आधी आबादी - तर्कशील भारत

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Monday, March 8, 2021

आधी आबादी

 जीवन का आधार हूँ कुदरत का सृंगार हूँ

मैं आधी आबादी हूँ मैं आधा संसार हूँ

मेरी आधी दुनिया पर हुकूमत मेरी नहीं

पुरुषवाद के बाजार में कोई कीमत मेरी नहीं

मेरी हस्तियां मिटाकर मेरी तकदीरें बनाते हो

मर्यादा की आड़ में मुझे जंजीरे पहनातें हो

पैरों में दस्तूरों का बंधन और कहते हो लाचार हूँ

जीवन का आधार हूँ कुदरत का सृंगार हूँ

मैं आधी आबादी हूँ मैं आधा संसार हूँ


ब्याह सिर्फ एक बिजनेस है सौदा है जज्बात का

हर कोई संग सोना चाहे किस्सा है बस रात का

मुझको देवी तुम क्यों मानो इतनी तो नादान नही

घर की जूती घर का झाड़ू घर का बस समान नही

तेरे लिए सिर्फ देह नहीं मैं, न खुला बाजार हूँ

जीवन का आधार हूँ कुदरत का सृंगार हूँ

मैं आधी आबादी हूँ मैं आधा संसार हूँ


खुद के पैरों पर चलते ही बेवतन हो जाती हूँ

खुलकर हँसती हूँ तो मैं बदचलन हो जाती हूँ

स्कूल छुड़ाकर कहते हो जमाना बहुत खराब है

कालेज तक पहुंच जाऊं तो उठता सैलाब है

भरम की तेरी इस दुनिया मे मैं बिल्कुल बेकार हूँ

जीवन का आधार हूँ कुदरत का सृंगार हूँ

मैं आधी आबादी हूँ मैं आधा संसार हूँ


घर मे पड़ी रहूँ तो मैं, मुसीबत हो जाती हूँ 

घर से निकलना चाहूँ तो, रुखसत हो जाती हूँ

संस्कारों की आड़ में जीतोड़ दिखावा करते हो

परंपराओं के हवनकुंड में नारी को स्वाहा करते हो

संस्कारों को लात मार कर अब चलने को तैयार हूँ

जीवन का आधार हूँ कुदरत का सृंगार हूँ

मैं आधी आबादी हूँ मैं आधा संसार हूँ

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