फैज अहमद फैज की नज्म "हम देखेंगे" गर कोई मुल्हिद लिखता तो वो कुछ यूं होती.... - तर्कशील भारत

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Sunday, March 7, 2021

फैज अहमद फैज की नज्म "हम देखेंगे" गर कोई मुल्हिद लिखता तो वो कुछ यूं होती....

हम देखेंगे

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

हम देखेंगे

वो दिन कि जिसका वादा है

जो प्रस्तावना में लिखा है

हम देखेंगे

लाजिम है कि हम भी देखेंगे

हम देखेंगे

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के पर्वत

रुई की तरह उड़ जाएँगे

हम मुल्हिदों के पाँव तले

ये मजहब धड़-धड़ धड़केगा

और नबियों के सर ऊपर

जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

हम देखेंगे

लाजिम है कि हम भी देखेंगे

हम देखेंगे

जब अर्ज ए ख़ुदा के काबे से

लिहाफ़ उठवाए जाएँगे

हम इल्हाद करने वाले सब

मसनद पे बिठाए जाएँगे

सब ताज उछाले जाएँगे

सब तख़्त गिराए जाएँगे

हम देखेंगे

लाजिम है कि हम भी देखेंगे

हम देखेंगे

बस नाम रहेगा इंसानियत का

जो ग़ायब भी है हाज़िर भी

जो मंज़र भी है नाज़िर भी

उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

और राज़ करेगी मानवता

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

हम देखेंगे

लाजिम है कि हम भी देखेंगे

हम देखेंगे

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