जो जिंदा होते हैं वही इंकलाब लाते हैं - तर्कशील भारत

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Friday, February 12, 2021

जो जिंदा होते हैं वही इंकलाब लाते हैं

 सूखी मृदभूमि में सैलाब लाते हैं

जो जिंदा होते हैं वही इंकलाब लाते हैं


हर गली दंगा हो जाये

आदमी नँगा हो जाये

जब हैवानियत का शोर हो

जुल्मो सितम का दौर हो

आदमियत खतरे में हो और

नफ़रतें लहू के कतरे कतरे में हो

घृणा की आंच में

जब सत्ता मचल रही हो

पोथियों के राज में

प्रस्तावना जल रही हो

ढूंढ कर इंसानियत की नई किताब लाते हैं

जो जिंदा होते हैं वही इंकलाब लाते हैं


जब खून सस्ता और 

पानी महंगा हो जाये

इंसान भूखा हो 

और खुदा चंगा हो जाये

जब आंखे वीरान 

और सपने अधूरे हो जाएं

उम्मीदों के बचे खुचे

दिन भी पूरे हो जाएं

ढूंढकर सूनी आंखों में ख्वाब लाते हैं

जो जिंदा होते हैं वही इंकलाब लाते हैं


जब विद्यालय वीरान हो 

मस्जिदें आलीशान हों

सच परेशान हो 

झूठ का महिमागन हो

रौंदने की दौड़ हो

लूटने की होड़ हो 

जिंदगियां बदहाल हो

मृतात्मायें मालामाल हो

जिंदगी जब

मृत चेतनाओं में 

जिंदा शरीर बन जाये

आदमी

खण्डहरों में टँगी हुई 

मुर्दा तस्वीर बन जाये

यौवन लापता हो 

जवानी गुमशुदा हो

ढूंढकर खोया हुआ शबाब लाते हैं

जो जिंदा होते हैं वही इंकलाब लाते हैं


जब हृदय में मर्म बाकी न रहे

आंखों में शर्म बाकी न रहे

समझने की ताकत खत्म हो जाये

सोचने की कुव्वत मर जाये 

पत्थरों की कीमत

जिंदगियों से महंगी हो जाएं

कागजों के ढेर पर 

तहजीबें नँगी हो जाएं

आशाएं भष्म हो जाएं

संवेदनाएं खत्म हो जाएं

जब दिलों में रोष हो

लेकिन जबां खामोश हो

ढूंढकर हर सवाल का जवाब लाते हैं

जो जिंदा होते हैं वही इंकलाब लाते हैं


जो रस्मों को छोड़ते हैं

रिवाजों को तोड़ते हैं

भय को कुचलते हैं

वक्त को बदलते हैं

आत्माओं को भगाते हैं

चेतनाओं को जगाते हैं

निजाम से टकराते है

सूली पर चढ़ जाते हैं

हर बार क्रांति का नया सैलाब लाते हैं

जो जिंदा होते हैं वही इंकलाब लाते हैं


-शकील प्रेम

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