बकरे की आत्मकथा - तर्कशील भारत

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Tuesday, July 21, 2020

बकरे की आत्मकथा




बकरे की आत्मकथा-

मैं बकरा हूँ लेकिन फिलहाल बेजुबान नही हूँ
इसलिए आज मैं आपको अपनी आत्मकथा सुना रहा हूँ.

मैं कहाँ पैदा हुआ मुझे ठीक ठीक याद नही हाँ इतना जरूर याद है कि हम 5-6 भाई बहन थे भूरे रंगों वाली मेरी माँ के सभी बच्चे भूरे नही थे 2 को छोड़कर बाकी बच्चे कुछ ब्लेक कुछ वाईट रंगों में भूरे रंग को समेटे हुए थे.

मां के साथ बिताए वो पल ज्यादा दिनों तक के लिए नही थे कुछ ही दिनों में मां के बच्चे बिकने शुरू हुए और आखिर में अपनी माँ के साथ मैं ही अकेला बचा जिसे मैं अपनी खुशकिस्मती समझ बैठा था लेकिन जल्द ही मेरा यह भ्रम टूटा और एक दिन फिर से दो पैरों पर चलने वाले कुछ प्राणी आए और हम चार पैर वालों की कीमतें तय करने लगे मुझे और मेरी माँ के कानों को ऐंठा दांतों को गिना और हमारे खुरों की जांच की.

मेरे मालिक और उन खरीदारों के बीच मोल भाव होने लगा मुझे लगा बिकने की बारी अब मेरी है लेकिन थोड़ी देर में ही मुझे पता चल गया कि बारी मेरी नही मेरी माँ की थी.

मेरी माँ के गले की रस्सी अब नए हाथों में थी वो मुझे यूँ छोड़कर कभी न जाती लेकिन हालात से मजबूर थी अपनी वेदनाओं को कहती भी तो किससे ? उसकी सुनता कौन ? और उसकी पीड़ा को समझता भी कौन ? एक मैं ही तो था जो अपनी मां के उस दर्द को महसूस कर सकता था और जुदाई के उस आखिरी क्षण में मैंने महसूस किया भी की एक माँ जब अपने बच्चे से बिछड़ती है तब उस मां पर क्या गुजरती है ?

हालांकि मेरी माँ के लिए बच्चों की जुदाई के ऐसे क्षण कई बार आये लेकिन वह आज जिस क्षण को जी रही थी वह उसके लिए कितना मुश्किल था इसे उस समय बस मैं ही समझ सकता था.

थोड़ी देर में माँ, मेरी आँखों से ओझल हो गई मैंने उस रात कुछ नही खाया और अगले कई दिनों तक मुझे कुछ भी अच्छा नही लगा वह जगह जहां उस वक्त मैं बंधा हुआ था दुनिया का सबसे निकृष्ट स्थान बन चुका था मेरे लिए.

मैं कितना भी भुलाने की कोशिशें करता लेकिन बार बार मेरी माँ का उदास चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता मैं विचलित होता तड़पता लेकिन मैं कर भी क्या सकता था ?

एक साल के बाद इंसाननुमा एक नया प्राणी आया मोल भाव शुरू हुआ मेरे कान ऐंठे गए मेरे खुरों दांतों को चेक किया गया और फिर मेरे गले की रस्सी एक नए हाथों में थमा दी गई मैं बहुत खुश था कि कम से कम इस नरक से आज़ादी तो मिली ?

नए मालिक को मन ही मन धन्यवाद करते हुए मैं उसके साथ आनजाने स्थान की ओर निकल पड़ा.

नई जगह पर मैंने देखा कि मेरी तरह कई और बकरे भी गले मे रंग बिरंगी रस्सियों के साथ वहां मौजूद हैं और मेरे जैसे ये तमाम बकरे भी मेरी ही तरह अलग अलग जगहों से लाकर यहां इकट्ठे किये गए हैं.

अब मुझे थोड़ा थोड़ा समझ मे आ रहा था कि मैं एक ऐसी दुनिया मे, और एक ऐसी प्रजाति में पैदा हुआ हूँ जिसकी जिंदगी दो पैरों पर चलने वाले उन प्राणियों के हाथों में है जिन्हें इंसान कहा जाता है.

कुछ ही दिनों में मैं यहां से भी बेचा गया फिर से नई जगह नए लोग. मैंने देखा कि यहां भी बकरों का वैसे ही मोल भाव हो रहा है जैसे मेरा और मेरे परिवार के साथ हुआ था लेकिन शायद तब मैंने ध्यान नही दिया था कि इस पूरे हस्थानांतरण के खेल में कागज के कुछ पत्ते इस्तेमाल होते हैं जिन्हें ये लोग नोट कहते हैं और मैंने यह भी देखा कि कागज के नोटों का वजन बढ़ाने के लिए इंसानो की यह प्रजाति किसी भी हद तक जा सकती है.

कुछ दिनों के बाद ही मैं कई हाथों से गुजरते हुए एक नए बाजार में पहुंच गया जहां मेरे चारो ओर दो ही प्रजाति थी बकरा और इंसान.

अर्सा बिता, उम्र के इस पड़ाव तक आते आते मैंने इंसानों के कई तरह के व्यापार देख लिए मैंने यह भी देखा कि इंसान के बनाये कई अलग अलग बाजारो में केवल बकरों की ही बोलियां नही लगती कागज के कुछ टुकड़ों के बदले इंसान भी बेचे और खरीदे जाते हैं इंसानी बच्चों को भी ठीक वैसे ही बेचा जाता है जैसे बकरी के बच्चों को.

इंसानी बाजार में सबकुछ बिकाऊ है सिवा उस दर्द के जिसे मैंने अपनी माँ की आंखों में महसूस किया था यहाँ सबकुछ बिकता है रिश्ते नाते विश्वाश और आस्था सबकुछ.

मैं इस इंसानी दर्शन की गहराई को समझना चाहता था कि आखिर ये लोग किस मिट्टी के बने हैं ? आखिर इन्हें कागज की उस रद्दी से इतना मोह क्यों है जिससे एक बकरी का पेट भी न भरे ?

साथ ही मैं यह भी समझना चाहता था कि ये लोग हमारी इतनी फिक्र क्यों करते हैं अपने मेहनत की कमाई हम पर क्यों खर्च करते हैं ?
हमे पालते हैं पोसते हैं हमारा खयाल रखते हैं फिर हमें बेच देते हैं जो अगला इंसान हमे खरीदता है वह भी हमे पालता है पोसता है फिर आगे बेच देता है क्यों ?

मैंने पाया कि दुनिया के सभी प्राणियों में इंसान नामक यह प्रजाति ही सबसे मक्कार है जो अपने स्वार्थों की खातिर किसी भी हद तक जा सकता है लेकिन वह हमारी इतनी देखभाल क्यों करता है ? यह बात अभी तक मैं समझ नही पाया था.

एक दिन अचानक शाम के समय कुछ नए लोगों के हाथों में एक बार फिर से मेरी डोर थी कागज के कुछ टुकड़ों के बदले एक बार फिर से मेरी बोली लग चुकी थी मैंने अबतक इसे ही अपनी नियती समझ लिया था न जाने और कितने हाथों में मेरी डोर जाएगी न जाने और कब तक बिकूँगा ? न जाने और कितने बाजारों तक पहुँचूँगा ?

इसी जद्दोजहद में मैं पहुंच गया एक नए घर की दहलीज तक जहां बहुत से लोग पहले से मेरा इंतजार कर रहे थे.

मेरी आवभगत शुरू हुई कोई मुझे सहला रहा था कोई मेरे दांतो को गिन रहा था कोई मेरे बालों में लगी धूल को साफ कर रहा था कुछ बच्चे मुझसे डर रहे थे तो कुछ बच्चे मुझसे चिपट रहे थे.

उनके इस अपनेपन में मुझे मेरी माँ की याद आ गई जिसे मैं भूल गया था.

मैं सोच रहा था कि इस समय वह कहां होगी ? क्या अब भी उसे मेरी याद सताती होगी ? कही वह मर तो नही गई होगी ? क्योंकि लंबा वक्त गुजर चुका है और मरना तो सभी को है ?

कितना अच्छा होता कि हमारा पूरा परिवार साथ साथ होता ? मेरे भाई बहन... न जाने वे सब के सब कहाँ होंगे ?

आज का दिन मेरे लिए कुछ खास है ऐसा पता नही क्यों ? सुबह से मुझे एहसास हो रहा है की आज मेरे साथ कुछ बड़ा होने वाला है.

पिछले दो दिनों से मुझे स्वादिष्ट पत्ते खिलाये जा रहे हैं मेरे रहने की जगह को बार बार साफ सुथरा किया जाता रहा कई अनजाने लोग मुझे देखने पहुंचे सब न जाने क्यों मुझसे इतना अपनापन जता रहे हैं की मैं हैरान हूँ.

आज मुझे सुबह सुबह उठा कर नहला दिया गया है घर की औरतें मेरे जिस्म को साफ कर चुकी हैं.

अब मैं देख रहा हूँ मेरे चारों ओर लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है मेरे आसपास बर्तन रखे गए है और साथ मे कुछ हथियार भी...

अब मैं इस पूरे इंसानी दर्शन को समझ चुका हूँ मैं समझ चुका हूँ कि माजरा क्या है ? अब मैं यह भी जान चुका हूँ कि मेरी माँ कहाँ गई ? मेरे भाई बहन सब के सब इस एक प्रजाति की बनावटी भूख का शिकार हुए हैं जिसे इंसान कहते हैं.

जो इंसान बूढ़ी होने पर अपनी माँ तक को बर्दास्त नही करता और वह उसे वृद्धाश्रम में छोड़ आता है उसने मेरी माँ बहनों के साथ वही किया होगा जो अभी थोड़ी देर में मेरे साथ होने वाला है अभी बस कुछ ही देर में मेरी नजरों के सामने खड़ी भीड़ में से कुछ लोग निकल कर आएंगे मुझे पकड़ कर जमीन पर पटक देंगे उनमे से कोई एक सामने पड़ी छुरी से मेरी गर्दन मेरे जिस्म से अलग कर देगा फिर मेरी खाल उतारी जाएगी फिर मुझे बीच मे से चीर कर दो भागों में बांट दिया जाएगा उसके बाद मेरी चारों टांगे अलग कर दी जाएंगी फिर मेरी आंतों को निकाल कर उसे साफ किया जाएगा उसके बाद मेरे छोटे छोटे टुकड़े किये जायेंगे और फिर मेरे वजूद को यह इंसानी जमात बांट लेगा आपस में और अगले कुछ दिनों तक प्रतिदिन मेरे जिस्म के टुकड़ों पर बकरीद मनाई जाएगी.

यह पूरा खेल तब से चल रहा है जब इंसानों के किसी परदादा ने किसी के बहकावे में आकर अपने बेटे की गर्दन पर छुरी रखी थी लेकिन उस बालक का सौभाग्य मेरी कौम का दुर्भाग्य कैसे बन गया पता नही.

तीन दिनों के इस इंसानी आयोजन में मेरी प्रजाति के करोड़ों बकरे कुर्बान कर दिए जाएंगे.

कई मंदिरों की दहलीजों पर भी मेरी कौम के कई सदस्य प्रतिवर्ष कुर्बान किये जाएंगे वहां भी वही सब दोहराया जाएग जो यहां अभी मेरे साथ होने वाला है फर्क बस इतना है कि दोनों जगह के इंसानों के लिए बकरों की शहादत की वजहें अलग अलग हैं और उन शहादतों से खुश होने वाला उनका परमात्मा भी अलग अलग है.

दोनों तरह के इंसानी गिरोहों द्वारा अंजाम दिए जाने वाले इस धार्मिक बकरासंहार के अलावा भी पूरे साल मेरी कौम के सदस्यों की खरीद फरोख्त होती रहेगी कागज के बदले कोई हमे खरीदेगा कोई बेचेगा कोई कटेगा कोई हमारे जिस्म के टुकड़ों को आग में भून कर खायेगा अनेकों डिशें हमारी लाशों से तैयार होंगी होटलों में ढाबों पर हमारे जिस्म के टुकड़ों को मसालेदार बनाकर परोसा जाएगा और कहा जाता रहेगा कि "मटन लाजवाब बना है".

सीजन में 700 रुपये तो ऑफ सीजन हमारे जिस्म की कीमत 500 रुपये प्रति किलो तक बनी रहेगी.

तभी जोर की आवाज गूंजी "बिस्मिल्लाहिररह्मानुररहीम" और बकरे की आत्मकथा अचानक यही समाप्त हो गई....

-शकील प्रेम

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