सुनते नहीं बस शोर मचाते हैं - तर्कशील भारत

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Wednesday, May 5, 2021

सुनते नहीं बस शोर मचाते हैं

 सुनते नहीं बस शोर मचाते हैं

बहरें हैं, इसलिए चिल्लाते हैं

घोंपते हैं पीठ में ख़ंजर

दर्द देकर, वो मुस्कुराते हैं


न नियत न कोई नीति 

करते हैं जो लाशों पर राजनीति

नफरतों का व्यापार करते हैं 

मानवबम तैयार करते हैं

नोट की खातिर कुछ भी कर जाते हैं

वोट की खातिर बस्तियां जलाते हैं

घर मे रहें या रहें वो संसद में

जुबां से ही जख़्मी कर जाते हैं

सुनते नहीं बस शोर मचाते हैं

बहरें हैं, इसलिए चिल्लाते हैं


न तुम पहले जाहिल हो 

न वो पहला मुन्तज़िर था

न तुम आखिरी बेवकूफ हो 

न वो आखिरी पैगम्बर था

गिरोह बन कर मूरख बनाते हैं

झूठे किस्सों में सबको भरमाते हैं

जहन्नम की आग खुद से सुलगाते हैं 

डरपोक खुद होते हैं और सबको डराते हैं

सुनते नहीं बस शोर मचाते हैं

बहरें हैं, इसलिए चिल्लाते हैं


छोटी है समझ और तंग है डगर

पैर बीमार और बोझिल है नजर

मंजिल का पता न रास्ते की खबर 

न कोई हमराही न कोई हमसफ़र

अंधों की तरह बस ठोकरे खाते हैं

सीधे रास्ते पर वही, डगमगाते हैं 

सुनते नहीं बस शोर मचाते हैं

बहरें हैं, इसलिए चिल्लाते हैं


अफवाहें दुश्मनी का बीज बो जाती है

भीड़ में जिंदगी भी कहीं खो जाती है

जब इंसान से डरने लगती हैं फिजायें

इंसानियत हमेशा के लिए सो जाती है

हर तरफ डर का माहौल बनाते हैं

मौका देख कर घात लगाते हैं

सुनते नहीं बस शोर मचाते हैं

बहरें हैं, इसलिए चिल्लाते हैं


-शकील प्रेम


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