इमारतों का धर्मांतरण - तर्कशील भारत

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Sunday, July 12, 2020

इमारतों का धर्मांतरण



भीड़ के सहारे
जब भी धर्म 
राजनीति के कंधों पर 
सवार होता है
उसे और अधिक 
भीड़ की जरूरत होती है
और इस भीड़ का 
उसके पक्ष में होना
उससे भी ज्यादा 
जरूरी होता है
इसलिए बड़े पैमाने पर
धर्म का ढिंढोरा पीटा जाता है
साथ ही
बड़े पैमाने पर 
धर्म का बखेड़ा भी
खड़ा किया जाता है
धर्म और राजनीति के 
इस गठजोड़ को
स्थाई बनाये रखने के लिए
कन्वर्जन का खेल भी 
बड़े पैमाने पर
खेला जाता है
और
इंसानों के कन्वर्जन से पहले 
इमारतों का 
कन्वर्ट होना जरूरी होता है 
क्योंकि इमारतें 
विरोध नही करती 
इमारतें चीखती नहीं
और विलाप भी नही करती
वह तो आसानी से 
किसी भी रंग की हो जाती है
इमारतें जिसके कब्जे में होती हैं 
इनके माथे पर सिंदूर भी 
उसी मालिक के रंग का होना चाहिए 
इमारतें 
तब तक ही सार्वजनिक होती हैं 
जब तक उनका मालिक 
कमजोर होता है 
जहां भी कट्टरपंथ हावी होता है 
उसकी पहली शिकार 
इमारतें ही होती हैं.

-शकील प्रेम

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