किस बात पर गर्व करें - तर्कशील भारत

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Saturday, April 24, 2021

किस बात पर गर्व करें

 बात कड़वी है लेकिन

सच्ची है

दिमाग पर जोर डालिये

और बताइये की हम 

किस बात पर गर्व करें ?


फिलहाल हमारे पास 

गर्व करने के लिए 

झूठे अभिमान के अलावा

और क्या है ?


अमेरिका को गर्व हो सकता है

अपनी समृद्धि पर 

फिनलैंड गर्व कर सकता है

अपनी खुशहाली पर

चीन इतरा सकता है

अपनी मेहनत पर

जापान गर्व कर सकता है

अपनी टेक्नोलॉजी पर

लेकिन

हम किस बात पर गर्व करें ?


भूख से तड़पते लोग 

भगवान पर चढ़ते भोग

दुख कुपोषण और रोग

सड़कों पर भटकते लोग

बेमौत मरती जवानियां

आंसुओं की अंतहीन कहानियां

सितम की खौफनाक व्यथाएं

ज़ुल्मतों की दर्दनाक गाथाएं


हम किस बात पर गर्व करें ?


अम्बानी की दौलत पर

शारुख की शोहरत पर

वन्यजीवों की घटती संख्या पर

बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या पर

नौजवानों की बेकारी पर

ग़रीबी और बेरोजगारी पर


किस बात पर गर्व करें ?


फिलहाल हमारे पास 

गर्व करने के लिए 

झूठे अभिमान के अलावा

कुछ भी तो नहीं


दुनिया के तमाम विकसित देशों ने

गुलामी झेली है

और आजाद हुए है

बंजर जमीनों को ताजा विचारों से 

सींच कर आबाद हुए हैं

लेकिन हम 

कभी आजाद हुए ही नहीं

आज भी वहीं हैं

कभी आबाद हुए ही नहीं


मुल्कों को तकसीम कर

हमने क्या साबित किया ?

लाखों इंसानों की लाशों पर

हमने क्या हासिल किया ?


आज जमीं के इसी टुकड़े पर

डेरा डाले बैठे हैं

और

अपनी अपनी आजादी का 

भ्रम पाले बैठे हैं


लोकतंत्र की आड़ में

लूटतंत्र पलता रहा

आजादी के नाम पर

भीड़तंत्र चलता रहा


बेघर था बर्बाद था

कभी आबाद हुआ ही नहीं

इस देश का मेहनतकश 

कभी आजाद हुआ ही नहीं


मैं गुलाम

तुम गुलाम

सोच गुलाम 

विचार गुलाम

कल गुलाम

आज गुलाम

समझ गुलाम 

समाज गुलाम


तो फिर किस बात पर गर्व करें ?


यह चन्द अमीर परिवारों की आजादी है

यह रईसों और मालदारों की आजादी है

यह धनिको और जमींदारों की आजादी है

यह रसूखों और तहसीलदारों की आजादी है

यह घूसखोरों लुटेरों और गद्दारों की आजादी है


बुद्धि को सूली पर

टांगे बैठे हैं

मजहबों की बेड़ियां

थामे बैठे हैं

गले मे गुलामी का

पट्टा डाले बैठे हैं

हम आजाद होने का 

भ्रम पाले बैठे हैं


सिपहसालार बदले

लेकिन 

अत्याचार का अंत न हुआ


हवलदार बदले

लेकिन 

शोषण बन्द न हुआ


न्यायाधीश बदले

लेकिन 

अन्याय खत्म न हुआ


काले अंग्रेजों के शाशन में

जुल्मोसितम कम न हुआ


लहू और पसीने से

यह धरती हमेशा सनी रही 


हुक्मरान बदले 

लेकिन गुलामी

जस की तस बनी रही


सरकारों से आजाद हुए 

लेकिन

संस्कारों की गुलामी

जस की तस बनी रही


विदेशियों से आजाद हुए लेकिन

विचारों की गुलामी

जस की तस बनी रही


इस पुरातन गुलामी में

नई बात यह है कि

आजाद विचारों को

बर्फ की तरह जमा दिया गया है

और जनमानस को

झूठा भ्रम थमा दिया गया है


नये दिमागों पर जब हावी हुए

सड़े विचार तब शरिया बन गया

नई गुलामी को मजबूत करने की खातिर

पुराना धर्म जरिया बन गया

इस तरह हम 

झूम झूम कर पर्व करने लगे और

अपनी गुलामी पर गर्व करने लगे


इसलिए

फिलहाल हमारे पास 

गर्व करने के लिए 

झूठे अभिमान के अलावा

कुछ भी तो नहीं


शकील प्रेम



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