मित्रता और स्वार्थ (कविता) - तर्कशील भारत

Header Ads Widget

Sunday, August 2, 2020

मित्रता और स्वार्थ (कविता)


एक मित्र ने पूछा
बताओ मित्र
मित्रता स्वार्थों पर आधारित होती है 
या निस्वार्थ ?
मैंने कहा 
इस दुनिया में 
निस्वार्थ तो माँ भी बच्चे को 
दूध नही पिलाती 
तो फिर मित्रता में स्वार्थ न हो
यह कैसे सम्भव है ?
मित्र ने कहा
क्या हमारी मित्रता में भी स्वार्थ है ?
मैंने कहा 
जी हाँ मित्र
थोड़ा मेरा थोड़ा आपका
स्वार्थ ही तो है
जिसकी बुनियाद पर
मित्रता की हमारी इमारत खड़ी है
जिस दिन 
हममें से 
किसी एक के हिस्से का स्वार्थ
कमजोर होगा
मित्रता का यह भवन
कायम न रह पायेगा

मैंने मित्र से कहा
हमारी मित्रता का सूत्र
एक दूसरे की लेखनी से जुड़ा
मुझे तुम्हारी गजलें पसंद आईं
तुम्हें मेरी कविताएँ
इसलिए हम दोनों मित्र हुए
स्वार्थ दोनों का मिला
इसलिए मित्रता आगे बढ़ी
यदि मेरी कविताएं 
तुम्हे बोर करने लगें 
तो हमारी मित्रता का संतुलन
बिगड़ जाएगा
या तुम्हारी गजलों में
वो आकर्षण न हो
तो भी हमारी मित्रता 
असंतुलित हो जाएगी.

इंसानों की भीड़ में
दो एक जैसे लोग मिलते हैं
और दोनों के एक जैसे स्वार्थ मिलते हैं
तो मित्रता कायम होती है
और यह मित्रता
तब तक कायम रहती है
जब तक दोनों ओर के स्वार्थ 
संतुलित रहते हैं
स्वार्थ खत्म 
मित्रता खत्म
बात कड़वी है 
लेकिन सच है.

आपकी सूची में 
कोई ऐसा मित्र बताओ
जिसे आपकी जरूरत हो 
लेकिन 
आपको उसकी जरूरत न हो 
या कोई ऐसा मित्र ढूंढ कर बताओ
जिससे आपका कोई स्वार्थ न जुड़ा हो 

स्वार्थ भी कई तरह के होते हैं
अगर आपका स्वार्थ 
व्यक्तिगत हितों पर आधारित है
तब आपकी मित्रता भी 
व्यक्तिगत हितों तक सीमित होगी
यदि आपका स्वार्थ 
आपकी विचारधारा पर आधारित है
तब आपकी मित्रता भी
वैचारिक ईमानदारी तक कायम रहेगी
यदि आपका स्वार्थ 
शारीरिक सम्बन्धों पर आधारित है
तो आपकी मित्रता भी
आपकी संतुष्टि तक जारी रहेगी

मित्रता के दीर्घायु होने के लिए
स्वार्थों का चिरस्थाई होना आवश्यक है मित्र.

-शकील प्रेम

No comments:

Post a Comment

Pages