फरेब हावी है ईमान गुम है - तर्कशील भारत

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Tuesday, March 9, 2021

फरेब हावी है ईमान गुम है

 आंसुओं के 

अथाह समंदर में

डूबती आंखें 

और इन आँखों में

दम तोड़ते ख्वाबों को

जिस किनारे की तलाश है

वो साहिल 

फिलहाल कहीं नहीं है


दुखों की अंतहीन 

पगडंडियों पर चलते पैर

और इन पैरों में 

पड़े छालों को

जिस मंजिल की तलाश है

वो मंजिल 

फिलहाल कहीं नही है


बाजार बन चुके समाज मे

सब कुछ बिक रहा है

एहसासों के सिवा यहां सबकुछ 

मिल रहा है


चाहतें उम्मीदें खुशियां और ख्वाब

सबकुछ 

भरोसा ईमान जिस्म और विचार

सबकुछ


इस व्यापार में

इंसान के भीतर 

मन के किसी कोने में

जिस हमदर्दी की तलाश है

वो हमदर्दी

फिलहाल कहीं नहीं है


कदमों की भीड़ में इंसान गुम है

ढके छुपे चेहरों में मुस्कान गुम है

फरेब हावी है ईमान गुम है

घण्टियों के शोर में भगवान गुम है


जिम्मेदारियों के बोझ तले

मजबूर हो गया हूँ 

मुर्दा जिस्मों के बीच

खुद के वजूद की तलाश में

थक कर चूर हो गया हूँ 

पल भर 

आराम के लिए

मुझे जिस छांव की तलाश है

वो दरख़्त

फिलहाल कहीं नहीं है


-शकील प्रेम


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