प्रकृति की निष्ठुरता - तर्कशील भारत

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Thursday, May 21, 2020

प्रकृति की निष्ठुरता

प्रकृति की निष्ठुरता ने ही इंसान को सामाजिक बनने की ओर प्रेरित किया था आगे चलकर यह सामाजिकता ही मनुष्य की पहचान बन गई ज्ञान विज्ञान दर्शन और तकनीक यह सब हमारी सामाजिकता की महान उपलब्धियां हैं जो हमने सामाजिक होने के बाद ही हासिल की हैं इंसान जैसे ही अपनी सामाजिक पहचान से अलग होता है उसे प्रकृति की निष्ठुरता का सामना करना ही पड़ता है इसलिए समाज के बिना हमारा कोई आस्तित्व ही नहीं है. इसी सामाजिकता को उत्कृष्ट बनाये रखने के लिए हमने मुखिया राजा और तरह तरह के हुक्मरानों को बनाया ताकि वे हमारी सामाजिकता को निर्बाध आगे बढ़ाते रहें लेकिन इस मामले में दुनिया का अनुभव अच्छा नही रहा पुरानी सामाजिक व्यवस्थाओं में आम आदमी असुरक्षित था इसलिए दुनियाभर के समाजों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था ईजाद किया ताकि समाज का आखिरी आदमी भी सामाजिकता सुरक्षा के घेरे में खुद को सुरक्षित महसूस करे.

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की यह जिंदा तस्वीर चिल्ला चिल्ला कर कह रही है की हम न तो अभी तक सामाजिक हो पाएं हैं और न ही लोकतांत्रिक.

हमारे लोकतंत्र को परिभाषित करना हो तो मैं बस इतना ही कहूंगा की यह लोकतंत्र नहीं बल्कि असहाय "लोक" पर राज करने वाला हृदयविहीन "तंत्र" है. 

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