क्या धर्म हमे सामूहिकता की भावना देता है ? - तर्कशील भारत

Header Ads Widget

Tuesday, December 1, 2020

क्या धर्म हमे सामूहिकता की भावना देता है ?

 सभी धर्मों का ताना बाना बुना ही ऐसा गया है कि यह केवल भीड़ पैदा करता है भीड़, मजहबों की विरासतें होती हैं समूहों का धर्म से दूर दूर तक कोई नाता ही नहीं भीड़ और समूह में क्या अंतर है जानना हो तो शकील प्रेम चैनल पर एपिसोड नम्बर 26 देख लीजियेगा.

आजका हमारा सवाल है कि क्या धर्म हमे सामूहिकता की भावना प्रदान करता है तो जवाब है हरगिज नहीं धर्म केवल भीड़ पैदा करता है धर्मों की जीत व्यक्तिगत स्वार्थों पर आधारित होती है जब बहुत सारे लोगों के स्वार्थ किसी एक स्थान या आयोजन पर केंद्रित कर दिए जाते हैं तो वहां सामूहिकता के लिए कोई जगह नही होती.

सामाजिक मुद्दों को लेकर अलग अलग जनांदोलनों में किसी खास जगह इकट्ठे लोग भीड़तंत्र का हिस्सा नही होते इसे हम समूह कह सकते हैं क्योंकि यहां व्यक्तिगत स्वार्थ नही होता बल्कि लोग सामाजिक हितों के लिए ही यहां इकट्ठे होते है.

इसके उलट अलग अलग स्थानों पर इकट्ठी होने वाली भीड़ व्यक्तिगत स्वार्थों पर चलती है यह भीड़ हमारे चारों ओर होती है बाजार में मेट्रो में सड़कों पर और रेलवे स्टेशन पर दिखाई देने वाली भीड़ केवल भीड़ ही होती है जो अपने व्यग्तिगत स्वार्थों की खातिर इन जगहों पर इकट्ठी होती है भीड़ में सामूहिक चेतना नही होती तभी ऐसी जगहों पर मामूली कारणों से बड़े बड़े हादसे हो जाते हैं इसी तरह धर्मस्थलों पर दिखने वाला जनसमूह भी केवल भीड़तंत्र का हिस्सा होता है और इस भीड़ तंत्र में सामूहिक चेतना के लिए कोई जगह नही होती.

हर साल करोड़ों लोग मक्का में इकट्ठे होते हैं स्थान एक मकसद एक वेशभूषा एक इसके बावजूद यहां सामूहिकता गायब नजर आएगी यह सिर्फ और सिर्फ व्यक्तिगत आस्थाओं की खुजली मिटाने की जगह मात्र है और इस भीड़तंत्र के इस भेड़चाल का नाम है हज.

हज के इस सालाना आयोजन को व्यवस्थित करने के लिए सऊदी सरकार हर साल खरबों रुपये पानी की तरह बहाती है ताकि भेड़ों की यह भीड़ कंट्रोल में रहे इसके बावजूद हादसे हो जाते हैं भगदड़ में सैंकड़ों मारे जाते हैं क्योंकि यह सिर्फ भीड़ होती है और भीड़ में सामूहिक चेतना नहीं होती. 

भेड़ों की इस भीड़ का हर सदस्य कुंद हो चुके विचारों का बोझ लेकर अपने निजी हितों की खातिर ही यहां इकट्ठा होता है और अपनी बची खुची चेतनाओं को पत्थर मारते हुए यहां से निकल आता है. 

यही हाल कुम्भ मेला का होता है जहां करोड़ों लोग हजारों वर्षों की बीमार आस्थाओं का बोझ ढोते हुए इकट्ठे होते हैं और अपनी बची खुची बुद्धि और विवेक को पानी मे धोकर यहां से निकल लेते हैं.

तमाम तरह के धर्मस्थलों पर इकट्ठी होने वाली भीड़ भी सिर्फ और सिर्फ आस्थाओं का बोझ ढोने वाली भेड़ें ही तो है.

सामूहिक चेतना का विकास वहीं होता है जहां के लोग सामाजिक हितों के बारे में समझने के काबिल होते हैं ऐसे समाजों में हम उत्कृष्ट मानवीय मूल्यों को पनपते हुए देख सकते हैं लेकिन जहां सामाजिक हितों के ऊपर व्यक्तिगत आस्थाओं का दिमागी धंधा जोरों से चलता है वहां सामाजिकता के लिए कोई जगह बचती ही नहीं यही कारण है कि हम सामाजिक उन्नति में खुद को सबसे निचले पायदान पर पाते हैं.

हमारी उन्नति तभी होगी जब हमारा समाज उन्नत होगा और यह तभी होगा जब हम सामाजिकता के महत्व को समझेंगे लेकिन हमे धार्मिक जंजाल में इस कदर उलझा दिया गया है कि हम समाज बनने की बजाय भीड़ में तब्दील हो चुके हैं और समाज बनने की प्रक्रिया से भी कोसों दूर हो चुके हैं.

-शकील प्रेम

No comments:

Post a Comment

Pages