बेजुबान बकरों की सामूहिक हत्याओं का जश्न - तर्कशील भारत

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Tuesday, July 21, 2020

बेजुबान बकरों की सामूहिक हत्याओं का जश्न


यह आपके मजहब की जिद है
या आपकी जहालत की जीत 
मुझे नही मालूम
इतना जानता हूँ
की आपका यह त्योहार 
बेजुबान बकरों की 
सामूहिक हत्याओं का 
जश्न है
जिसे आप बकरीद कहते हो
यह बकरे की ईद नही
आपकी कुंठाओं की जीत है
इसलिए इसे बकरीद नही
बल्कि
मानवीय संवेदनाओं पर
इंसानी जहालत का 
उत्सव कहना ज्यादा उचित होगा

यह इंसानियत पर
पाखण्डों की जीत का जश्न है
यह निसर्ग की जैविक विविधताओं पर
इंसानी बेवकूफियों की विजय का हर्ष है
इसलिए इसे बकरीद नही
बल्कि
बेचारे बकरों की 
क्रूरतापूर्वक हत्याओं का
प्रायोजित कार्यक्रम कहना 
ज्यादा उचित होगा

सदियों पहले
किसी ने दी थी कुर्बानी
एक पशु की
यह इब्राहिम की कुंठा रही होगी
या 
यह बस उसका दिमागी फितूर था
किसी को नही मालूम
लेकिन 
हजारों साल पुराने उस झूठ पर
आज भी यकीन करने वाली जमातें
कुर्बानी के नाम पर
क्रूरता की हदें और इंसानियत की सरहदें 
पार कर देती हैं

इसलिए इसे प्राणियों के रुदन पर
मजहब की सड़ी हुई 
रवायतों की जीत का जश्न कहना 
ज्यादा उचित होगा

इब्राहिम का चाकू 
बेटे की गर्दन पर नही चल पाया
इसलिए वह 
अपने बेटे को कुर्बान नही कर पाया
इस घटना का गवाह कोई न था
क्योंकि वहां बाप बेटों के अलावा
तीसरा भी कोई न था
फिर भी
कबीले के जाहिल लोगों ने 
इब्राहिम की बातों पर 
यकीन किया 
उस काल और परिस्थितियों में
जो भी हुआ 
उसमे कुछ भी गलत या सही नही था
लेकिन 
आज यह सरासर गलत है
क्रूरता की इंतहा है
बेवकूफियत की हद है
और जहालत का 
सबसे निकृष्ट कुकर्म है 

इसलिए 
इसे त्योहार कहना ठीक नही
बल्कि 
आधुनिकता पर
सदियों पुरानी मान्यताओं की 
जीत कहना ज्यादा उचित होगा

-शकील प्रेम

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