एक मित्र को जवाब- मैं गांधी का बन्दर नही - तर्कशील भारत

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Saturday, July 18, 2020

एक मित्र को जवाब- मैं गांधी का बन्दर नही



एक मित्र को जवाब-

मैं खुद को कवि नही कहता 
न ही मैं लेखक हूँ 
जो समझता हूँ वो लिखता हूँ 
जब भी बेचैन होता हूँ 
लिखता हूँ 
खुशी गम दुख आँसू शोषण 
जो दिखता है लिखता हूँ 
मैं कोई लेखक नही हूँ 
कवि नही 
खुद को 
इंसानों की 
पंक्ति में खड़ा कर सकूँ 
इसलिए लिखता हूँ 
आप कहते हैं 
"ऐसा कब तक चलता रहेगा ? 
चींटी बराबर कोशिश कर 
अपने जीवन की सार्थकता 
सिद्ध करनी ही होगी न" 
तो आपको बता दूँ 
मैं फेसबुकिया 
क्रांतिकारी नहीं हूँ
शोशल मीडिया के बाहर भी
समाज की सड़ी हुई 
मानसिकता के विरुद्ध 
मैं लड़ रहा हूँ 
धरातल पर 
अपने हिस्से का परिवर्तन भी
मैं कर रहा हूँ 
इसके लिए मुझे आपसे 
कोई रिवार्ड की दरकार नही
मैं जो भी करता हूँ
खुद की संतुष्टि के लिए ही करता हूँ
लिखता हूँ लड़ता हूँ
यह सब मैं 
खुद के लिए करता हूँ
क्योंकि
गांधी जी का बन्दर बनकर जीना,
मुझे पसन्द नही
मैं इंसान बनने की प्रक्रिया में हूँ
इसलिए
मैं देखता भी हूँ
सुनता भी हूँ 
और कुछ हद तक 
बोलता भी हूँ
मैं जिस समाज मे पैदा हुआ 
उसकी विसमताओं को 
थोड़ा बहुत कुरेद कर ही 
आखिरी सांस लूंगा 
और तब ही 
अपने जीवन को 
सार्थक भी समझूंगा 
यही मेरा प्रण है.

-शकील प्रेम


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