तेरे रक्तपात को मैं नहीं मानता - तर्कशील भारत

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Saturday, February 27, 2021

तेरे रक्तपात को मैं नहीं मानता

 तेरी हर बात को 

इस रक्तपात को 

मैं नहीं मानता 

मैं नहीं जानता


चन्द लोगों के सपनों की आगोश में

ये क्या हो रहा जोश ही जोश में

मुल्क मेरा खड़ा कैसे दोराहे पर

नँगी है सियासत यहां चौराहे पर

झूठी है कसम तेरे झूठे करम

झूठी है नियत तेरा झूठा धरम

इस खुले झूठ को 

जहर के घूंट को

मैं नहीं मानता

मैं नही जानता


तेरी हर बात को

इस रक्तपात को 

मैं नहीं मानता 

मैं नहीं जानता


जब तलक तेरी वहशत का बाजार है

नफरतों का यह कैसा यलगार है

जातियों मजहबों की इस नई भीड़ में

हर आदमी के हाथों में तलवार है

सुबहा उठता है तू जयकारों के संग

चमकती हैं रातें सितारों के संग

तेरी हर शय नूर है

तू कितना मशहूर है 

मैं नही मानता 

मैं नहीं जानता


तेरी हर बात को 

इस रक्तपात को 

मैं नहीं मानता 

मैं नहीं जानता


रहजन है तू थोड़ा मक्कार भी

पैना है तेरा हर हथियार भी

तू करता है कैसे न जाने करम

बहाता है लहू बेचता है भरम

सब समझते हैं तुझको तू भगवान है

मुझको मालूम है तू कितना शैतान है

तेरी हर रीत को

तेरी हर जीत को

मैं नही मानता 

मैं नही जानता


तेरी हर बात को 

इस रक्तपात को 

मैं नहीं मानता 

मैं नहीं जानता


तेरी जिद है कि तू सबको खा जाएगा

तेरी भूख सही ये कैसे समझायेगा

कब तलक तेरी खुशियों में झुमुंगा मैं

कब तलक तेरे कदमों को चुमूंगा मैं

मर गया सिकन्दर तू क्या चीज है

मिट गये कितने हिटलर तू क्या चीज है

तू समय की घड़ी

तेरी जिद है बड़ी

मैं नहीं मानता 

मैं नहीं जानता


तेरी हर बात को 

इस रक्तपात को 

मैं नहीं मानता 

मैं नहीं जानता


तेरी रंगत अलग तेरे नखरे जुदा

तू खुद से बना ख़ुद का ही खुदा 

तू नीचे से उठकर गया अर्श पर

तूने पहुंचा दिया सबको फर्श पर 

तेरी पूजा भी हो और इबादत भी हो

तेरे ही नाम पर अब शहादत भी हो

तू इतना बलवान है

सबका भगवान है 

मैं नहीं मानता

मैं नही जानता


तेरी हर बात को 

इस रक्तपात को 

मैं नहीं मानता 

मैं नहीं जानता


-शकील प्रेम

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