मंदिर मस्जिद (कविता) - तर्कशील भारत

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Monday, May 4, 2020

मंदिर मस्जिद (कविता)

मंदिर मस्जिद (कविता)




जरूरत क्या है
इमारतें बनाने की
रेलवे और पार्क की


जरूरत नही हमे
फैक्टरी और अस्पतालों की
सुंदर शहर और खुशहाल गांवों की


हमे नही चाहिए 
निश्छल हवाएँ 
उन्मुक्त धाराएं
रिमझिम बरसातें
स्वच्छ जल और निर्मल नदियां 
गर्मियों की सर्द रातें और 
रातों की कड़कदार सर्दियां 
मिट्टी में सनी धूल
ताजगी भरी आंधियां और
आंधियों में खिले फूल




यह सब हमारी
महान संस्कृति का हिस्सा नही
क्योंकि हम
उस परवरदिगार के बन्दे हैं
जिसने हमें
उन्मुक्त रहने के लिए नही
बल्कि
अपनी इबादतों के लिए पैदा किया है
इसलिए हमें
उस परमात्मा की बनाई इस धरती पर
उसके लिए
एक अदद जगह की खातिर
लड़ना है
जमीन के हर हिस्से में
उसकी मूरत गढ़ना है
धरा की हर जगह पर
उसकी इबादत करना है
इसलिए
आज की हमारी सबसे बड़ी जरूरत तो
मंदिर मस्जिद और बड़ी बड़ी इबादतगाहें हैं




नही चाहिए तालाब और हरे मैदान
नही चाहिए 
रोटी कपड़ा और मकान 
शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार सुरक्षा और न्याय
हमे अब 
इन तुच्छ मानवीय चीजों की 
बिल्कुल जरूरत नही
क्योंकि हम सब
पहले हिन्दू या मुसलमान हैं 
बाद में इंसान...




कोई भूख से मरे या बीमारी से
कोई बाढ़ से मरे या लाचारी से
हमे कोई फर्क नही पड़ता
क्योंकि
हम सब
भले ही अभी तक
इंसान न बन पाए हों
लेकिन
खुदा या ईश्वर के हाथों की
कठपुतली जरूर बन गए हैं
या बना दिये हैं
ये वही खुदा है
जो जिसे चाहे
गरीब बना सकता है
जिसे चाहे
दौलत के ढेर पर बिठा सकता है
और जब चाहे
किसी की हस्ती मिटा सकता है




इसलिए उसकी भक्ति करना
हम जैसे सच्चे
भक्त और बंदों की
सबसे बड़ी जरूरत है
क्योंकि हम सब
पहले हिन्दू या मुसलमान हैं 
बाद में इंसान...




सड़कों की खाक छानते बच्चे
कूड़े के ढेर में बचपन ढूंढती मासूमियत
रोजगार की तलाश में बूढ़ी होती जवानियाँ
तबाह फसलों में बर्बाद होते किसान
और
वेश्यावृत्ति के दलदल में फंसी बेटियां




इन सब की भी कुछ जरूरतें होंगी
जो शायद
मंदिर की तामीर
और मस्जिद के निर्माण के बाद
पूरी हो जाए
इसलिए
हम सबकी प्राथमिकताओं में
बुनियादी सवाल गायब हो चुके हैं
नेताओं के वादों में
सरकार के इरादों में
मंदिर मस्जिद धर्म और ईश्वर
का भरपूर दर्शन तो मौजूद है
लेकिन
हाशिये के लोगों के लिए कोई जगह नही
लोकतंत्र की इबारत में
अब सिर्फ तंत्र ही बाकी बचा हैं
लोक लुप्त हो चुका है




मीडिया की सुर्खियों में
अब सिर्फ शोर बाकी हैं
खबरे नदारद हैं




प्रशाशन की अर्जियों में
पंक्ति में खड़े आखिरी आदमी की फरियादें गायब हैं




मंदिर मस्जिद की भीड़ में
न जाने कितनी अरदासे गुम हो गईं
जिन्हें खोजने की जरूरत
आज किसी को नही




मंदिर मस्जिद की जंग में
न जाने कितनी लाशें लापता हो गईं
जिन्हें तलाशने की जरूरत
आज किसी को नही




मंदिर मस्जिद की बुनियादों में
न जाने कितनी जवानियाँ दफन हो गईं
जिन्हें खोदने की जरूरत
आज किसी को नही




मंदिर मस्जिद के हंगामे में
और भी बहुत कुछ खो गए
जिन्हें ढूंढने की जरूरत
आज शायद किसी को नही




इसलिए
जरूरत नही हमें 
पक्के मकानों की
सड़कों और कारखानों की
नही चाहिए हमे 
बगीचे और फूल
जंगल मिट्टी और धूल
कालेज यूनिवर्सिटी और स्कूल
क्योंकि हम भौतिकतावादी नही 
बल्कि आध्यात्मिक हैं
हम डार्विन के बंदर नही
खुदा की मखलूक हैं
हम विकासवाद का हिस्सा नही
परमात्मा की संतानें है
इसलिए हम सब
पहले हिन्दू या मुसलमान हैं 
बाद में इंसान...




तो आओ 
गर्व करें हिन्दू होने पर
फख्र करें मुसलमान होने पर
और दोनों मिलकर 
तबाहियों की दास्तान लिखते चले जाएं
आओ पहले
मंदिर की तामीर करें
मस्जिद का निर्माण करें




खुदा और परमात्मा की इस वर्षों पुरानी जंग में
अपनी अपनी कौमों की शहादतें देते हुए
मस्जिद की रक्षा 
और मंदिर की हिफाजत करते चले जाएं
ताकि आने वाली पीढ़ियों को 
सुंदर हिंदुस्तान नही बल्कि
एक भरा पूरा श्मशान 
और एक उन्नत कब्रिस्तान मिल सके.


-शकील प्रेम

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