यह सोचने का समय है (कविता) -शकील प्रेम - तर्कशील भारत

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Monday, May 4, 2020

यह सोचने का समय है (कविता) -शकील प्रेम

tarksherel bharat poem

फुर्सत के इन पलों में
जब लॉक हैं हम घरों में
करने को कुछ नही है
लेकिन सोचने को बहुत कुछ है
जरा सोचिए
अभी कुछ दिन पहले की ही तो बात है जब
हमारे पास काम ही काम था 
बहुत बिजी थे हम
भागदौड़ भरी जिंदगी
रुकने का वक्त ही कहाँ था ?
सुबह से शाम तक 
बस काम ही काम
आराम के लिए वक्त ही कहाँ था ?
नींद भी अक्सर 
देर से आया करती थी 
ऑफिस के लिए भी
देर हो जाया करती थी
इस लेटलतीफी में
ट्रैफिक का दोष तो था ही
कुछ गलतियां अपनी भी थी
देर तक जगना
देर से उठना
फिर जल्दबाजी में घर से निकलना 
पूरा सिस्टम ही गड़बड़ था
अब ठीक है
जिंदगी थम सी गई है 
कारवाँ रुक सा गया है
दौलत की होड़ खत्म
सेलरी की दौड़ खत्म
ट्रैफिक का डर नही
गाड़ियों का शोर खत्म

अब न ऑफिस की जल्दी है
न कालेज को जाना है
न ट्रैफिक की टेंसन है
न बिल्डिंग बनाना है

फुर्सत के इन पलों में
जब लॉक हैं हम घरों में
करने को कुछ नही है
लेकिन सोचने को बहुत कुछ है
जरा सोचिए
जिनके पास घर है
मकान है पैसा है 
वो लॉकडाउन को एन्जॉय कर सकते हैं
लेकिन जिनके पास न घर है
न पैसा है वे लॉकडाउन में कहाँ जाएं ?
जिनके पास भय और भूख के अलावा 
बचा ही कुछ नही
वे लॉकडाउन का क्या करें
जिनके पास दुख और तकलीफों के अलावा
झेलने को कुछ नही
वे लॉकडाउन में क्या करें
जिनके पास खोने और खाने को कुछ नही
वे लॉकडाउन को एन्जॉय करें भी कैसे ?

फुर्सत के इन पलों में
जब लॉक हैं हम घरों में
करने को कुछ नही है
लेकिन सोचने को बहुत कुछ है
जरा सोचिए
जिस मकान में आप हैं 
उसे जिन मजदूरों ने बनाया
वो आज बेघर क्यों है ?

आपने जो अन्न खाया है
उसे उगाने वाला किसान
भूखा क्यों है

आपने जो कपड़े पहने हैं
उसे बनाने वाले कारीगर 
फटेहाल क्यों है ?

वे बच्चे आज कहाँ हैं 
जो लालबत्तियों पर
आपके बिजी शिड्यूल में
आपकी गाड़ी का शीशा खटखटाकर 
आपको डिस्टर्ब करते थे
वो नन्हे हाथ आज कहाँ हैं 
जो आपके घरों के कचरे पर पलते थे 
वो बूढ़े पैर आज कहाँ हैं जो
कड़ी धूप में सड़कों पर जलते थे
मासूम से दिखने वाले 
वो चवन्नी छाप आज कहाँ हैं
जो हाथों में गुब्बारा लिए
आपकी पिकनिक में खलल डालते थे
वो राष्ट्रविरोधी बच्चे कहाँ हैं
जो भारत के राष्ट्रध्वज को
सरेआम सड़कों पर बेचते थे

कहाँ हैं वो लोग
जो भूखे पेट सोते थे
कहाँ हैं वो लोग जो 
आपका बोझ ढोते थे

चाय वाला चूरनवाला
चाभी वाला चूड़ी वाला
छोले वाला कुलचे वाला
पंचर वाला केले वाला
कहाँ वो लोग 
जो रोज नजर आ जाते थे
कहाँ हैं वो लोग
जो रोज कमाकर खाते थे

फुर्सत के इन पलों में
जब लॉक हैं हम घरों में
करने को कुछ नही है
लेकिन सोचने को बहुत कुछ है
सोचिए क्योंकि
यह सोचने समझने 
और पहचानने का वक्त है
हमे जो जिंदगी मिली है 
वह हमारे मां बाप की देन है 
जिनसे हमारा खून का रिश्ता है
इस जिंदगी को जीने के लिए
जो हमे हवा पानी और आकाश मिला है
वो प्रकृति की देन है
जिससे हमारी सांसों का रिश्ता है
प्रकृति की निर्ममता को 
सुकून में बदलने के लिए
जो संसाधन हमे मिले हैं
वो विज्ञान की देन है
जिससे हमारी समझ का रिश्ता है
और हमें 
इस जिंदगी में जो सुविधाएं मिली हैं
वो उन अनजान हाथों की देन है
जिनसे हमारा रिश्ता 
मालिक और मजदूर का है
यदि हम ऐसा समझते हैं की
यह तो दुनिया का दस्तूर है
इसलिए कोई मालिक कोई मजदूर है 
तो हम गलत हैं
और यही हमारी वह गलती है
जिसे सुधारने की खातिर
कुदरत ने हमे 
आज लॉकडाउन किया हुआ है.

फुर्सत के इन पलों में
जब लॉक हैं हम घरों में
करने को कुछ नही है
लेकिन सोचने को बहुत कुछ है
नेता अभिनेता मिलेनियर बिलेनियर
एक झटके में सबका अभिमान 
धड़ाम से नीचे गिर गया है
दुनिया में आज 
और भी बहुत कुछ है 
जो लगातार नीचे गिर रहा है
इंसान का बनाया पूरा निजाम ही 
गिरतेक्रम में है
मार्किट में शेयर का भाव
सेंसेक्स का उतार चढ़ाव
हॉन्गकॉन्ग से अबुधापी
जहाजों की आपाधापी
बसों का शोरगुल
ट्रेनों की आवाजाही
सब एक झटके में
शांत हो गये
अब कोई मालिक नही
कोई मजदूर नही
किसी को शेयर नही लेना
किसी को दुनिया नही घूमना
परिंदों से ऊंची
उड़ाने थम गईं
हड़पने की होड़ में लगीं
थकाने खत्म हुई 
विकास की कर्कश
आवाजें थम गईं
खुदा की अनवरत
अरदासें कम हुईं
धर्म और पूंजी की
दुकाने बन्द हो गईं
तरक्की नापने के
पैमाने रुक गये
प्रगतिशील बनाने वाले
कारखाने रुक गये
दिन रात खटने वाली
मशीने खड़ी हो गईं
माथे पर भविष्य की 
चिंताएं बड़ी हो गईं
इस वक्त
कुदरत और साइंस
दोनों काम पर हैं और
हम जैसे तुच्छ प्राणी 
अपने अपने 
झूठे धर्मों के दायरे में कैद होकर
झूठी मान्यताओं 
झूठे अक़ीदों
झूठे खुदाओं
झूठी किताबों और
अपने बन्द दिमागों के साथ
घरों में बन्द होकर
"लॉकडाउन" हो गये.

फुर्सत के इन पलों में
जब लॉक हैं हम घरों में
करने को कुछ नही है
लेकिन सोचने को बहुत कुछ है
सोचिए
यह सब इसलिए तो नही हुआ क्योंकि
हम भूल गये थे की 
हम सभी मानव 
एक ही प्रजाति के जीव हैं 
हम भूल गये थे की
कुदरत की नजर में
हम सब बराबर हैं
हम भूल गये थे की
नेचर 
विकास और विनास के खेल में
कभी पक्षपात नही करती
हम भूल गये थे की
अमीरी गरीबी और नस्लवाद की
जो रूकावटें हमने पैदा की हैं
वह प्राकृतिक नही है 
हम भूल गये थे की
असमानता की जो गहरी खाई
हमने खोदी है
वह नेचरल नही है
और हम यह भी भूल चुके थे की
इंसान और इंसान के बीच
दौलत की जो दीवारें हमने खड़ी की हैं
वो कुदरती नही है

फुर्सत के इन पलों में
जब लॉक हैं हम घरों में
करने को कुछ नही है
लेकिन सोचने को बहुत कुछ है
इसलिए सोचिएगा जरूर की

भेदभाव ऊंच नीच जातिवाद
यह सब मानवीय रुकावटें हैं
जिसे दूर किये बिना
हम समतामूलक समाज 
बना ही नही सकते

पन्थ साम्प्रदाय धर्म और मजहब
यह सब इंसानी भूल हैं
जिन्हें सुधारे बिना
हम सभ्यता को आगे बढ़ा ही सकते
ईश्वर अल्लाह मन्दिर मस्जिद 
यह सब 
मानवीय कलंक हैं 
जिसे मिटाए बिना 
हम बेहतर दुनिया बना ही नही सकते.

सोचिएगा जरूर.

शकील प्रेम

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