चार सवालों के जवाब -शकील प्रेम - तर्कशील भारत

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Monday, May 4, 2020

चार सवालों के जवाब -शकील प्रेम

shakeelprem

1. प्रश्न- दुनिया मे जितने इंसान हैं सबका चेहरा अलग होता है लेकिन जितने भी अलग अलग जानवर हैं उन सभी का चेहरा एक सा होता है ऐसा क्यों - आशीष कुमार


आशीष जी दुनिया मे 7 सौ करोड़ लोग है सबके चेहरे रूप रंग और आदतों में अंतर है धरती पर जितनी भी गाएँ भैंस या बकरियां हैं वो देखने मे हमे भले ही एक जैसी लगती हो लेकिन उनमें ठीक वैसे ही अंतर होता है जैसे इंसानों में. धरती पर मौजूद 3 सौ खरब चींटियो में से कोई भी दो चींटी एक जैसी नही होती दो बकरियां एक जैसी नही होती दो भैंस एक जैसे नही होते.

भले ही हमे किसी प्रजाति के दो जीव एक जैसे दिखते हों लेकिन दोनों के रूप रंग व्यवहार में अंतर जरूर होता है क्योंकि प्रकृति की कोई भी दो रचना एक जैसी नही हो सकती चाहे दो ग्रह हो दो पत्थर हो या दो पहाड़ सभी की बनावट में भिन्नता जरूर होगी.

कोई अल्लाह को मानता है इससे उसे मन की शांति मिलती है तो इसमें गलत क्या है ? मजरुल इस्लाम

अल्लाह खुदा गॉड या ईश्वर को मानने से मन की शांति मिलती है यह मात्र एक बहाना है किसी को बलि देने से भी मन की शांति प्राप्त होती है तो क्या बलि को जायज मान लिया जाए ? कुछ इलाकों में कभी यह भी प्रथा थी कि अपनी बड़ी संतान को नदी के हवाले कर दिया जाता था उससे भी लोगों को मन की शांति मिलती थी तो क्या उस घिनौनी प्रथा को सही मान लिया जाए ?

जिन्हें खुजली की बीमारी होती है उन्हें खुजलाने से मन की शांति मिलती है लेकिन सभी जानते हैं कि इस तरह की खुजलाहट से खुजली दूर नही होती बल्कि लगातार ऐसा करते रहने से वो मामूली खुजली नासूर बन जाती है. यदि अल्लाह को मानने से मन शांत होता तो इस समय सबसे ज्यादा शांति मुस्लिम देशों में होती लेकिन पाकिस्तान अफगानिस्तान ईरान इराक सीरिया सूडान लीबिया और बंगलादेश जैसे मुस्लिम देशों में घोर अशांति का माहौल है यहां तो सभी अल्लाह को मानते हैं फिर इतने अशांत क्यों हैं ? दूसरी ओर नार्वे डेनमार्क नीदरलैंड फिनलैंड जैसे देश हैं जहां खुदा की ऐसी कोई खुजलाहट नही है फिर भी वहां शांति है और खुशहाली में ये देश दुनिया में टॉप पर हैं इससे यह साबित होता है कि ईश्वरवादियों द्वारा गढ़ा गया मन की शांति वाला यह कॉन्सेप्ट खुजलाहट को जस्टिफाई करने का बहाना मात्र है इससे मन की शांति का कोई लेना देना नही.

2. प्रश्न- ईश्वर को तर्क से नही समझा जा सकता.हिमांशु आहूजा


उत्तर-ईश्वर को तर्क से नही समझा जा सकता तो वह विधि बताएं जिससे ईश्वर को समझा जा सके. दुनिया के तमाम धर्म और इन धर्मों के धर्मग्रंथ अपने अपने ईश्वर को समझाने में नाकाम रहे हैं तो फिर उसे कैसे समझा जाए ?
आपके प्रश्न ने ही साबित कर दिया की ईश्वर सिर्फ मन का वहम है और वहम को समझने के लिए बुद्धि की जरूरत नही होती इसलिए उसे तर्क से नही समझा जा सकता. 

3. प्रश्न- धर्म इंसान की पहचान है इसके बिना इंसान जानवर के समान होता है ? सुल्तान अंसारी


धर्म का अर्थ अगर आप किसी तत्व के गुण या स्वभाव से करते हैं तब तो यह बिल्कुल प्राकृतिक चीज है जिसे छोड़ना या अपनाना दोनों ही बातें सम्भव नही जल का गुण है कि वह गीला ही करेगा अग्नि का गुण है कि वह जलाएगा कुत्ते का गुण है कि वह मांस खायेगा मदिरा का गुण है कि वह बहका देगा उल्लू और चमगादड़ का गुण है कि वह निशाचर है इंसान का गुण है कि वह एक सामाजिक प्राणी है इन स्वाभाविक गुणों के बिना इन सभी चीजों का कोई आस्तित्व ही नहीं अगर मनुष्य के धर्म का तात्पर्य उसके इस नेचुरल गुण से है तब इसको छोड़ने या अपनाने की बात ही गलत है लेकिन यहां आपका मतलब इंसान के बनाये उस धर्म से है जो ईश्वर खुदा या गॉड की चापलूसी से शुरू होता है तब इसे छोड़ने से मनुष्य पशु तुल्य नही होता बल्कि यह तो मानसिक विकारों की वह स्थिति है जो हमे विरासत में मिलती है जिसे हम धर्म समझकर गधे की तरह ढोते चले जाते है ? मानसिक विकारों के बोझ को उतार फैंकने वाला मनुष्य कहलाने का हक रखता है न कि इसे अंधभक्तों की तरह ढोने वाला.

आप देख लीजिए उन धार्मिक देशों का हाल जो धर्म से चलते हैं वहां के अधिकांश इंसान जानवरों से भी बदतर स्थिति में हैं और इसके उलट जिन देशों में धार्मिकता की यह मानसिक बीमारी जितनी कम है वहां के लोग उतने ही ज्यादा खुशहाल हैं.

जब किसी महिला के ऊपर जिन्न या भूत प्रेत आता है तो वह बड़ी बड़ी जंजीरों को भी तोड़ देती है गर्म अंगारों पर चल देती है ऐसा कैसे होता है ? टैक्नीकल लोकेश

महिला ऐसा करती है इसमें भूत प्रेत की कोई भूमिका नही होती बल्कि ऐसी औरतें जिन्हें हम भूत पिशाच की शिकार समझते हैं वे अलग अलग दिमागी बीमारियों की वजह से ऐसा करती है आग पर चलना यह कोई चमत्कार नही है बल्कि साधारण आदमी भी ऐसा कर सकता है भूत प्रेत पर मेरे दो videos हैं जिनके लिंक मैं डिस्क्रिप्शन में दे रहा हूँ देख लीजियेगा.

4. प्रश्न- क्या ग्रहों या उपग्रहों का असर हमारे जीवन पर होता है ? सुशांत जाधव


जी नही ग्रहों का हमारे जीवन पर कोई असर नही पड़ता लेकिन उपग्रहों का असर जरूर होता है हमने जिन उपग्रहों को अंतरिक्ष मे भेजे हैं वो सभी सेटेलाइटस हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं जीपीआरएस इंटरनेट देश की सुरक्षा और मीडिया हमारे जीवन मे इन सभी चीजों का अहम रोल होता है और ये सभी अंतरिक्ष मे भेजे गए हमारे उपग्रहों की बदौलत ही काम करते हैं इसलिए सीधे तौर पर मानव निर्मित इन उपग्रहों का हमारे जीवन पर असर होता है इनके अलावा जो दूर दराज के ग्रह हैं उनका असर हमारे जीवन पर रत्ती बराबर भी नही होता.

हमारा चांद भी एक उपग्रह है जिसकी ग्रेविटी का मामूली असर पृथ्वी के समुद्र पर होता है लेकिन किसी इंसान के जीवन पर चंद्रमा का कोई असर नही होता.

यदि अल्लाह नही है तो क्या हमें नेचर की पूजा करनी चाहिए ? नुरुल्लाह कुरैशी

जी नही , मानव जाति का इतिहास नेचर से लड़ने का ही रहा है प्रकृति से लड़ते हुए ही हम आज यहां तक पहुंचे हैं यह सच है कि प्रकृति हमारी पालनहार है लेकिन यह भी सत्य है कि यही प्रकृति हमारी सबसे बड़ी दुश्मन भी है कुदरत हमें धरती वायु और आकाश के अलावा कुछ भी फ्री में नही देती जीने के लिए सभी जरूरी तत्व हम प्रकृति से लड़कर ही हासिल करते हैं जब हम खेती करते हैं तो प्रकृति से लड़ते हैं शहर गांव सड़के इमारतें नदियों पर बांध यह सब कुदरत से हमारे संघर्षों का परिणाम ही तो है इसलिए प्रकृति की पूजा करना यह एक तरह का अंधविश्वास ही है हमें प्रकृति की पूजा नही बल्कि नेचर को इस पर रहने वाले समस्त जीवों के अनुकूल बनाये रखने का जतन करना चाहिए.

आप प्रकृति की पूजा करेंगे तो क्या सुनामी नही आएगी ? भूकम्प रुक जाएंगे ज्वालामुखी नही फटेंगे बाढ़ नही आएगी सूखा नही पड़ेगा ?

इन सभी प्राकृतिक आपदाओं से पूरी मानवजाति को हमेशा खतरा रहेगा इसके लिए हमे प्रकृति की पूजा नही करनी बल्कि विज्ञान को मजबूत करना होगा साइंस ही एकमात्र जरिया है जिससे हम भविष्य को मानवता के अनुकूल बना सकते हैं.

आज के युग में प्रकृति का सम्मान करने का सबसे बेहतर तरीका यह होगा कि हम प्राकृतिक संसाधनों का संतुलन बनाये रखने की समझ को अपनी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बना लें.

क्या विज्ञान हमें नैतिक बना सकता है ? क्या शादी से पहले यौन सम्बन्ध अनैतिक नही है ? नितिन ठाकरे

जी नही, विज्ञान इंसानी समझ द्वारा बनाया गया साधन मात्र है जिसके सहारे हम मानवता के अलग अलग क्षेत्रों में विकास करते हैं और अपनी समझ को और आगे बढ़ाते हैं नैतिकता का सम्बंध विज्ञान से नही बल्कि हमारे समाज से है समाज के नियमों के अनुरूप हम जो करते हैं उसे हम नैतिक कहते हैं और जो काम सामाजिकता के विरुद्ध हो हम उसे अनैतिक कहते हैं इसलिए नैतिकता की हमारी समझ हमारी सामाजिकता पर आधारित होती है.

हमारे समाज मे शादी से पहले योन सम्बन्ध अनैतिक समझा जाता है वहीं यूरोप या अमेरिका में शादी से पहले सम्बन्ध बनाने में कुछ भी अनैतिकता नही है.

अमेरिका और यूरोप में लोग शिक्षित हैं उन्हें मालूम है की यदि लड़का और लड़की बालिग हैं तो शादी से पहले योन सम्बन्धों में कुछ भी गलत नही इसलिए उन्होंने इस प्रवित्ति को स्वीकार किया हमारे यहां भी सक्षम या एलीट क्लास के लोग शादी से पहले योन सम्बन्धों को अनैतिक नही मानते लेकिन गरीब और अशिक्षित बहुसंख्यक समाज मे आज भी यह एक अनैतिक कुकृत्य समझा जाता है.

क्या आप 100 प्रतिशत दावा कर सकते हैं की अल्लाह नही है ? अगर अल्लाह के होने की 1 प्रतिशत संभावना हुई तब क्या होगा ? मुझे जहन्नम की आग से बहुत डर लगता है इसलिए मुझे मजबूरी में ही सही अल्लाह को मानना पड़ता है ताकि मैं जन्नत में जा सकूँ.

मैं जानता हूँ की इस सृष्टि को बनाने वाला कोई अल्लाह ईश्वर या गॉड नाम का प्राणी कहीं नही है रही बात की अगर एक परसेंट भी वह हुआ तो फिर क्या होगा ? चलो एक परसेंट के आधार पर आपके अल्लाह को मान लेते हैं तब आप जन्नत में ही जाएंगे इस बात की क्या गारंटी है ? आपका अल्लाह केवल उन लोगों को ही जन्नत में भेजेगा जो तौहीद के रास्ते पर होंगे यानी की जिन्होंने कलमा नमाज जकात रोजा और हज का ईमानदारी से पालन किया होगा.

इस हिसाब से कयामत के दिन 80 फीसदी आबादी जन्नत में जाने से वंचित हो जाएगी अब आप कहेंगे की मुसलमान होने के नाते आप को तो जन्नत मिल ही जाएगी तब यह आपकी भूल है क्योंकि आपके अल्लाह के आखिरी नबी कह चुके हैं की मुसलमान 72 फिरकों में बंटे होंगे जिसमे कोई एक फिरका ही जन्नत में जाएगा.

इस हिसाब से मुसलमान होते हुए भी आपके जन्नत में जाने की गुंजाइश तभी है जब आप उस सही फिरके से ताल्लुक रखते हों जिसके लिए जन्नत बनी है.

अगर आप उस जन्नती फिरके के मेम्बर भी हैं तो भी जरूरी नही की जन्नत में उस फिरके के सभी लोगों की सीटें रिजर्व हों. इसमे भी बहुत सी शर्ते हैं. इस हिसाब से यदि आपके अल्लाह के होने की एक प्रतिशत भी संभावना है तो आपके जन्नत में पहुंचने की संभावना तो एक प्रतिशत भी नही है.

कुल मिलाकर बात यह है की खुदा ईश्वर अल्लाह के नाम पर दुनिया में ढेरों समस्याएं खड़ी हैं युद्ध घृणा हिंसा गरीबी और शोषण यह सब ईश्वर को मानने वाले देशों की देन हैं ईश्वर अल्लाह खत्म तो ये सारी समस्याएं भी समाप्त हो जाएंगी इसलिए एक शिक्षित व्यक्ति के लिए किसी भी रूप में या मात्रा में ईश्वर को मानना अव्वल दर्जे के दोगलेपन के सिवा और कुछ नहीं. 

अगर आपके भी कुछ सवाल हों तो आप मेरे कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं मैं अगले वीडियो में आपके प्रश्नों का उत्तर तलाशने की कोशिश जरूर करूँगा.

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