मजदूर ही तो था जो मर गया (कविता) - तर्कशील भारत

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Monday, May 18, 2020

मजदूर ही तो था जो मर गया (कविता)

मजदूर ही तो था जो मर गया (कविता)



सिर पर है जमा पूंजी
जिसे उसने मेहनत से जोड़ा है
हाथों में कुछ राहत सामग्री
जिसे उसने खुद से बटोरा है 
आंखों में 
भविष्य के जो सपने साथ लेकर
वह गांव से शहर की ओर आया था
उन्ही सपनों को बेचकर 
अब वापस गांव जा रहा है 
जिनकी मुसीबतों को 
दूर करने का वादा लेकर
वह देश से चलकर
परदेश आया था
उन्ही वादों को 
अपने जख्मी पैरों तले रौंदकर
अब वापस घर जा रहा है
वह पगला
जो कल तक 
हिन्दू या मुसलमान था
फिलहाल मजदूर है 
और अपने घर से कोसों दूर है


पिछले चुनाव की ही तो बात है
जब यही मजदूर 
हिन्दू या मुसलमान था
और दोनों को जगाने वाले
न जाने कितने किराए के शेर 
दिहाड़ी पर दहाड़ने में लगे थे
ऐ हिंदुओं जाग जाओ
तुम्हारा धर्म खतरे में है
ऐ मुसलमानों जाग जाओ
तुम्हारा ईमान खतरे में है
लेकिन आज
सड़कों पर भटकते 
इस मजदूर के पास
फिलहाल 
कोई धर्म नही
बची हैं तो सिर्फ मुट्ठी भर उम्मीदें
और मुश्किलों का वह भारी बोझ
जिसे सर पर लादे
वह पगला
चला जा रहा है
बदहवास
मजदूर की इस मजबूरी से
न तो नेताओं का फायदा है
न किराए के शेरों को 


यही मजदूर जब थक कर
दो पटरियों के बीच 
पत्थरों के बिछौने पर 
सुकून की नींद लेटा
तब कोई हिन्दू शेर 
उसे जगाने नही आया की
ऐ हिंदुओं 
जाग जाओ
तुम्हारी जान खतरे में है 
कोई मुस्लिम चीता भी नही गुर्राया
ऐ मुसलमानों 
जाग जाओ
तुम्हारी जान खतरे में है 


एक सेक्युलर ट्रेन आई 
जो बिना भेदभाव किये
और बिना किराया वसूले ही
सो रहे मजदूर को साथ ले गई
जल्दबाजी में पटरी पर ही
मजदूर का कुछ छूट गया 
चंद रोटियां 
और कुछ बोटियाँ


अब इन रूखी रोटियों 
और सुखी बोटियों की कीमत 
भी भला कौन तय करे ?


मजदूर की
सड़ी गली जिंदगी के बदले
पांच लाख का मुआवजा 
हाय रे किस्मत 
यह तो सरासर लूट है 


पागल था न जाने ये क्या कर गया
मजदूर ही तो था जो अब मर गया
वह तो पहले से ही दुखी और परेशान था
जिस्म जिंदा था मगर आदमी बेजान था
बन्दा अनपढ़ था जनाब 
इसलिए कहीं खो गया
पल भर की नींद में 
हमेशा के लिए सो गया


पागल था न जाने ये क्या कर गया
मजदूर ही तो था जो अब मर गया


वह हिन्दू होता और ट्रेन होती मुसलमान
या ट्रेन हिन्दू होती और वह होता मुसलमान
तब उसकी जान बेशकीमती होती 
उसके जिस्म के 
एक एक टुकड़े का हिसाब होता
हर रोटी की बोली लगती
हर बोटी का इंसाफ होता
इधर उधर बिखरी एक एक उंगली 
दस दस लाख की होती 
हाथ करोड़ों के होते
सिर अरबों में तोला जाता
और उसके जिस्म के हर टुकड़े पर
सियासत का महंगा खेल खेला जाता

-शकील प्रेम
(इस कविता पर आधारित वीडियो देखना हो तो "तर्कशील भारत" एपिसोड नम्बर- 138 देखें)

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