सृजन और विनाश - तर्कशील भारत

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Saturday, November 7, 2020

सृजन और विनाश

 प्रकृति दो ही बातें जानती है सृजन और विनास. 

प्रकृति नहीं जानती 
की तुम कितने धनी हो
उसे नहीं पता कि
तुम कितने ज्ञानी हो
वो नहीं जानती
तुम कितने बड़े साहूकार हो
या कितने बड़े चाटुकार हो
प्रकृति नही जानती
तुम कितने लाचार हो 
बीमार हो बेकार हो 
वो नहीं जानती
तुमने कितना हड़पा है
उसे नहीं पता 
तुमने कितना झेला है
प्रकृति 
बस दो ही बातें जानती है
सृजन और विनाश

इसलिए आज
तुम जी भर कर 
लूट सकते हो
तुम्हे आजादी है
जी भर कर 
भोग सकते हो 
दूसरे की वेदनाओं को रौंदते हुए
तरक्की की ऊंचाइयों तक 
पहुंच सकते हो
गुरबत की सडांध में
जिंदगी खपा रही पीढ़ियों की 
परवाह किये बिना
हवेलियों से महलों तक का सफर 
कर सकते हो
इंसान और इंसान के बीच मे
असमानता की
कितनी ही गहरी खाईयां खोद सकते हो
धर्म और जाती की
कितनी ही ऊंची दीवारें खड़ी कर सकते हो
कुदरत तुम्हे नही रोकेगी
क्योंकि कुदरत को 
तुम्हारी इन महान हरकतों से 
कोई फर्क नही पड़ता
कुदरत
बस दो ही बातें जानती है
सृजन और विनाश

दौलत की चमक को बढ़ाते हुए
अपनी रातों को कितना ही 
जगमगा लो
गुरबत के अंधेरे कोनों को
कितना ही और
स्याह बना लो
आसमान की ऊंचाइयों को छूते हुए
चांद और मंगल पर बस्तियां बना लो
या जमीन की गहराइयों में
अंदर तक घुस जाओ
नेचर तुम्हे नही रोकेगी
क्योंकि नेचर को 
तुम्हारी इन महान उपलब्धियों से 
कोई फर्क नही पड़ता
वह बस दो ही बातें जानती है
सृजन और विनाश

तुम कितने ही परमाणु बना लो
कितने ही शहरों को
मिट्टी में मिला दो
जमीन पर कितनी ही 
सीमाएं बना लो
या धरती पर कितनी ही
लकीरें खींच लो
जमीन की गहराइयों में
लम्बी लम्बी टनल बना लो
आकाश की ऊंचाइयों को छूते 
गगनचुंबी बुर्ज बना लो
जमीन में बड़े बड़े स्ट्रक्चर बना लो
या स्पेश में हवाई स्टेशन बना लो
ओजोन को फाड़ डालो
या नदियों को मार डालो
प्रकृति उफ तक नही करेगी
क्योंकि प्रकृति को 
तुम्हारी इस महान उछलकूद से 
कोई फर्क नही पड़ता
वह बस दो ही बातें जानती है
सृजन और विनाश

कितने ही आविष्कार कर लो
कितने ही चमत्कार कर लो
कितने ही बलात्कार कर लो
कितना ही भ्रष्टाचार कर लो
तुम सभ्य होने का कितना ही 
ढोंग कर लो
संस्कृति का खूब ढिंढोरा पीट लो
धर्म के नाम पर खूब इतरा लो
मजहब के नाम पर खून बहा लो
जंगलों को कितना ही
सीमित कर दो
अपनी सभ्यताओं को
कितना ही विकसित कर लो
नेचर तुम्हें नही टोकेगी
क्योंकि नेचर को 
तुम्हारी इन महान हरामखोरियों से 
कोई फर्क नही पड़ता
वह बस दो ही बातें जानती है
सृजन और विनाश

लेकिन
इतना याद रखना
प्रकृति के 
सृजन और विनाश के 
युगों पुराने शाश्वत खेल में 
एक दिन
तुम्हारी मर चुकी भावनाओं के
अथाह कब्रिस्तान से
संवेदनाओं का नया सृजन होगा
और
तुम्हारी दो कौड़ी की 
भावहीन सभ्याताएं
बेमौत मारी जाएंगी
क्योंकि
प्रकृति दो ही बातें जानती है
सृजन और विनाश.

-शकील प्रेम

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