तेरे इस्लाम को मै नही मानता - तर्कशील भारत

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Thursday, February 18, 2021

तेरे इस्लाम को मै नही मानता

 तेरे एहकाम को

तेरे इस्लाम को

मैं नही मानता 

मैं नहीं जानता


तूने जो बताया वो सब झूठ है

तेरे नाम पर लूट ही लूट है

तेरे मूरत ढहे तेरे गिरजे जले

सजदों में जो थे वो सर भी कटे

तूने दुनिया को कैसा ये मंजर दिया

नन्हे हाथों में मजहब का ख़ंजर दिया

तेरे इनाम को

तेरे पैगाम को

मैं नहीं मानता

मैं नहीं जानता


तेरे एहकाम को

तेरे इस्लाम को

मैं नही मानता 

मैं नहीं जानता


तू होता अगर तो क्या बात थी

हर तरफ खुशियों की बारात थी

तू नही है मगर तेरा जलाल है 

नालों में बहता लहू लाल है

हवाओं में है मजहबों की धनक

फिजाओं में है नफरतों की महक

तू रहमान है

तू दयावान है

मैं नहीं मानता

मैं नहीं जानता


तेरे एहकाम को

तेरे इस्लाम को

मैं नही मानता 

मैं नहीं जानता


तम्बुओं पर टँगे घरों की तरह

खण्डहरों में पड़े मकबरों की तरह

तू भी लाचार है तू भी बदहाल है

कोई भूखों मरे ये तेरी चाल है

तू सूरज नहीं न चिराग है

जलती हैं दुकानें तू वो आग है

तेरी शान को

तेरे कुरआन

मैं नहीं मानता


तेरे एहकाम को

तेरे इस्लाम को

मैं नही मानता 

मैं नहीं जानता


ग्रंथों में लिखी तेरी हिकमात को 

पोथियों में लिखी तेरी हर बात को

जो तूने बकी तेरे नबी ने कही

तू ही अल्लाह है ये सभी ने कही

तेरे डर से तो पत्ता भी हिलता नहीं

लेकिन तेरा पता भी कहीं मिलता नही

तू है अर्श पर

या रहे फर्श पर

मैं नही मानता

मैं नही जानता


तेरे एहकाम को

तेरे इस्लाम को

मैं नही मानता 

मैं नहीं जानता


-शकील प्रेम

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