सूअर और इंसान - तर्कशील भारत

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Tuesday, December 22, 2020

सूअर और इंसान

 सूअर और इंसान

मैंने कहा सुअर से इंसान बनोगे ? उसने कहा नही मैं सुअर ही ठीक हूँ मैंने कहा ऐसा क्यों ? क्या तुम्हें इंसान होने का अर्थ मालूम है ? इतना सुनकर सुअर बोला मैं सुअर हूँ गन्दगी खाता हूँ फिर भी दुनिया को साफ रखता हूँ लेकिन तुम इंसान हो अन्न खाते हो और दुनिया को तबाह करते हो आओ मैं तुम्हे अंदर की बात बताता हूँ सुअर और इंसान के अंतर को समझाता हूँ मेरी प्राथमिकता भोजन है तुम भी पेट की खातिर जीते हो मैं अपने बच्चों के भविष्य की चिंता करता हूँ तुम भी अपने बच्चों की खातिर पूरे जीवन चिंतित रहते हो मुझे भी इंसानों से डर है तुम्हे भी इंसानों से भय है तुम्हारे सभ्य समाज मे न जाने कैसी होड़ समाई है जिधर देखो असमानता की खाई है इंसानों की भीड़ में बेबसी और तन्हाई है जिधर देखो गम रुदन और रुसवाई है हमारा जिस्म गन्दा है दिमाग साफ रहता है तुम्हारा दिमाग गन्दा है जिस्म साफ रखते हो जानवर हम हैं हैवान तुम हो तुम्हारे इंसानी समाज मे कोई दिन भर खटता है कोई चैन से सोता है कोई पाता है कोई खोता है कोई हंसता है कोई रोता है कोई ठूंस कर खाता है कोई भूखे पेट सोता हैं कोई गन्दगी में जीवन ढूंढता हैं कोई जीवन मे सुख ढूंढता हैं मेरी प्रजाति में बालात्कार नही होते भ्रष्टाचार नही होते लेकिन तुम मानव प्यार भी करते हो और बालात्कार भी चमत्कार भी करते हो और व्यभिचार भी आविष्कार भी करते हो और बंटाधार भी सत्कार भी करते हो और तिरस्कार भी इतनी कला गिरगिट की किसी जाती में नही इतना दोगलापन और किसी प्रजाति में नही भय भूख कुपोषण घृणा हिंसा और शोषण क्या यही है तुम्हारी सभ्यता ? सुअर की इन बातों को सुनकर मैं सन्न रह गया मैंने फिर कहा हे महात्मा सुअर तुम सुअर होकर भी इतने ज्ञानी कैसे हो गये ? सुअर ने समझाया मैं ज्ञानी नही हूँ लेकिन मैं भी तो इसी दुनिया में रहता हूँ और अपने चारों ओर इंसानों की दोगली गतिविधियों को महसूस करता हूँ तुम अंतरिक्ष मे पहुंच गए लेकिन फुटपाथों पर भटकते मासूम बच्चों तक नही पहुंच पाए तुमने प्रगति के नए कीर्तिमान बनाये लेकिन करोड़ों इंसानों तक तुम्हारे विकास की परछाइयां भी नही पहुंच पाई तुमने सभ्य होने के ढोंग रचे और चांद तारों से आगे निकल गए लेकिन असभ्यता में जानवरों को भी पीछे छोड़ दिया अपनी ही प्रजाति के दूसरे इंसानों के साथ तुमने वह घिनौना काम किया जो इस धरती पर रहने वाला कोई भी दूसरा प्राणी करता अश्पृश्यता छुआछूत और जातिवाद मानव तस्करी गुलामी और नस्लवाद धर्म के नाम पर हिंसा और आतंकवाद संवेदनहीनता पर आधारित साम्राज्यवाद क्या यही है तुम्हारी सभ्यता ? अपनी ही मादा संतानों के साथ तुमने वह घिनौना काम किया जो प्रकृति का कोई भी दूसरा जीव नही करता बलात्कार और भ्रूण हत्याएं जिंदा जलाने की प्रथाएं संगसार करने की व्यथाएँ नारी को रौंदने की हृदयविदारक गाथाएं क्या यही है तुम्हारी मनुष्यता ? अपने ही लोगों के साथ तुमने वह किया है जो इस सृष्टि का कोई भी दूसरा जीव नही कर सकता इंसान ने इंसानों की खातिर आधुनिक हथियार बनाये राष्ट्रवाद की आड़ में विध्वंस के औजार बनाये नफरत के सौदागर मिलकर लाशों के व्यापार बनाये पूंजीवाद की होड़ में बमों के बाजार बनाये क्या यही है तुम्हारा इतिहास ? तुम अपने इंसान होने का कितना भी ढिंढोरा पीटो इस प्रकृति के लिए तुम ही सबसे निकृष्ट जीव साबित हुए हो इसलिए मैं कहता हूँ अभी भी वक्त है सुधर जाओ और सभ्यता की ओर ईमानदारी से कदम बढ़ाओ दो पैरों पर चलने वाले सबसे खतरनाक जीव से सच मे इंसान बन जाओ तब ही मैं कह सकता हूँ कि तुम सभ्य हो और सुअर से श्रेष्ठ हो सुअर की इन बातों ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया था अब मैं नींद से जाग चुका था और बिस्तर से उठते ही आईने के सामने पहुंच चुका था और शीशे में खुद को देखकर चौंक उठा था आइने में मुझे एक जानवर नजर आया जो मेरी तरह दिखता था उसने मुझसे पूछा कि तुम कौन हो ? मैंने कहा फिलहाल तो मैं दो पैरों पर चलने वाला एक जानवर हूँ लेकिन इंसान बनने की प्रक्रिया में हूँ. -शकील प्रेम

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