इस तस्वीर को मैं बदलना चाहता हूं - तर्कशील भारत

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Thursday, August 6, 2020

इस तस्वीर को मैं बदलना चाहता हूं

मेरेे लिए यह मात्र एक पुरानी फोटो भर नही है बल्कि मेरे इतिहास की जीवंत तस्वीर है शायद 1985 के आसपास दिल्ली में खींची गई थी बगल में मेरे साबिर भैया (बुआ के लड़के) हैं उनके बगल में मैं हूँ मेरे बगल में मेरी माँ हैं और माँ के बगल में मेरी छोटी बहन नुरुन्निशा. मेरी मम्मी ने जो साड़ी पहनी है वह उनकी बेशकीमती साड़ी थी जो कई जगह से फ़टी हुई थी मम्मी बताती हैं की फोटो खिंचाते समय एक घण्टा तो साड़ी का पैबंद छुपाने में लग गया था. 

जिस दौर की यह तस्वीर है वह मेरे परिवार के लिए सबसे कठिन दौर था मेरे पिता जी दिल्ली आ गये थे और यहां ऐसा फंसे की गांव में मेरी माँ के लिए हम भाई बहनों का पालन मुश्किल हो गया इसलिए कुछ समय के बाद मेरी माँ मुझे और मेरी छोटी बहन को लेकर दिल्ली पहुंच गई यहां पहुंचकर हमने अपनी माँ के साथ वह सब कुछ झेला जिसे भारत की एक बहुत बड़ी आबादी आज भी झेलने को मजबूर है न रहने को घर न खाने को अन्न, इसी उम्र में हमने जान लिया कि गरीबी अकेली नही आती वह अपने साथ अवहेलना और तिरस्कार भी साथ लाती है साथ ही वह पीड़ा भी जिसका अहसास ताउम्र कायम रहता है.

बड़े लोगों की गालियां और गुरुद्वारे का लंगर खाकर हम दो भाई बहनों ने बचपन के कई कीमती साल गुजारे इन हालातों में भी मेरी माँ का बस एक ही सपना था की मेरा बेटा किसी तरह स्कूल पहुंच जाए और आगे चलकर वो अपने इस मिशन में सफल भी हुई मेरी माँ और मेरे पिताजी की कड़ी मेहनत रंग लाई और आखिरकार मेरे सभी भाई बहन (6) आज अपनी अपनी जगह पर सुखी हैं.

मैं घोर गरीबी की इस विभीषिका से गुजर चुका हूँ इसलिए मैं हर हाल में यह तस्वीर बदलते हुए देखना चाहता हूँ.

35 साल पुरानी यह तस्वीर मेरे परिवार की पुरानी तस्वीर भर नहीं है बल्कि भारत की वास्तविक तस्वीर आज भी कुछ ऐसी ही है और कहीं कहीं तो डरावनी भी है इसलिए मैं इस तस्वीर को हमेशा के लिए बदल देना चाहता हूँ क्योंकि इस तस्वीर में मैं भी हूँ.

मैं जब भी 

किसी बच्चे को फटेहाल देखता हूँ 

उसमे 

मुझे अपना बचपन 

दिखाई देने लगता है 

मैं जब भी सड़कों पर भटकते 

बच्चों की आंखों में 

झांकने की कोशिश करता हूँ 

वहां मैं दिखाई देता हूँ 

मैं जब भी 

रेलवे के किनारे खड़े 

किसी मैले से बालक की

बोझिल सी परछाई देखता हूँ

उसमे खुद की झलक पाता हूँ

कूड़े के ढेर पर 

नालों के किनारे 

फुटपाथों पर 

या मन्दिर मस्जिद की दहलीज पर 

बड़े होते बच्चों में 

मैं भी कहीं न कहीं मौजूद होता हूँ 

इसलिए मैं हर हाल में 

खुद को इस दलदल से 

बाहर निकालने की कोशिश करता हूँ 

यह मेरी जंग है 

जिसे मैं हर हाल में जीतना चाहता हूँ 

हर हाल में.

-शकील प्रेम

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