क्या इस्लाम गरीबों का मजहब है ? - तर्कशील भारत

Header Ads Widget

Tuesday, May 12, 2020

क्या इस्लाम गरीबों का मजहब है ?

क्या इस्लाम गरीबों का मजहब है ?



क्या इस्लाम गरीबों का मजहब है इस सवाल को समझने के लिए सबसे पहले हमे इस्लाम के इतिहास को समझना होगा इस्लाम के खोजकर्ता हजरत साहब मक्का के सबसे धनी खानदान से थे इसलिए जब उन्होंने इस्लाम नामक अपना आंदोलन शुरू किया तो उन्हें काफी समर्थन हासिल हुआ इसी का फायदा उठाकर उन्होंने अपना आंदोलन मक्का में फैलाना शुरू किया जिससे उनके अपने ही लोग विरोध में खड़े हो गये क्योंकि बात धंधे की थी जैसे जैसे हजरत साहब का इस्लाम बढ़ना शुरू हुआ वैसे ही उनका विरोध भी बढ़ता चला गया आखिरकार उन्हें वहां से मदीना भागना पड़ा मदीने के लोगों के बीच वे जगह बनाने में इसलिए भी कामयाब हुए क्योंकि वे ऊंचे खानदान से थे जीवन के आखिर तक हजरत साहब का इस्लाम अरब तक ही सीमित था लेकिन हजरत साहब के बाद अबूबकर खलीफा हुए जिनके दौर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही की उन्होंने इराक को जीत लिया था इस तरह इस्लाम का दायरा लगातार बढ़ता चला गया. 


634 ईसवी में अबूबकर की मृत्यु के बाद उमर खलीफा नियुक्त हुए जिन्होंने इस्लाम को यूरोप और एशिया तक पहुंचाया उमर के बाद उस्मान के दौर में भी इस्लाम ने दूसरी हुकूमतों पर कब्जा कर इस्लाम की सीमाओं का विस्तार किया अली की खिलाफत में भी यह सिलसिला चलता रहा इसके बाद उमैया वंश के 100 वर्षों की खिलाफत के दौरान भी इस्लाम लगातार आगे बढ़ता गया फिर अब्बासी खिलाफत का दौर आया जिसमे अलग अलग खलीफा इस्लाम के परचम को लेकर सीमाओं का विस्तार करते चले गये.


इस्लाम के इस लगातार विस्तार में ख़िलाफ़ती हुकूमतों का ही अहम किरदार रहा 14वी सदी तक एशिया अफ्रीका और यूरोप के एक बड़े हिस्से पर इस्लामिक हुकूमतों का शाशन कायम हो चुका था 1299 में उस्मान ने ओटोमन साम्राज्य की नीव डाली और 1922 तक इसी साम्राज्य के बादशाह खलीफा बनते रहे इस तरह हम देखते हैं की इस्लाम अपनी शुरुआत से ही शाशकों के कंधों पर सवार होकर जनमानस तक पहुंचा है भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम का जो उदय हुआ वह भी सहाबुद्दीन गौरी की दिल्ली विजय से आरम्भ होता है हालांकि उससे पहले मुइनुद्दीन चिश्ती जैसे सूफी लोग भारत में इस्लाम लेकर पहुंचे थे लेकिन ये शुरुआती सूफी लोग भी अमीर परिवारों से ही ताल्लुक रखते थे.


आज हम देखते हैं की भारत पाकिस्तान बांग्लादेश में इस्लाम को मानने वालों की अक्सरियत आबादी गरीब है जिससे ऐसा लगता है यह गरीबों का मजहब है लेकिन इस्लाम की बुनयादी हकीकत बिल्कुल इसके उलट है इस्लाम का इतिहास गवाह है की यह कभी भी गरीबों का मजहब नही रहा.


भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश में बसने वाली 90 फीसदी मुस्लिम आबादी का इतिहास 200 साल से ज्यादा पुराना नही है ये वो लोग हैं जिनके पूर्वज जातिवाद छुआछूत या अन्य कारणों से मुसलमान हुए थे बाकी जो 10 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है यह उन अशरफ मुसलमानों के वंसज हैं जो 800 वर्षों के मुस्लिम शाशकों सिपहसालारों या नवाबों के वंसज है इनमे अफगान तुर्क कुर्द उज्बेक कबीलों के वंसज भी शामिल हैं जो इस्लामिक हुकूमतों के दरम्यान माइग्रेट होकर यहां बसे हैं पाकिस्तान में दस फीसदी वे हैं जो खुद को राजपूतों का वंसज कहते हैं.


इस्लाम की इस ऐतिहासिक समीक्षा में कहीं भी ऐसा कोई उदाहरण उपलब्ध नही है जिससे यह साबित होता हो की यह गरीबों का मजहब है अशरफ अली थानवी सय्यद अहमद खां गुलाम अहमद कादियानी अहमद रजा बरेलवी या बहाउद्दीन खान जिन्हें हम इस्लामिक सुधार आंदोलन के जनक समझते हैं इनमे से कोई भी शक्श किसी गरीब परिवार से ताल्लुक नही रखता था जितने भी पीर मुर्शिद या औलिया हुए हैं उनमें से भी ज्यादातर अमीर घरों के लोग थे जो बाद में बाबा बने इससे भी यह साबित होता है की इस्लाम गरीबों का नही बल्कि अमीर घरानों की उपज है तो फिर यह गरीबो का मजहब कैसे हो सकता है ?


इस्लाम के पांच अराकानों यानी की उसूलों पर गौर करें तो यह बात बिल्कुल सही साबित होती है की यह गरीबों का मजहब तो हो ही नहीं सकता.


इस्लाम के पांच सिद्धांतों में सबसे पहला है शहादा यानी शपथ जिसके अनुसार एक मुसलमान को इस बात पर यकीन करना होता है की अल्लाह के सिवा कोई पुजनीय नही और मुहम्मद अल्लाह के नबी हैं.


यह तो एंट्री पॉइंट है यदि कोई यह पहली शर्त मान लेता है इसके बाद ही असली खेल शुरू होता है ठीक वैसे ही जैसे बहुत सी जगहों पर एंट्री फी जीरो होती है एक बार घुसे तो बस लुटते चले जाइये इसी तरह एक बार इस बात को मान लिए की अल्लाह के सिवा और कोई नही तब बाकी काम कुरान और हदीसें करती हैं अब कुरान या हदीसें खुद से तो बोलेंगी नही की आगे क्या करना है ? तो इस काम के लिए उलेमाओं की पूरी फौज तैयार है. 


इस्लाम का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है सलात जिसका अर्थ है नमाज.


तो क्या यह गरीबों के हित में है नही बिल्कुल नही. भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश की कुल मुसलमान आबादी जो सौ प्रतिशत शहादा यानी कलमा पर यकीन रखती है उसमें से महज 5 प्रतिशत लोग ही पांचों वक्त की नमाज पढ़ते हैं इससे जाहिर है की नमाज गरीबों के लिए व्यवहारिक नही है पांचों वक्त नमाज पढ़ने वालों में ज्यादातर अमीर लोग ही होते हैं अब ऐसा क्यों है पहले इसको समझ लेते हैं.


नमाज इस्लाम की बुनियाद का सबसे मजबूत पिल्लर है इसके बावजूद 95 प्रतिशत मुसलमान नमाज को फॉलो ही नही करते आखिर ऐसा क्यों ? क्योंकि यह गरीब मजदूर वर्ग के लिए व्यवहारिक है ही नहीं यह केवल समाज के मुट्ठी भर खाये पिये अघाये लोगों की खोज है इसलिए सुल्तान बादशाह या एलीट क्लास जो अपने सुख समृद्धि को किसी अल्लाह की भेंट मानता था उसके लिए शुक्रिया अदा करने का सबसे अच्छा माध्यम नमाज ही था. इन समृद्ध लोगों को दिन भर कोई शारीरिक काम नही था बस आराम ही आराम. इस वर्ग के लिए सुबह से शाम तक पांच बार नमाज पढ़ना बिल्कुल व्यवहारिक था इससे दिन भर के निठल्लेपन के बीच थोड़ी कसरत भी हो जाती थी और खुदा की चापलूसी भी.


इसके उलट नमाज के बारे में तमाम तरह की सख्ती मुल्लाओं के तरह तरह के झांसे और हदीसों में नमाज के बारे में तरह तरह के लालच के बावजूद यह आम लोगों के जीवन का हिस्सा कभी नही बन पाया. 


अब बात करते हैं सौम यानी रमजान की जो इस्लाम का तीसरा सबसे मजबूत सिध्दांत है.


जिसे सेहरी में शाही पकवान और अफ्तारी में 56 भोग मिले वो 30 क्या 365 रोजे रख लेगा लेकिन जिसे दिन भर खटने के बाद भी रात को रोटी न मिलती हो उसके लिए रमजान कभी जिंदगी का हिस्सा नही बन सकता यही कारण है की रमजान के बारे में तमाम तरह के इस्लामिक लालच और डर के बावजूद ज्यादातर गरीब मुसलमान इसे फॉलो नही करते.


जकात इस्लाम का तीसरा सिद्धांत होते हुए भी 
आम मुसलमानों के दायरे से बाहर की चीज है सालाना आमदनी का ढाई परसेंट हर हाल में देना है लेकिन जिसका सालाना कर्ज उसके सालाना आय से ज्यादा हो वो गरीब कहां से जकात दे पायेगा ? इसलिए यह भी गरीब मुसलमान के बूते से बाहर की चीज है.


हज भी फर्ज है लेकिन यह भी 90 प्रतिशत आम मुसलमानों के लिए व्यवहारिक नही है यहां एक बात सबसे महत्वपूर्ण है जिसे छुपा लिया जाता है अक्सर मुल्ला कहते हैं की हज केवल सक्षम लोगों पर फर्ज है लेकिन ऐसा नहीं है यह हर मुसलमान पर फर्ज है और इस्लाम में फर्ज का अर्थ है वो जरूरी काम जिसे सभी मुसलमानों के लिए हर हाल में करना ही है क्योंकि यहां मुस्लिमों की अक्सरियत आबादी गरीब है जो अपनी चल अचल संपत्ति को बेच कर भी हज का खर्च नही उठा सकती इसलिए यह प्रोपगैंडा तैयार किया गया है की औकात हो तो हज फर्ज है वर्ना नहीं.


दरअसल कोई भी धर्म या उसके सिद्धांत गरीबों के लिए नहीं है किसी भी धर्म का ईजाद गरीबों की झोपड़ी में नही हुआ बल्कि धर्म अमीरों के महलों की उपज है एक गरीब आदमी तो बस मुट्ठी भर खाये पीये अघाये लोगों के बनाये धार्मिक जंजाल का शिकार होकर पीढ़ी दर पीढ़ी एक आदर्श भक्त बना रहता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उसके पास इस लोक में दुख अवहेलना गरीबी और शोषण को झेलते रहने के के सिवा और कुछ शेष बचता ही नहीं इसलिए वह बड़े आराम से इस आश्वाशन को स्वीकार कर लेता है की कोई ऊपर है जो इंसाफ करेगा और हमारे दुखों के बदले हमें इनाम देगा.


एक गरीब आदमी के लिए उसका धर्म आश्वाशन के सिवा उसे और कुछ नही देता और इसी आश्वासन के सहारे वह दुखों की अंतहीन वेदनाओं को पीढ़ी दर पीढ़ी झेलता चला जाता है.


पाखण्डवाद के इसी मनोविज्ञान के सहारे एक गरीब हमेशा गरीब ही बना रहता है और शोषक वर्ग पीढ़ी दर पीढ़ी संसाधनों पर कुंडली जमाये रहता है इसलिए कोई भी धर्म गरीबों के हित में नही बल्कि शोषक वर्ग के हित में ही काम करता है.


जब तक आम आदमी इस मुगालते से आजाद नही होगा की धर्म गरीबों के हित में है उसकी समस्याएं बनी रहेंगी और मुट्ठीभर आरामखोर लोग धर्म के सहारे ही उसकी पीढ़ियों को लूटते रहेंगे.

No comments:

Post a Comment

Pages