मेहनत करने वाले ही मुल्क बनाते हैं - तर्कशील भारत

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Monday, May 3, 2021

मेहनत करने वाले ही मुल्क बनाते हैं

 पेट की खातिर जिस्म गलाते हैं

आंधियों में भी भात पकाते हैं

पसीने से लिखतें हैं वतन की कहानी

मेहनत करने वाले ही मुल्क बनाते हैं


नदियों को बांध देते हैं 

लहरों को थाम लेते हैं

समंदर पर बैठकर 

हवाओं से काम लेते हैं


तपतें हैं धूपों में खटते हैं खेतों में 

रिसते हैं बारिश में पिसते हैं रेतों में

पढ़ते हैं वक्त और लिखते हैं तकदीरें 

बनाते हैं हाथों से राष्ट्रों की तस्वीरें 


रुकावटों को जो जड़ से हटाते हैं

बंदिशों की हर दीवार गिराते हैं 

पसीने से लिखतें हैं वतन की कहानी

मेहनत करने वाले ही मुल्क बनाते हैं


जो डरते हैं मन के काले से

जिन्हें मोहब्बत है उजाले से

जिन्हें भय है सूरज गुम न हो

जिन्हें डर है अंधेरा कायम न हो 


यही लोग कुछ ऐसा कर जाते हैं

उजाले की ओर सबको ले जाते हैं


मशाल बन कर खुद ही जल जाते हैं

जुगनुओं की तरह वो जगमगाते हैं

पसीने से लिखतें हैं वतन की कहानी

मेहनत करने वाले ही मुल्क बनाते हैं


ताज को तराशा खजुराहो को बनाया

दुनिया को जोड़ा राहों को बनाया

सपनों को सजाया ख्वाबों को बनाया

झोपड़ी में रहकर महलों को बनाया


पर्वत को चीर कर रास्ता बनाते हैं

मिट्टी को सींच कर सोना उगाते हैं

पसीने से लिखतें हैं वतन की कहानी

मेहनत करने वाले ही मुल्क बनाते हैं


दिल मे हजार जख्म सीने में है तूफान 

हाथों से भर देते हैं पत्थरों में भी जान

मंदिरों की तामीर मस्जिदों का निर्माण

तराशते हैं खुदा को बनाते हैं भगवान


नन्गे पैर चलकर इकोनॉमी चलाते हैं

खुद नीचे गिर कर जीडीपी उठाते हैं

पसीने से लिखतें हैं वतन की कहानी

मेहनत करने वाले ही मुल्क बनाते हैं


कितना भी दर्द हो आहों में

हजार मुश्किलें हों राहों में

जटिल हो सफर या कठिन हो डगर

सूरज ढल जाए अंधेरा भी हो अगर 


दुश्वारियों से आगे निकल आते हैं

ढूंढकर मंजिल का पता लाते हैं

पसीने से लिखतें हैं वतन की कहानी

मेहनत करने वाले ही मुल्क बनाते हैं


-शकील प्रेम




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