मैं मजदूर हूँ. - तर्कशील भारत

Header Ads Widget

Monday, June 8, 2020

मैं मजदूर हूँ.




मैं मजदूर हूँ.

मजदूर के अलावा 
मेरी और भी कई पहचान है 
मैं मजदूर हूँ साथ ही
ग्राहक वोटर हिन्दू सिख ईसाई 
या मुसलमान भी हूँ
लोक तंत्र का "लोक" मैं ही तो हूँ
सियासत की 
ऊंची कुर्सियों के नीचे का फर्श भी
मैं ही हूँ
मुझ पर ही 
जम्हूरियत के सारे पिल्लर टिके हैं
हाशिये पर खड़ा 
सबसे आखिरी आदमी भी मैं ही हूँ 
और राजनीति की ऊंचाइयों तक 
जो सीढियां जाती है
उसका पहला पायदान भी मैं ही हूँ 

धर्म की ऊंची अट्टालिकाओं का निर्माण
मेरे हाथों से होता है
मेरे दान आस्था और मेरी इबादतों से 
धर्म मजबूत होता है
धर्म के बाजार का सेंसेक्स 
मेरी जहालत से परवान चढ़ता है 
और मेरी जागरूकता से नीचे गिर जाता है
धर्म के लिए यह जरूरी है की
वह जितना चाहे गिरे 
लेकिन उसका सेंसेक्स 
कभी न गिरे 
इसलिए
धर्म लगातार तय करता रहता है की
मैं एक अच्छा मजदूर होने के साथ साथ 
एक आदर्श भक्त भी बना रहूँ
मेरे लिए ही गढ़ी गईं हैं 
जन्नत की जवानियाँ
नबियों की निशानियां
अवतारों के किस्से
और देवताओं की कहानियां
ये सब मेरे लिए ही तो बकी गईं
मेरे लिए ही लिखीं गई
हदीसें कुरान और धर्मग्रन्थ
मेरे लिए ही पैदा हुए 
नबी महात्मा और सन्त
असंख्य भगवानों की लीलाएं 
ऋषियों का तप और उपासनाएँ
अप्सराओं के जलवे और वासनाएं 
भक्त कवियों की ईश्वरीय रचनाएं
ये सब मेरे लिए ही तो रची गईं
लेकिन ये सब मिल कर भी
मुझे इंसान न बना पाये
और ये सब मिलकर भी
मेरे संकटों का कोई 
हल न निकाल पाये
आज मेरे पास 
परम्परा आस्था मान्यतायें रिवाज 
अक़ीदे और कर्मकांडों का ढेर सारा कचरा तो है
लेकिन मैं अधिकार न्याय 
और मुट्ठीभर संवेदनाओं से बहुत दूर हूँ
क्योंकि मैं मजदूर हूँ 

कहते हैं मेरे वोट से ही
देश का भविष्य तय होता है
राजनीति के सारे दांव पेंच
मेरे मतदान के बाद ही शुरू होते हैं
पक्ष विपक्ष का खेल भी 
मेरे वोट से ही चलता है
मेरे वोट से ही 
मंत्री गृहमंत्री प्रधानमंत्री तय होते हैं
और फिर मेरा वोट ही 
तय करता है 
किसको जेड प्लस 
एक्स प्लस या वाई प्लस सुरक्षा मिलेगी
फिर यही सुरक्षित लोग
मिलकर तय करते हैं 
मैं क्या खाऊं क्या पिंयु 
किसे मानूँ और कैसे जिऊँ ?

बच्चों की भूख 
और उनकी जरूरतें
मुझे पलायन को मजबूर करती हैं
परिवार की परेशानियां और उनके दुख
मुझे मेरे घर से दूर करते हैं
इसलिए मैं बड़े सपनों को
अपने छोटे से थैले में ठूस लेता हूँ
और आंखों में 
उज्ज्वल भविष्य की कामना लिए
अपने छोटे से देश को छोड़ कर
बड़े प्रदेशों की ओर निकल पड़ता हूँ

ट्रेन की जनरल बोगी में बैठते ही
मेरे गांव के साथ मेरा देश भी 
पीछे छूट जाता है
रह जाती हैं तो कुछ यादें
मां का उदास चेहरा
बीबी की खामोश आंखें 
बच्चों की फरियादें 
भाई बहनों की उम्मीदें
जिन्हें मैं बड़े जतन से 
सहेज कर रख लेता हूँ
मुझ जैसे मजदूरों से भरे जनरल डिब्बे में
थोड़ी सी जगह के लिए
लड़ते हुए छोटे लोगों की 
छोटी बातों को देखकर 
जब भी ऐसा लगता है की 
मेरा देश छोटा है ?
ट्रेन की छोटी सी खिड़की से 
बाहर झांककर
विशाल भारत के दर्शन कर लेता हूँ

आखिरी स्टेशन तक पहुंचने से पहले ही
मेरी अनगिनत चीजें खो जाती है
जिनमें सबसे कीमती वो यादें ही होती हैं 
जिन्हें बड़ी जतन से 
सहेज और समेट कर 
गांव से शहर तक पहुँचता हूँ
और यहां दिन भर खटता हूँ 
महंगा राशन महंगा किराया 
और महंगे लोगों के बीच
किसी तरह 
अपनी सस्ती सी जिंदगी को बचाता हूँ
और बड़े लोगों के 
ऊंचे भवनों को बनाता चला जाता हूँ
देश के विकास की 
लम्बी दूरियों को कम करने के लिए
बड़े बड़े हाईवेज़ का निर्माण करता हूँ
विशाल प्राइवेट स्कूल बनाता हूँ 
जिसमें भविष्य के 
नेता अभिनेता और पूंजीपति पड़ते हैं
लोकतंत्र की मजबूती के लिए
सरकारी भवनों को तैयार करता हूँ 
डैम ओवरब्रिज हॉस्पिटल 
हाउसिंग सोसाइटी कॉम्लेक्स शॉपिंग मॉल
होटल्स और मेट्रो 
कंक्रीट का यह पूरा जंगल
मैंने ही दिहाड़ी पर उगाया है 
जिसमे अब 
मोटी सेलरी वाले वो सभ्य लोग रहते हैं 
जो मुझे लेबर कहते हैं 
वे सभ्य हैं और मैं सभ्यता से कोसों दूर हूँ
क्योंकि मैं मजदूर हूँ.

-शकील प्रेम

No comments:

Post a Comment

Pages