कुरान में कितना विज्ञान ? जाकिर नाइक का झूठ - तर्कशील भारत

Header Ads Widget

Thursday, July 9, 2020

कुरान में कितना विज्ञान ? जाकिर नाइक का झूठ

जाकिर नाइक जैसे कट्टरपंथी लोगों ने अपने धार्मिक बिजनेस को चमकाने की खातिर गजब के झूठ बोले हैं कुरान की बकवास आयतों को साइंटिफिक साबित करने के लिए जाकिर नाइक ने बड़ी चालाकी के साथ अर्थ का अनर्थ किया और भक्तों ने जाकिर की इस नाजायज कसरत पर यकीन भी कर लिया.

भक्तों की सबसे बड़ी समस्या यही होती है की उनके पास खुद का दिमाग नही होता वे भेड़ों की तरह दूसरे की बुद्धि से ही हाँके जाते हैं.

ऐसे बुद्धिहीन भक्तों के सहारे ही तमाम धर्मों का पूरा धार्मिक साम्राज्य खड़ा हुआ है जिन्हें अलग अलग धार्मिक गिरोह हांक रहे हैं अपने अपने धर्म की महिमा को बनाये रखने के लिए सभी धार्मिक गिरोह सदियों से इस तरह के षड्यंत्रों का सहारा लेते आये हैं.

धर्मग्रंथों की बकवास बातों को वैज्ञानिक साबित करने के लिए इनके पास सबसे कारगर तरीका तो यही होता है की इन ग्रंथों में लिखी बातों का अर्थ बदल कर उन्हें अपडेट कर कर दिया जाए ताकि भक्तों को आसानी से भरमाया जा सके और भक्तों को यह दिखा सकें की देखो हमारा धर्म कितना साइंटिफिक है हमारे धर्मग्रंथों में तो पहले से ही विज्ञान टैक्नोलॉजी मेडिकल साइंस कॉस्मोलॉजी कंप्यूटर एंड्रॉयड ऐसी पंखा बल्ब बिजली मोटर गटर सब मौजूद है. 

विडम्बना यह है की 99.9 लोग अपने धर्मग्रंथों को खोल कर भी नही देखते की असल में उनमें है क्या ? इसी का फायदा धर्म के धंधेबाज उठाते हैं और आयतों श्लोकों या मन्त्रों के वास्तविक अर्थ का अनर्थ कर हमेशा लोगों को भ्रमित करने की कोशिश करते हैं जाकिर नाइक ने कुरान की आयतों के साथ भी यही अनर्थ किया. आप खुद देख लीजिये.

क्या वास्तव में सूरह अम्बिया की आयत नम्बर 20 में ऐसा ही है आइये देखते हैं ?

जाकिर नाइक ने जिस आयत से बिगबैंग खोज निकाला असल में वहां ऐसा कुछ है ही नहीं इस आयत की पुरानी तमाम तफसीरों पर गौर करें तो यहां अर्थ कुछ और ही है सूरह अम्बिया की 30वी आयत का असली अर्थ यह है "पहले आसमान और जमीन बन्द थे हमने दोनों को खोल दिया" जाकिर नाइक ने बड़ी सफाई से इस आयत के अर्थ का अनर्थ कर दिया और इसे बता दिया की "पहले आसमान और जमीन मिले हुए थे फिर हमने इन्हें अलग किया".

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तो आसमान और जमीन के आपस में जुड़े होने की बात भी सरासर गलत है लेकिन इस तरह अर्थ का अनर्थ कर भक्तों को आसानी से बरगलाया जा सकता है सूरह अम्बिया की 30वी आयत में आसमान और जमीन के एक होने की बात तो है ही नहीं जैसा की जाकिर नाइक बता रहा है इस आयत में तो अल्लाह धरती और आकाश के बन्द होने की बात कर रहा है इसे ही बौद्धिक हरामखोरी कहते हैं जो आयतें स्पष्ट तौर पर कुरान के अवैज्ञानिक होने का प्रमाण दे रहीं हैं उन्ही को थोड़ा सा बदल कर उनसे विज्ञान निचोड़ने की नाजायज कोशिश की जा रही है इससे यह पता चलता है की किस तरह जाकिर नाइक ने विज्ञान के नाम पर आम मुसलमानों को बेवकूफ बनाया है ? और मुसलमानों के अंदर की वैज्ञनिक चेतना की हत्या की है.

अगर आप साइंस की थोड़ी भी समझ रखते हैं तो इस आयत को पढ़कर आप अपनी हंसी नही रोक पाएंगे.

क्या यह विज्ञान का मजाक नही है ? लेकिन जाकिर नाइक की स्पीच सुनने वाले भक्तों का साइंस से क्या सम्बन्ध ? उनके लिए तो ये दुनिया एक कैदखाना है जिसे काटकर जन्नत में जाना है जाकिर अपने भक्तों की इस साइकोलॉजी को अच्छी तरह समझता है तभी तो वह सरेआम झूठ बोलता है और भक्त उसके सफेद झूठ पर यकीन करते चले जाते हैं क्योंकि उन्हें तो हर हाल में जन्नत चाहिए बिना देखे बिना जांचे परखे जो ईमान लाये वही तो सच्चा मोमिन है बाकी सब तो काफिर हैं न !!

आसमान और जमीन मिले हुए थे फिर अल्लाह ने कहा की दोनों आ जाओ अपनी मर्जी से या मेरी मर्जी से !! इसका अर्थ है की जमीन और आसमान पहले से वजूद में थे तब अल्लाह ने क्या किया ? 

अब इस आयत पर गौर कीजिये 

इस आयत को साइंटिफिक साबित करने के लिए भी जाकिर ने बड़ी चतुराई से बौद्धिक भ्रष्टाचार किया है इस आयत में धीरे धीरे आहिस्ते आहिस्ते तो कहीं है ही नहीं जिसे यहाँ जाकिर ने जबरदस्ती फिट करने की कोशिश की है और अगर खुदा को यह कहना होता की धरती गोल है तो वह सीधे कहता न की हमने इस धरती को गोल बनाया लेकिन धरती गोल है यह बात तो अल्लाह के तसव्वुर से भी बाहर की बात थी क्योंकि कुरान के जरिये कॉन्टेक्ट करने वाला अल्लाह हजरत साहब के कुटिल दिमाग की उपज ही तो था इसलिए यूनिवर्स के बारे में अल्लाह उतना ही ज्ञान रखता था जितना हजरत साहब जानते थे.

कुरान में कितना विज्ञान छुपा है आइये यह भी देख लेते हैं.

21अल-अंबिया (Al-'Anbya'):31 - और हमने धरती में अटल पहाड़ रख दिए, ताकि कहीं ऐसा न हो कि वह उन्हें लेकर ढुलक जाए और हमने उसमें ऐसे दर्रे बनाए कि रास्तों का काम देते है, ताकि वे मार्ग पाएँ

यहां अल्लाह को पहाड़ों की उत्तपत्ति का थोड़ा भी ज्ञान नही वर्ना वह यह न कहता की पहाड़ ऊपर से रख दिए गये हैं और लुढ़कने वाली बात तो और भी हसस्यस्पद है.

अब जरा इस आयत को देखिये 
21अल-अंबिया (Al-'Anbya'):32 - और हमने आकाश को एक सुरक्षित छत बनाया

इस आयत से पता चलता है की जिओलॉजी के साथ अल्लाह को एस्ट्रोनॉमी की समझ भी नही है. वर्ना उसे मालूम होता की आकाश कोई छत नही है बल्कि शून्यता का नाम ही आकाश है.

कुरान की इस अगली गप्पबाजी पर गौर करें तो अल्लाह की पोल खुल जाती है 

21अल-अंबिया (Al-'Anbya'):104 - जिस दिन हम आकाश को लपेट लेंगे, जैसे पंजी में पन्ने लपेटे जाते हैं.

पुराने जमाने में एक लकड़ी पर कपड़ों में लिखे खतों को लपेट कर संदेश भेजे जाते थे जिसे पंजी कहा जाता थे यहां अल्लाह उसी का उदाहरण देते हुए समझाने की कोशिश कर रहा है की कयामत के दिन आकाश को पंजी पर कपडे की तरह लपेट देगा यानी अल्लाह का आकाश धरती के ऊपर कपड़े से बने किसी शामियाने की तरह टँगा हुआ है जिसे कयामत के दिन फोल्ड कर रख दिया जाएगा.

इस अगली आयत से भी यह बात साबित हो जाती है देख लीजिये
22अल-हज़ (Al-Haj):65 - क्या तुमने देखा नहीं कि उसने आकाश को धरती पर गिरने से रोक रखा है उसकी मर्जी हो तो बात दूसरी है 

25अल-फुरकान (Al-Furqan):59 - जिसने आकाशों और धरती को और जो कुछ उन दोनों के बीच है छह दिनों में पैदा किया

यानी की होजा कहने भर से धरती और आकाश नही बने बल्कि 6 दिन लग गये और जब धरती और आकाश थे ही नही तब 6 दिन की गिनती कैसे हुई ?

अब आगे की गप्पबाज़ी देखिये
डायनासोर अमीबा एवोल्यूशन गलैक्सिज सुपरनोवा ये सब तो बहुत दूर की बात है कुरान में तो अरब के बाहर की दुनिया के बारे में भी कुछ नहीं है लेकिन अल्लाह की गप्पबाजी की बात ही कुछ और है देख लीजिये

27अन-नम्ल (An-Naml):75 - आकाश और धरती में छिपी कोई भी चीज़ ऐसी नहीं जो इस स्पष्ट किताब में मौजूद न हो

अब इस आयत को देखिये जिसे पढ़कर मैं अपनी हंसी नही रोक पाया.

33अल-अहजाब (Al-'Ahzab):72 - हमने अमानत को आकाशों धरती और पर्वतों के समक्ष प्रस्तुत किया, किन्तु उन्होंने उसे उठाने से इनकार कर दिया और डर गए लेकिन मनुष्य ने उसे उठा लिया निश्चय ही इंसान बड़ा ही ज़ालिम है.

इसका अर्थ हुआ की आकाश धरती और पहाड़ों ने अल्लाह की बात मानने से इनकार कर दिया ये कैसा अल्लाह है जिसकी बात उसके चेले ही नही मानते ? 

वैसे ये अल्लाह भी न गजब का बन्दा है लेकिन अफसोस की लोग उसकी कद्र न जान सके यह बात मैं नही कह रहा हूँ बल्कि अल्लाह कुरान में खुद ही ऐसा बक रहा है देख लीजिये

39अज़-जुमार (Az-Zumar):67 - उन्होंने अल्लाह की क़द्र न जानी, जैसी क़द्र उसकी होनी चाहिए थी हालाँकि क़ियामत के दिन सारी की सारी धरती उसकी मुट्ठी में होगी और आकाश उसके दाएँ हाथ में लिपटा हुआ होगा.

अब इस आयत पर गौर कीजिये 

35फातिर (Fatir):1 - अल्लाह दो-दो, तीन-तीन और चार-चार बाज़ुओंवाले फरिश्तों को सन्देशवाहक बनाकर नियुक्त करता है.

संदेश भेजने के लिए तो एक हाथ ही काफी था फरिश्तों द्वारा ऐसा कौन सा संदेश भेजना था जिसके लिए इतने सारे हाथ उगाने की जरूरत पड़ गई ?

धरती को अल्लाह ने चादर की तरह कैसे बिछाया है ? वह भी देख लीजिये 

51अध-धारियात (Adh-Dhariyat):48 - और धरती को हमने बिछाया, तो हम क्या ही ख़ूब बिछानेवाले है

जो लोग अल्लाह को निराकार मानते हैं उन्हें इस आयत पर गौर करना चाहिए

69अल-हाक्का (Al-Haqqah):17 - कयामत के दिन अल्लाह के सिंहासन को आठ फरिश्ते अपने ऊपर उठाए हुए होंगे.

इस आयात से मालूम होता है की अल्लाह भी ग्रेविटी के नियमों से आजाद नही है वर्ना फरिश्तों को उसका सिंहासन सर पर उठाने की जरूरत ही क्यों पड़ती ?

किसी भी समाज की उन्नति उस समाज की प्रगतिशील सोच पर आधारित होती है हम दुनिया में इतने पीछे इसीलिए हैं क्योंकि हमने धर्म की सड़ी हुई रवायतों के आगे विज्ञान को कुछ समझा ही नहीं जब तक हम धर्म और इसकी सड़ी हुई मान्यताओं के बंधन से आजाद नही होंगे तब तक हम बेहतर सामाजिक व्यवस्था की कल्पना कर ही नही सकते. 




No comments:

Post a Comment

Pages