गजल हूँ विचार हूँ, कभी मरता नहीं मैं - तर्कशील भारत

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Wednesday, March 10, 2021

गजल हूँ विचार हूँ, कभी मरता नहीं मैं

 जन्नत की आरजू रखता नहीं मैं

फर्जी दोजख से भी डरता नही मैं


दूर रहता हूँ खुदा के कुतुबखाने से

जहालत की भाषा समझता नहीं मैं


रुकू में झुकूं, क्यों पटकूँ सर जमीं पे

बेवजह की कसरत करता नहीं मैं


नमाजों की नेकी या रोजे की बरकत

झूठे इनआम पर मचलता नहीं मैं


मजहबों की चादर अक़ीदों की टोपी

गन्दे लिबासों को पहनता नही मैं


इमामों के पीछे या जमातों के आगे

भीड़ के कदमों से चलता नही मैं


न डराओ मुझे बरसात की चन्द बूंदों से 

पर्वत हूँ, तेज बहाव में भी बहता नहीं मैं


फूंक दो मुझको मैं फिर से जी उठूंगा

गजल हूँ विचार हूँ, कभी मरता नहीं मैं


-शकील प्रेम


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