मैं नास्तिक हूँ इसलिए आख़िरत से डरता हूँ - तर्कशील भारत

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Friday, June 19, 2020

मैं नास्तिक हूँ इसलिए आख़िरत से डरता हूँ

मैं आख़िरत को मानता हूँ लेकिन उस आख़िरत को नही जो मरने के बाद है बल्कि उस आख़िरत को मानता हूँ जो मृत्यु से पहले मुझे जीते जी भोगना है वह भी इसी दुनिया में, मेरा आख़िरत मुझे जीते जी भोग कर मरना है और मैं उसी आख़िरत के डर से इंसान बनने की प्रक्रिया में लगा हूँ. 

मेरे लिए यह जीवन तीन सवालों के जवाब तलाशने का पजल है वो तीन सवाल हैं मैं कौन हूँ मुझे क्या करना है और मैंने क्या किया ?

मृत्यु पर किसी का बस नहीं जो पैदा हुआ उसे मरना ही है मैं जिन तत्वों का मिश्रण हूँ वे सभी तत्व मेरे मरने के बाद भी सृष्टि का हिस्सा ही रहेंगे लेकिन किसी और रूप में, मृत्यु तो होगी लेकिन कुछ भी खत्म नही होगा मेरे शरीर का हाइड्रोजन हाइड्रोजन में मिल जाएगा मेरे शरीर का फास्फोरस ऑक्सीजन कार्बन नाइट्रोजन आयरन क्लोरीन और मीथेन यह सब नेचर में विलीन होकर किसी नई रचना का हिस्सा हो जाएंगे.

बीज से पौधा पौधे से पेड़ पेड़ से फल और फल से बीज हो जाता है या बीज से पौधा पौधे से पेड़ पेड़ से लकड़ी लकड़ी से कोयला कोयले से कार्बन और कार्बन फिर से पेड़ का हिस्सा हो जाता है इस तरह पुनर्जन्म तो होता है लेकिन वैसा कभी कुछ नही होता जैसा तमाम धर्म दावा करते हैं.

किसका जीवन कितना लम्बा होगा यह कोई नही जानता फिर भी औसतन 75 साल के जीवन को 3 भागों में बांट दीजिये तीन भाग और तीन सवाल. 0 से 25 वर्ष के बीच पहला भाग जीवन के इस पहले पड़ाव के आखिर तक हमे यह जानना होता है की मैं कौन हूँ ? 

यह कोई साधारण सवाल नही है पहला पड़ाव पूरा होने तक  हमारी परवरिश से हमें इस महत्वपूर्ण सवाल का झुठा या सच्चा जवाब मिल ही जाता है की मैं कौन हूँ ? और यह जवाब इस बात पर निर्भर करता है की हम किस समाज परिवार और व्यवस्था का हिस्सा रहे.

परिवार समाज व्यवस्था और परिस्थितियां मिलकर हमारा और हमारी सोच का निर्माण करती हैं जिसके द्वारा हम खुद से इस सवाल का जवाब तलाश ही नही पाते की मैं कौन हूँ ?

0 से 25 के बीच जीवन के इस पहले पड़ाव में कई मोड़ आते हैं इसी दौर में हम माँ के आँचल से निकलकर पूरी पृथ्वी का हिस्सा बनते हैं इस बीच हर नया पल हमे बहुत कुछ नया सिखाता है यह सीखने का समझने का वक्त होता है हमारी दुनिया माँ की गोद से शुरू होती है जहां हम रिश्तों को समझते हुए बड़े होते हैं और समाज को पढ़ते हैं इसी दौर में हम इतिहास दर्शन और विज्ञान को समझते हुए किशोरावस्था की ओर आगे बढ़ते हैं और इसी बीच परिवार समाज और व्यवस्था द्वारा हमारे पहले प्रश्न का कृतिम हल हमें जबरदस्ती थमा दिया जाता है और हम यह जानकर आश्वस्त हो जाते हैं की हमने पहला पजल सॉल्व कर लिया की मैं कौन हूँ ? और हम हिन्दू मुस्लिम सिख या ईसाई हो जाते हैं. हमारा धर्मांतरण हो जाता है और हमे पता भी नही चलता.

किशोरावस्था के इस पड़ाव के बाद हम दुनिया को पढ़ते हुए आगे बढ़ते हैं इश्क प्यार और मुहब्बत के दौर से गुजरते हुए जीवन के उस मकाम तक पहुंचते हैं जहां धोखा नफ़रत और षड्यंत्रों से हमारा अनुभव होता है इसी बीच न जाने कब हमे एक आइडियोलॉजी थमा दी जाती है जो हमे दुनिया की समस्यायों का कारण समझाने लगती है हम अपने ऊपर थोपी गई इस विचारधारा का हिस्सा हो जाते हैं और फिर यही हमारी पहचान हो जाती है जीवन का पहला पड़ाव पूरा होने तक हमारी आइडियोलॉजी हमे इस सवाल के प्रति आश्वस्त कर देती है की मैं कौन हूँ ? यहां लगता है की बस अब मैंने हल ढूंढ लिया है मैं जान गया हूँ की मैं कौन हूँ और तब हम गर्व से चिल्ला उठते हैं मैं हिन्दू मैं मुसलमान मैं ईसाई मैं फलाना मैं ढिकाना मैं आर्यसमाजी मैं सनातनी मैं मार्क्सवादी मैं अम्बेडकरवादी मैं हिंदूवादी मैं मुहम्मदवादी मैं कबीरवादी मैं नक्सलवादी

इस कृत्रिम और प्रायोजित जवाब के बाद हमारे सामने दूसरा पजल आता है मुझे क्या करना है ? उम्र के 26वें साल से शुरू होने वाला यह पजल पहले वाले प्रश्न से जुड़ा हुआ होता है यह इस बात पर निर्भर करता है की हमने पहले सवाल का हल ढूंढने में खुद से कितनी मेहनत की है ? यदि हम पहले सवाल पर भ्रमित हो चुके हैं तो दूसरे प्रश्न का सार्थक हल ढूंढ ही नही पाएंगे

बुनियाद जितनी मजबूत होगी इमारत उतनी ही शानदार होगी मैं कौन हूँ यह बुनियाद है और इसकी मजबूती हमारी निजी खोज पर आधारित है मैं कौन हूँ यदि आपने इस बुनियाद को सफलतापूर्वक गढ़ लिया तो मुझे क्या करना है ? इस प्रश्न को भी आप जीत लेंगे यदि पहले सवाल का जवाब ही आपने गलत ढूंढा है तो दूसरे पजल का हल ढूंढना भी आपके लिये असम्भव होगा. 

मुझे क्या करना है इस दूसरे पजल को हल करने के लिए हमें जीवन का सबसे कीमती वक्त मिलता है 26 से 50 के बीच का समय जुनून मेहनत और अवसर का होता है. अवसर उन्हें ही मिलता है जिनमे अपने लक्ष्य के प्रति जुनून हो और अपने जुनून की खातिर किसी भी हद तक जा सकते हों जुनून मेहनत और अवसर के बेहतर तालमेल से आप कामयाबी की नई ऊंचाइयों को छूते चले जाते है. 

दूसरे पड़ाव के खत्म होते ही जीवन का तीसरा और आखिरी पड़ाव शुरू होता है जहां तीसरा सवाल आपके इंतजार में खड़ा होता है की मैंने क्या किया ? जीवन के तीसरे पड़ाव का यह तीसरा प्रश्न ही है जो आपके जीवन की सार्थकता तय करता है यही आख़िरत का वह सवाल है जिसका जवाब आपके पिछले दो सवालों की जीत पर निर्भर है यदि आपने पहले और दूसरे पजल को ढंग से हल किया है तब आपको तीसरा प्रश्न को हल करने की जरूरत ही कहाँ है ? जैसे ही तीसरे प्रश्न का समय आएगा की मैंने क्या किया आप गर्व से कहेंगे की हाँ मैंने बहुत कुछ किया मैंने बहुत कुछ बदला मैंने सत्य को जाना प्रेम का विस्तार किया और परिवर्तन के लिए काम किया जीवन के इस तीसरे पड़ाव में आपके पास आपके पिछले 50 वर्षों की मेहनत का एक वृहद परिणाम मौजूद होगा. और आप जीवन के इस आखिरी पड़ाव में पिछले दोनों पड़ावों की जीत में हासिल परिणामों को भोग रहे होंगे.

यदि आप पिछले दोनों पजल को सॉल्व करने में नाकाम होते हैं तो समझिये आपका तीसरा और आखिरी प्रश्न अनसुलझा ही रह जाएगा और इस तरह आपका आख़िरत बर्बाद हो जाएगा.

मेरा भी धर्मांतरण हुआ था और मुझे मेरे परिवार द्वारा इस्लाम में कन्वर्ट कर दिया गया था आगे चलकर परिवार समाज और परिवेश ने मुझे भी एक आइडियोलॉजी थमा दी लेकिन मैं लुटने से बच गया और मैंने थोपा हुआ धर्म और थोपी हुई आइडियोलॉजी दोनों को उठा कर कूड़े में फेंक दिया और अपने जीवन के पहले पजल का हल खुद से ढूंढ निकाला तब मुझे मेरे पहले पजल का हल मिला वह यह था की

मैं शकील प्रेम.

अनंत ब्रह्माण्ड के अनेकों क्लस्टर में से एक वरगो कलस्टर में स्थित सौ करोड़ आकाशगंगाओं में से एक मिल्की वे के केंद्र में स्थित ब्लैक होल का चक्कर काट रहे है चार सौ अरब सितारों में से एक सूरज नामक सितारे के सौरमंडल में स्थित आठ ग्रहों में से एक पृथ्वी नामक ग्रह पर साढ़े तीन अरब वर्ष पहले शुरू हुये जीवन के संघर्ष में सबसे आगे सबसे सबसे तेज रहने वाले जीव, होमोसेपियंस प्रजाति में वर्ष 1981 में पैदा हुआ जाती से पुरुष हूँ और अभी इंसान बनने की प्रक्रिया में हूँ इसी पृथ्वी पर सात महाद्वीपों में से एक एशिया नामक महाद्वीप पर स्थित भारत नामक देश के 28 राज्यों में से एक राज्य बिहार के एक जिले के एक छोटे से गांव का निवासी हूँ इससे ज्यादा मेरी कोई औकात नही.

एक जीव के रूप में मेरे जीवन का उद्देश्य भी उतना ही जितना अमीबा चींटी कुत्ते या किसी भी दूसरे जीव का है भोजन सुरक्षा और प्रजजन मेरा जीवन भी इन्ही तीन चीजों पर आधारित है लेकिन दूसरे जीवों से अलग एक मैं सामाजिक प्राणी हूँ और समाज के बिना मेरा कोई आस्तित्व ही नहीं इसलिए समाज की उन्नति ही मेरा अंतिम लक्ष्य है और मेरे जीवन का उद्देश्य भी.

जब मैंने पहला पजल हल कर लिया और मेरे जीवन का दूसरा पजल शुरू हुआ तब मैंने जाना की मुझे एक सामाजिक प्राणी होने के नाते क्या करना है ? यह मेरी जिंदगी का दूसरा पड़ाव था और दूसरा सवाल भी.

मैं एक सामाजिक प्राणी हूँ इसलिए मेरे जीवन का उद्देश्य भोजन सुरक्षा और प्रजनन तक सीमित नही रह जाता समाज की उन्नति और समाज के समग्र विकास की सोच के साथ चलना ही मानवता है और एक मानव के रूप में यही मेरे जीवन का उद्देश्य भी है.

और अपने इसी परम् ध्येय की खातिर
मैं एक ऐसे 
धर्ममुक्त समाज की 
परिकल्पना करता हूँ 
जहाँ...

कोई भूखा न सोये 
कोई बेघर न रहे
कोई नंगा न रहे.

पृथ्वी के संसाधनों पर 
सभी का बराबर हक हो.

कोई नीच न रहे 
कोई ऊंचा न बने 
कोई दानी न रहे 
कोई भिखारी न बने 
कोई सती न हो 
कोई वेश्या न बने.

दहेज़ के लिए 
कोई स्त्री जलाई न जाये 
कोई स्त्री
स्त्री होने के कारण 
सताई न जाये 
गर्भ में ही वो 
गिराई न जाये.

जहाँ गोत्र न हो 
जाती का बंधन न हो 
धर्म की कोई दीवार न हो 
जहाँ भगवान के 
आलिशान घर न हो 
आम आदमी बेघर न हो
बेबस न हो.
 
जहाँ किसी परमेश्वर का 
सवाल न हो 
जहाँ इश्वर के दलाल न हो.

एक ऐसी व्यवस्था.

जिसमें भय भूख 
और भ्रस्टाचार न हो 
आतंक अन्याय और 
अत्याचार न हो 
किसी औरत से 
बलात्कार न हो 
और जहाँ मानवता 
बौनी और लाचार न हो.

मैं फिलहाल जीवन के इसी दूसरे पजल को साल्व करने की प्रक्रिया हूँ ताकि मेरे जीवन का तीसरा और आखिरी पड़ाव सफल हो जाए.

मेरा आख़िरत मुझे जीते जी भोग कर मरना है और मैं उसी आख़िरत के डर से इंसान बनने की प्रक्रिया में हूँ. 

-शकील प्रेम

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