पड़ा है जो सड़क पर वो मेरी ही जात का है. - तर्कशील भारत

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Thursday, December 31, 2020

पड़ा है जो सड़क पर वो मेरी ही जात का है.

 मामला बस रात का है 

तो जश्न किस बात का है

पड़ा है जो सड़क पर 

वो मेरी ही जात का है.


कोई भूखों तड़प रहा है 

कोई रोटी को मर रहा है

जिसका पेट भर रहा है 

वो सेलिब्रेट कर रहा है

यह फर्क हालात का है 

तो जश्न किस बात का है

पड़ा है जो सड़क पर 

वो मेरी ही जात का है.


आ गए सड़क पर

वो सर्द अब कहाँ है

बाजुओं में वजन था 

वो मर्द अब कहाँ है 

देते थे जो सहारा 

वो हमदर्द अब कहाँ हैं

सीने में उठ रहा था

वो दर्द अब कहाँ है 

मामला जज्बात का है

तो जश्न किस बात का है

पड़ा है जो सड़क पर 

वो मेरी ही जात का है.


किताबों में जो लिखा था

वो झूठा हो चुका है

कुदरत ने जो दिया था

वो लूटा जा चुका है

पैरों में जो जमीं थी

वो छीनी जा चुकी है

सर पे जो आसमाँ था

वो नोंचा जा चुका है

यह वक्त बालात का है

तो जश्न किस बात का है

पड़ा है जो सड़क पर 

वो मेरी ही जात का है.


-शकील प्रेम

















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