चुड़ैलें कभी मरती नहीं - तर्कशील भारत

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Monday, March 22, 2021

चुड़ैलें कभी मरती नहीं

 मैं इंसान के हाथों 

इंसान के कत्ल को 

जायज नहीं मानता

इस गैर इंसानी 

कारनामे को जायज 

साबित करने के लिए

चाहे आप 

सैंकड़ों तर्क गढ़ लाएं

हजारों किताबें पढ़ आएं

न्याय की दुहाई दें

इंसाफ़ की बधाई दें 

मैं

इंसान के हाथों

इंसान के खात्मे को 

न्यायोचित नहीं मानता


धर्म जाती या संस्कार के नाम पर

चाहे एक इंसान

सैंकड़ों को मारे

या

सैंकड़ों मिलकर

किसी एक का 

आस्तित्व मिटा दें 

रंग नस्ल या प्रतिकार के नाम पर

कोई एक 

कइयों की हत्या करे

या कई मिलकर

किसी एक को

सूली पर लटकाएं

मैं दोनों सूरतों में इसे

मानवता की

निकृष्टतम अवस्था कहता हूँ


दारा हो या धनन्जय चटर्जी 

शबनम हो या बाबू बजरंगी

ये सब के सब

नरपिशाच हैं 

और नरपिशाचों का

नरसंहार होना ही चाहिए

लेकिन 

इनके राक्षस बनने में

सिर्फ और सिर्फ 

यही जिम्मेवार नहीं हैं

हमारा समाज 

और 

हमारी सामाजिकता की 

संकीर्णताओं से उपजी

वृहद विकृतियों में

ऐसी उर्वरकता 

हमेशा मौजूद होती है

जहां से थोक के भाव मे

ऐसे नरपिशाच जन्म लेते हैं

तो सजा केवल 

नरपिशाचों को ही क्यों मिले ?


समाज के महान विद्रूपों की

वृहद फैक्ट्रियों में

ऐसे उत्पादों की 

थोक के भाव मे

मैनुफैक्चरिंग होती है

तो सजा केवल 

उत्पादों को ही क्यों मिले ?


क्यों न हम 

उन विकृतियों को 

और इसकी उर्वरकता को खत्म करें 

जहां कई शबनम पनपती है

क्यों न हम 

उन फैक्ट्रियों में ताले जड़ दें 

जहां से शबनम की मैन्यूफैक्चरिंग होती हैं


जब कुदरत किसी लड़की को

प्रेम के लिए तैयार कर देती है

तब समाज उसकी इच्छाओं के आगे

कई दीवारें खड़ी कर देता है 

यहीं से शबनम 

जैसी चुड़ैलों का उदय होता है


किसी लड़की के लिए

कुंवारेपन में

माँ बनने की गुंजाइश छोड़ी है ?

नहीं न ?


शादी से पहले

सेक्स तो दूर की बात है

लड़की के लिए तो

खुल कर हंसना भी वर्जित है

वह क्या करे 

जब उसे प्रेम हो जाये ?

वह क्या करे 

जब वो कुंवारेपन में 

प्रेग्नेंट हो जाये ?

समाज मे

इस सच को स्वीकार करने 

कोई गुंजाइश छोड़ी है ?

नहीं न ?


कोई खिड़की 

कोई दरवाजा भी तो नहीं

जहां से 

इसे हजम करने की 

कोई गुंजाइश बाकी हो ?

नहीं न ?


ऐसी सूरत में

शबनम के पास

आत्महत्या के अलावा 

कोई अन्य विकल्प बचा था ?

नहीं न ?


शबनम के पास दो ही विकल्प थे

या तो ऑनर किलिंग के नाम पर

होने वाली बेशुमार 

शहादतों में शरीक होकर 

शहीद हो जाये

या पंखे मे चुनरी लपेट

खुद की खुशी का अंत कर ले

लेकिन शबनम ने

तीसरा विकल्प चुना 

और चुड़ैल बन गई


दरअसल

हमारे समाज के झूठे संस्कार

प्रकृति के विरुद्ध होते हैं 

जिनकी वजह से

प्राकृतिक चयन के सहज रिश्ते

अवरुद्ध होते हैं 

कुदरत से खिलवाड़ होगा 

तो रिएक्शन में

शबनम 

जैसी घातक चुड़ैलें

परिवेश में जन्म लेती रहेंगी....


दो प्यार करने वालों को

खुदकुशी पर 

मजबूर करने वाला समाज

या प्रेमी जोड़ों की 

थोक के भाव मे 

हत्याएं करने वाला समाज

शबनम की मौत का 

भरपूर जश्न मना सकता है...


लेकिन याद रहे कि


समाज की विकृतियों में

पनपने वाली 

शबनम जैसी खौफनाक चुड़ैलें 

कभी मरती नहीं...


-शकील प्रेम

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