सबसे बड़ा भ्रम ईश्वर - तर्कशील भारत

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Friday, August 7, 2020

सबसे बड़ा भ्रम ईश्वर

 क्या आप ईश्वर को इसलिए नही मानते की वो दिखता नही ऐसे तो अमेरिका भी नही दिखता इसका मतलब यह थोड़ी है की अमेरिका नही है.

हमने अमेरिका नही देखा लेकिन अमेरिका के होने का प्रमाण तो है आप जब चाहें अमेरिका का भ्रमण कर सकते हैं दूसरों के अनुभवों की जांच कर सकते हैं आपने सम्राट अशोक को नही देखा लेकिन उनके सैंकड़ों प्रमाण मौजूद हैं जिसके आधार पर हम उनके इतिहास की पुष्टि कर सकते हैं लेकिन हमने या हमारे पूर्वजों ने कभी भी ईश्वर का अनुभव नही किया सम्पूर्ण मानव जाती को ज्ञान विज्ञान और अनुभव के आधार पर भी ईश्वर का कोई अनुभव नही हुआ ईश्वर के बारे में आज तक जितना कुछ लिखा पढ़ा जाना या बोला गया वो सब झूठ ही था वो तमाम बातें जो ईश्वर के बारे में हमने अब तक सुनी या पढ़ी हैं सभी सिर्फ अटकलें हैं उनका कोई प्रमाण नही है ईश्वर अल्लाह गॉड के बारे में सबके पास अपना अलग एक मत है और हर मत में एक नया ईश्वर है कहीं हाथ पैर वाला तो कहीं बेसिरपैर का.

ईश्वर को साबित करने के लिए जो दलीलें हमने गढ़ीं हैं अबतक वह सब बचकानी ही साबित हुई हैं सबसे बड़ी दलील जो ईश्वरवादी देते हैं वह यह की इतना कॉम्प्लेक्स यूनिवर्स खुद ब खुद नही बन सकता इसलिए कोई न कोई ईश्वर तो जरूर है ? सिर्फ इसी आधार पर की कोई न कोई तो है ईश्वर से जुड़ी तमाम गप्पबाजी और इस गप्पबाजी की आड़ में हरामखोरी करने वाले तमाम परजीवी गिरोहों को मानवता का सोशण करने की खुली छूट हासिल हो जाती है मानो यह जुमला आपको हरामखोरी की खुली छूट दे देता है यह कायनात खुद ब खुद नही बन सकता इसलिए कोई न कोई ईश्वर तो जरूर है सिर्फ इस आधार पर ही हम धर्मों की तमाम वाहियात बातों को ढोने पर मजबूर हैं.

दुनिया भर में 4 हजार धर्मों के वजूद के लिए ईश्वर है बस इतना ही काफी है ईश्वर है तो धर्म है धर्म है तो धार्मिक गिरोह हैं और धार्मिक गिरोह हैं तो पाखण्डवाद के द्वारा लूटने के तरह तरह के तरीके भी कायम हैं अन्धविश्वाश जातिवाद ओझैती भखौती मनौती पनौती भूत पिसाच बाबा मुल्ला इन सब के द्वारा समाज को लूटने के सैंकड़ों नायाब तरीके काम पर लगे हैं इसके अलावा तीज त्योहार रोजा नमाज हज तीर्थयात्राएं जमात और सत्संग तो हैं ही जिनके द्वारा जनता की गाढ़ी कमाई लूटी जाती है बात यहीं खत्म नही होती मुंडन हक़ीक़ा जागरण रामलीला रासलीला जैसे वार्षिक आयोजन से भी गरीब को लूटा जाता है धर्म के नाम पर लूटने के ऐसे न जाने और कितने आविष्कार किये गये हैं जो वर्षों से थोड़ी बहुत फेरबदल के साथ आज भी जारी हैं और यह सारा बखेड़ा ईश्वर के नाम पर ही कायम है.

मन्दिर मस्जिद मजार चर्च और विभिन्न तरह के धार्मिक संस्थानों के नाम पर देश की कीमती जमीनें कब्जाई गईं हैं जिनका मानवता के हित में कोई उपयोग नही लाखों टन सोना मंदिरों के गर्भगृह में पड़ा सड़ रहा है और जनता भूखी मर रही है यही वजह है की तमाम प्रयासों के बावजूद समाज की प्रगति नही हो पाती यह सब सिर्फ और सिर्फ ईश्वर के नाम पर ही हो रहा है वो ईश्वर जिसके होने का कोई प्रमाण इन 4 हजार धर्मों में किसी के पास भी नही है.

सवाल यह है की आप ईश्वर को मानते हैं तो किस आधार पर ? इसके लिए आपने खुद से कितनी मेहनत की है ? आप ईश्वर को मानते हैं यह आपकी व्यक्तिगत आस्था से ज्यादा कुछ नही क्योंकि आपके पास आपके खुदा के होने का कोई प्रमाण ही नही इसलिए आप ईश्वर की सत्ता को मान कर सिर्फ भेड़चाल ही चल रहे हैं. जो आपकी इस भेड़चाल का हिस्सा नही उन्हें आप नास्तिक कह देते हैं लेकिन आप नही जानते की मानसिक गुलामी से मुक्त होकर ही आप नास्तिक बन सकते हैं यह उपाधि बहुत तपस्या से प्राप्त होती है आसान नही है यहां तक पहुंचना इसके लिए बुद्धि विवेक और जिगर चाहिए.

नास्तिकता अपने आप में एक महान दर्शन है जिसे समझे बिना हम भेड़चाल का हिस्सा ही होते हैं यदि हम खुद को नास्तिक कहते हैं तब हमे ज्यादा मेहनत की जरूरत पड़ती है क्योंकि एक नास्तिक कभी चैन से नही बैठता एक नास्तिक का जीवन स्वयं में क्रांति का उद्घोष होता है जब उसे मालूम चलता है की कहीं कोई ईश्वर नही है तब ही वह दुनिया की गरीबी के पीछे का असली सच जान पाता है और जब कोई ईश्वर को नकारता हैं तभी वह भाग्यवाद के पीछे की कुटिल चाल भी समझ पाता है और इस भाग्यवाद की आड़ में भयंकर शोषण के खेल को भी समझ जाता है ईश्वर पर आधारित यह पूरा बखेड़ा सीधे सीधे लूट और हरामखोरी का मामला है दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे पुराना स्कैम भी यही है इसलिए दुनिया के तमाम वास्तविक युगपुरुषों ने ईश्वर की सत्ता से इनकार किया भगत सिंह कहते हैं की मैं ईश्वर और धर्म को नही मानता क्योंकि दोनों शोषण का आधार हैं.

ईश्वर को मानने से ही तमाम बुराइयां शुरू होती हैं. भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश की स्थिति देख लीजिये जहां पग पग पर ईश्वर विराजमान है फिर भी दुनिया में सबसे ज्यादा गरीबी कुपोषण शोषण अन्याय जुल्म सितम कामचोरी और हारामखोरी यहीं पर है. जहां धर्म होगा वहां मानवता नही होगी और जहां मानवता होगी वहां धर्म नही होगा. यह इस बात से साबित होता है की दुनिया के तमाम नास्तिक देश ही खुशहाली की लिस्ट में टॉप पर हैं इसके उलट जहां जितना ज्यादा ईश्वरवाद है वहां उतनी ही ज्यादा समस्याएं हैं.

जिस दिन आप ईश्वरीय दर्शन के पीछे छुपे षड्यंत्रों को समझ जाएंगे उसी दिन से दुनिया बदलनी शुरू हो जाएगी.

सिर्फ मनोरंजन के लिए कोई नास्तिक नही बनता बल्कि जो सामाजिक विसमताओं की वजह से ईश्वर का इनकार करता है वही सच्चा इंसान होता है जिसे भेड़ों की भीड़ नास्तिक कहती है एक धार्मिक कभी भी सामाजिक उन्नति का हिस्सा नही होता क्योंकि इसकी जिम्मेदारी से वह खुद को पूरी तरह मुक्त समझता है उसकी नजर में अमीरी गरीबी तो ईश्वरीय देन है फिर वह ईश्वर की लीला से खिलवाड़ भला क्यों करे ? 

सत्य प्रेम और परिवर्तन की यह जिम्मेदारी नास्तिक ही संभालता है क्योंकि उसे पता है की वह एक सामाजिक प्राणी है और समाज की सार्वभौमिक प्रगति तभी होगी जब वह इसकी कमियों को दूर करेगा. इसलिए नास्तिक ही क्रांति लाता है और नास्तिक ही दुनिया को बदल सकता है. एक नास्तिक किसी एलियन के आने का इंतजार नही करता उसे नबियों की असलियत मालूम होती है वह अवतारों के किस्सों से भी वाकिफ होता है इसलिए वह इंतजार नही करता बल्कि शुरुआत करता है.

इंसानियत जिंदाबाद.

-शकील प्रेम



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