अगला अफगानिस्तान बनने की ओर तुर्की - तर्कशील भारत

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Wednesday, July 15, 2020

अगला अफगानिस्तान बनने की ओर तुर्की


प्रथम विश्वयुद्ध के तुरन्त बाद तुर्की में कमाल अतातुर्क पाशा के नेतृत्व में तुर्की का बच्चा बच्चा 6 सौ साल पुरानी राजशाही को खत्म कर एक नए तुर्की की नीव रखना चाहता था ऐसा तुर्की जो पुरानी परम्पराओं को तोड़कर बदलती दुनिया के साथ चल सके.

उस दौर में उस्मानी खिलाफत और उस्मानी राजशाही के प्रति लोगों में इस हद तक नफ़रत पैदा हो चुकी थी की यदि कोई इनका हिमायती होता तो लोग ही उसकी हत्या कर देते ये वो दौर था जब बड़े पैमाने पर मुल्ला और उलेमाओं का कत्लेआम हुआ अतातुर्क ने दाढ़ी और हिजाब पर बैन लगा दिया मस्जिदों में भीड़ पर पाबंदी लगा दी और जल्द ही उस्मानी राजशाही और खिलाफत का केंद्र रही हाजिया सोफिया को मस्जिद से म्यूजियम में बदल दिया.

1921 से 1925 के बीच तुर्की के मुसलमान खिलाफत के खात्मे का जश्न मना रहे थे और इसी समय भारत के मुसलमान खिलाफत कायम रहे इसके लिए बड़े पैमाने पर आंदोलन कर रहे थे.

जब भारत में गांधी जी अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन चला रहे थे और बाबा साहब अम्बेडकर जातिवाद छुआछूत और ब्राह्मणवादी मानसिकता के विरुद्ध अपनी आवाज बुलन्द कर रहे थे उसी दौर में भारत के मुसलमान भी एक आंदोलन चला रहे जिसे खिलाफत आंदोलन कहा जाता है 

गांधी जी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया उनका मानना था की अंग्रेजों के खिलाफ उनके आंदोलन को इससे ताकत मिलेगी क्योंकि तुर्की में खिलाफत को खत्म करने में सबसे बड़ा हाथ ब्रिटिश हुकूमत का ही था.

आज भारतीय उपमहाद्वीप के जो लोग हाजिया सोफ़िया को फिर से मस्जिद बनाये जाने के तुर्की के फैसले का समर्थन कर रहे हैं वो नही जानते की इससे वह दुनिया को क्या संदेश दे रहे हैं ? इससे यह पता चलता है की इस्लाम कितना असहिष्णु है ? क्या तुर्की में मस्जिदों की कमी हो गई है ? नही न !! फिर एक सनकी हुक्मरान की सनक का समर्थन क्यों ? दूसरे मुस्लिम देशों को तो यहां इंसानियत दिखानी चाहिए थी लेकिन नहीं, वो तो बढ़ चढ़ कर राष्ट्र्पति रजब तय्यब यरदोगोन का समर्थन कर रहे हैं आखिर क्यों भाई ? म्यूजियम से क्या दिक्कत है ? है तो तुर्की के कब्जे में ही न ? फिर इतनी हायतौबा किसलिये ? 

जब भी किसी देश पर कट्टरपंथ हावी होता है तो वह तरक्की के सारे फाटक बन्द कर देता है एक सदी पहले तुर्की ने अतातुर्क के नेतृत्व में तरक्की के जो दरवाजे खोले थे उसी का नतीजा है की आज तुर्की किसी भी यूरोपियन मुल्क से जरा भी कम नही है ऊंची इमारते खूबसूरत सड़कें टूरिज्म पर आधारित मजबूत अर्थव्यवस्था यही तुर्की की पहचान है लेकिन अब पाकिस्तान जैसे कट्टरपंथी मुल्कों के जाहिल उलेमाओं की सरपरस्ती में तुर्की भी पाकिस्तान बनने की ओर कदम बढ़ा चुका है और आने वाले समय में रजब तय्यब यरदोगोन तुर्की के जियाउलहक ही साबित होने जा रहे हैं.

मुसलमानों की इस मानसिकता की वजह से ही इस्लाम की बुनियाद की ईंटें तेजी से खिसक रही हैं अगले सौ साल के भीतर ही इस्लाम की 1400 साल पुरानी इमारत भरभरा कर गिर जाएगी और तब पूरी दुनिया में इस्लाम का केवल खंडहर ही बाकी रहेगा जिसे हजारों साल तक प्रगतिशील लोग अपने पैरों तले रौंदते रहेंगे.

-शकील प्रेम

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