धर्म - तर्कशील भारत

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Friday, June 5, 2020

धर्म

जल का गुण है कि वह गीला ही करेगा अग्नि का गुण है कि वह जलाएगा कुत्ते का गुण है कि वह मांस खायेगा मदिरा का गुण है कि वह बहका देगा उल्लू और चमगादड़ का गुण है कि वह निशाचर है इंसान का गुण है कि वह एक सामाजिक प्राणी है स्वाभाविक गुणों के बिना इन सब का कोई आस्तित्व ही नहीं अगर मनुष्य के धर्म का तात्पर्य उसके नेचुरल गुण से है तब इसे मानने अथवा न मानने का कोई औचित्य ही नहीं. अब बात करते हैं उस नकली धर्म की जो ईश्वर खुदा या गॉड की चापलूसी से शुरू होता है तब इसके लिए किताब की आवश्यकता होगी ही क्योंकि यह प्योर बिजनेस है जो आस्था के नाम पर ही चलता है धर्म के नाम पर लूट झूठ और शोषण का यह व्यापार सदियों से चल रहा है ऐसा कृत्रिम धर्म असल मे मानसिक विकारों की वह अवस्था है जो हमे विरासत में मिलता है और जिसे हम गधे की तरह ढोते चले जाते है. मैं समझता हूँ की वैचारिक कूड़ेदान के इस बोझ को उतार फैंकने वाला ही मनुष्य कहलाने का हक रखता है न कि इसे अंधभक्तों की तरह ढोने वाला. आप देख लीजिए उन धार्मिक देशों का हाल जो धर्म से चलते हैं वहां के अधिकांश इंसान जानवरों से भी बदतर स्थिति में हैं और इसके उलट जिन देशों में धार्मिकता की यह मानसिक बीमारी जितनी कम है वहां के लोग उतने ही ज्यादा खुशहाल हैं.

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