अन्धविश्वाश की हद- कुर्बानी - तर्कशील भारत

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Monday, July 20, 2020

अन्धविश्वाश की हद- कुर्बानी


मेरे रिश्तेदारों में लगभग सभी अल्लाह मियां के सच्चे वाले बन्दे हैं इसलिए कुर्बानी की तैयारी में लगे हैं कुछ ने बकरा खरीद लिया है कुछ खरीदने के जुगाड़ में लगे हैं यह सब इसलिए क्योंकि वे मुसलमान हैं और इस्लाम में कुर्बानी का बड़ा महत्व है साथ ही होड़ भी है की उसने किया तो मैं क्यों न करूँ ? 

हज के मामले में भी कुछ इसी तरह की होड़ चलती है पहले हज करना बहुत बड़ी जंग जीतने जैसा था इसलिए जो हज कर वापस लौटते थे वो अपने साथ हाजी जी का तमगा भी साथ लिए आते थे जिसे मरते दम तक संभाले रखते थे हालांकि मेरी खुद की सात पीढ़ियों में किसी ने यह तमगा हासिल नही किया. 

खैर, बात हो रही थी कुर्बानी की तो बालों से भी बारीक सिरात के पुल को पार करना है सो कुर्बानी तो करनी ही पड़ेगी न !! वर्ना मसला कैसे हल होगा ? इसलिए जानवरों को मारो मेरा मतलब है कुर्बानी करो और तीन दिनों तक छक के गोश्त खाओ.

मेरे जैसा कोई जाहिल तुम्हे टोके तो वो पुराना वाला घिसा पिटा सा जुमला उसके मुंह पर दे मारो की कुर्बानी में गरीबों को भी गोश्त मय्यसर हो जाता है इसलिए यह जरूरी है.

जिस गरीब की चिंता आपके अल्लाह को नही उसकी चिंता में तुम कुर्बानी कर रहे हो गजब की फिलॉसफी है जनाब !! जब उसी गरीब के बच्चे पढ़ाई छोड़ मेकेनिक की दुकान पर हाथ में पेंचकस पकड़ने पर मजबूर होते हैं तब आपकी यह फिलॉसफी कहाँ चली जाती है ? आपके अपने रिश्तेदारों में बहुत से फटेहाल हैं लेकिन आप साल भर में कभी पूछने भी नही जाते की वे किस हाल में हैं ? तो सीधे सीधे कहो न की कुर्बानी का गरीबों के उद्धार से कोई लेना देना नही. यह तो हमारी मजहबी खुजली है जिसे मिटाने में मजा आता है वर्ना सैंकड़ों सालों की कुर्बानी का रिजल्ट तो शून्य ही है न !!

अल्लाह को प्यारी है कुर्बानी !! यह आपको कैसे पता चला ? 1400 साल पहले अरब के रेगिस्तान में एक व्यक्ति वहां के जाहिलों को बेवकूफ बना गया और बेवकूफियत का वह सिलसिला आज हम तक पहुंचा जिसे हम भी ढो रहे हैं क्यों ? 

कौन इब्राहिम कैसा इब्राहिम और किसका इब्राहिम ? इसपर कभी गौर किया ? नहीं, क्योंकि ग़ौरोफिक्र करना तो कुफ्र की अलामत है न !! तो फिर भेड़चाल ही ठीक, क्योंकि यही तो इस्लाम है.

-शकील प्रेम

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