आज की नारी - तर्कशील भारत

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Friday, February 26, 2021

आज की नारी

 मैं 

तुम्हारी भूख मिटाने की खातिर 

सिर्फ देह भर नहीं हूँ 

जिसे तुम 

रौंद कर ही पुरुष बन सको

और न ही सिर्फ वस्तु हूँ 

जिसे तुम 

इस्तेमाल करो 

और कूड़ेदान में फेंक कर ही 

मर्द बन सको

जैसे तुम मेरे लिए 

सिर्फ देह भर नहीं हो


वैसे ही 

मैं भी 

देह के अलावा 

और भी बहुत कुछ हो सकती हूँ

बेटी पत्नी बहु भाभी 

आइटम गर्लफ्रैंड से आगे भी

बहुत से रिश्ते हैं 

जिनमे तुम 

मुझे फिट देखना चाहते हो

लेकिन मैं इन

रिश्तों से अलग भी तो 

एक्जिस्ट कर सकती हूँ

शायद मेरा यह 

एक्जिस्टेंस तुम्हे 

बर्दाश्त न हो 

लेकिन मैं अब

तुम्हारी सोच के दायरे से 

कहीं बाहर भी

एक्जिस्ट करती हूँ

जी हाँ

अब मैं वो नहीं हूँ

जिसे तुमने बनाया

अब मैं वो हूँ

जिसे मैंने खुद से

क्रिएट किया है

मैं आज की नारी हूँ

हां 

आज की नारी


इसलिए

अब तुम्हारे नियमों की

आदत नहीं मुझे

तुम्हारी मर्यादाओं की 

जरूरत नहीं मुझे


अब मुझे 

तुम्हारे संस्कारों से 

जकड़न सी होने लगी है 

तुम्हारे आदर्शों से

घुटन सी होने लगी है


अपनी गुलामी की दास्तां

मुझे खुद से पढ़ लेने दो

मेरी आजादी के मायने

मुझे खुद से गढ़ लेने दो


मैं बीबी नहीं बनना चाहती 

न जी 

बिल्कुल नहीं 

मुझे पटरानी बनाने की 

जहमत भी अब न उठाओ

मेरी खुशियों की कीमत भी

अब तुम न चुकाओ


न मैं तुम्हारे लिए खास बनूँ 

न तुम 

मेरे लिए आम बनो

न मैं तुम्हारे लिए 

सीता बनूँ

न तुम मेरे लिए राम बनो


बस अब रहने दो

बहुत हो चुका


मुझे खोलने दो

खुद से मेरी खिड़कियां

अपनी बन्द खिड़कियों के लिए

अब मैं तुम्हे नहीं कोसुंगी

न जी

बिल्कुल नहीं

मुझे तोड़ने दो खुद से 

मेरी बेड़ियां

मैं अपनी इन बेड़ियों के लिए

अब तुम्हे दोष नहीं दूंगी

न जी

बिल्कुल नहीं

मुझे एहसास मत कराओ की तुम 

मेरी बेड़ियों के गुनहगार नहीं थे

मुझे मत बताओ कि तुम

मेरी खिड़कियों के पहरेदार नहीं थे


मैं जानती हूँ कि तुम 

बिल्कुल निर्दोष हो


जाओ और

तुम भी शामिल हो जाओ 

उन आदर्श पुरुषों की भीड़ में

जिन्होंने नारी के उत्थान में

अपना महान बलिदान दिया था

जाओ तुम भी बन जाओ 

अपने महात्माओ जैसे

जिन्होंने नारी को पत्थर की मूरत से

अलग कर इंसान किया था


लेकिन ध्यान रहे कि

मुझे तुम्हारे इन तमाम 

आदर्श पुरुषों के किस्सों में

अब कोई इंट्रस्ट नहीं


मुझे तुम्हारी मूरत के साथ ही

तुम्हारे महापुरुषों की मूर्तियों से भी

पुरुषवाद की भयंकर दुर्गंध आती है


इसलिए मैं 

जैसी हूँ वैसा ही रहना चाहती हूँ और

पुरुषों की मर्यादाओं से

या मर्यादित पुरुषों से

उचित दूरी बना कर रखना चाहती हूँ


रखो अपने पास

अपनी संवेदनाएं

अपनी हमदर्दी 

और रखो अपने पास

अपने गौरवशाली इतिहास की

महानतम पोथियों को भी

और रखो अपने पास

अपने आदर्श पुरुषों की 

महानतम गाथाओं को भी...


जी हाँ

अब मैं वो नहीं हूँ

जिसे तुमने बनाया

अब मैं वो हूँ

जिसे मैंने खुद से

क्रिएट किया है

मैं आज की नारी हूँ

आज की नारी


मुझे नहीं चाहिए...

तुम

तुम्हारे विचार

तुम्हारे संस्कार

तुम्हारा सत्कार

तुम्हारी इज्जत 

तुम्हारी हसरत


यदि कुछ

दे सकते हो

मेरे कदमों का साथ दो

मेरे साथ चलो 

मेरे हाथों में अपना हाथ दो

मुझे तहजीब सिखाने की कसरत न करो

मेरी उड़ान को रोकने की जहमत न उठाओ

मेरे कदमों को रोको मत 

मेरे सपनों को कुचलो मत


या फिर रहने दो 

बहुत हो चुका


मुझे अपनी रेखाएं 

खुद से खींचनी हैं

इसके लिए अब किसी

लक्ष्मण की जरूरत नहीं मुझे


मुझे अपनी वीणा खुद 

बजानी है 

इसके लिए अब किसी

बुद्ध की जरूरत नहीं मुझे


मुझे मेरा घर 

खुद से तामीर करना है

जहां से खींचकर कोई राम 

मुझे घर से न निकाल पाये


मेरा जिस्म 

मैं खुद से ढंकना सीख गई हूँ

इसके लिए अब

मेरे पास कोई कृष्ण न आ पाए


मैं अपनी कीमत जान गई हूँ

अब कोई युधिष्ठिर 

मुझे जुए में न हार पाये


खदीजा की मेहनत पर

अब कोई अहमद 

नबी न बन पाए


आइशा के बांकपन पर

अब कोई पैगम्बर डाका न डाल पाये


मुझे मरियम की तरह 

भगवान को जन्म भी नहीं देना है

और मुझे यह किस्सा भी अब यहीं खत्म करना है


इसलिए 

मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो

मुझपर 

अब कोई एहसान भी मत करो

और मुझे बार बार

यह एहसास भी न दिलाओ की

तुम राम और बुद्ध की तरह 

नारी के महान उद्धारक हो


तुम बनो महान

लेकिन

मुझे महान नहीं बनना है

मैं औरत हूँ 

और औरत ही रहूँ

बस 

इतना ही काफी है

मेरे लिए.... 


जी हाँ

अब मैं वो नहीं हूँ

जिसे तुमने बनाया

अब मैं वो हूँ

जिसे मैंने खुद से

क्रिएट किया है

मैं आज की नारी हूँ

हां, आज की नारी...


-शकील प्रेम

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