता है

-शकील प्रेम

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