मैं धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ हूँ लेकिन सेक्युलरिज्म के पक्ष में हूँ. - तर्कशील भारत

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Tuesday, May 12, 2020

मैं धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ हूँ लेकिन सेक्युलरिज्म के पक्ष में हूँ.

मैं धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ हूँ लेकिन सेक्युलरिज्म के पक्ष में हूँ.


शब्दों का भी अपना इतिहास और मनोविज्ञान होता है जब भी सेक्युलरिज्म की बात होती है कुछ लोगों के कान खड़े हो जाते हैं क्योंकि तमाम राजनैतिक लोग इसे अपने हिसाब से परिभाषित करते हैं राजनीति के पक्ष विपक्ष के खेल में आम आदमी सेक्युलरिज्म को लेकर भ्रमित हो जाता है जो जिस पार्टी का समर्थक है वह उसी मानसिकता के हिसाब से सेक्युलरिज्म के बारे में राय बना लेता है दिन रात चलते टेलिविजन डिबेट्स ने तो सेक्युलरिज्म शब्द की गरिमा को लगभग नष्ट ही कर दिया है.

अक्सर लोग सेक्युलरिज्म का हिंदी अर्थ धर्मनिरपेक्षता समझते हैं और इसे धार्मिक आजादी का मामला समझ लेते हैं यहीं से प्रोपगैंडा शुरू हो जाता है ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि इस शब्द का कोई सटीक हिंदी पर्यावाची शब्द है ही नही.

सेक्युलरिज्म का हिंदी अनुवाद करना ही हो तो यह धर्मनिरपेक्षता की बजाए पंथनिरपेक्षता के ज्यादा करीब होगा दोनों में बुनियादी अंतर है आप इस बात को इस तरह समझ सकते हैं की धार्मिक स्वतंत्रता की अपेक्षा पन्थ वाद या इज्म की स्वतंत्रा ज्यादा महत्वपूर्ण होती है एक ही धर्म में अनेकों पन्थ विचारधाराएं या इज्म मौजूद हो सकते हैं इसलिए धार्मिक आजादी से पहले पंथों की स्वतंत्रा ज्यादा महत्व रखती है.

मान लीजिये एक संयुक्त परिवार है जिसमे बहुत सारे लोग रहते हैं लेकिन धर्म को लेकर सबकी राय एक जैसी नही है कोई प्रतिदिन पूजा करता है कोई साल में एकाध बार ही मन्दिर जाता है किसी को मांस पसंद है कोई शाकाहारी है किसी को रंगों से प्यार है तो किसी को रंगों से एलर्जी है कोई पुराने गाने पसन्द करता है किसी को नए गाने अच्छे लगते हैं ऐसे परिवार को एक डेमोक्रेटिक परिवार तभी माना जाएगा जब यहां सभी को अपने तरीके से जीने की आजादी हो इसी को सही मायने में एक सेक्युलर परिवार कहा जा सकता है यहां समस्या तब आएगी जब परिवार का मुखिया धर्म को परिवार पर थोपने लगे या परिवार के कुछ खास सदस्यों को दूसरों से ज्यादा तरजीह देने लगे या किसी के इज्म को बढ़ावा देते हुए किसी की विचारधारा के खिलाफ खड़ा हो जाए.ऐसे में यह परिवार अपने सेक्युलर होने की पहचान तो खयेगा ही साथ ही यह अपनी डेमोक्रेसी को भी खो देगा क्योंकि सेक्युलरिज्म किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ की हड्डी होती है.

इसे समझने के लिए आपको सेक्युलरिज्म के मूल दर्शन को समझना होगा सेक्युलरिज्म का वास्तविक अर्थ है The Separation Of Religion From State यानी सत्ता का कोई धर्म न हो वह धार्मिकता से दूर रहकर समाज की उन्नति के लिए काम करे.

सेक्यूलरिज़्म यह कोई मामूली शब्द भर नही है बल्कि अपने आप में सम्पूर्ण दर्शन है और सेक्युलरिज्म वह दर्शन है जो धर्म के नाम करोड़ों लोगो की मौत के बाद शांति सौहार्द प्रेम सहिष्णुता और परस्पर सहयोग के रूप में आस्तित्व में आया.

आपको मालूम होगा की सोलवी सदी तक पूरा यूरोप कैथोलिक चर्च के द्वारा कंट्रोल होता था चर्च इतना ताकतवर हो चुका था की कोई भी राजा सीधे तौर चर्च के खिलाफ जाने की हिम्मत नही जुटा पाता था 1522 में मार्टिन लूथर के नेतृत्व में चर्च के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ मार्टिन का यह आंदोलन राजा हेनरी के समर्थन के बाद इतना ताकतवर हुआ की चर्च के खिलाफ पूरे यूरोप में बगावत शुरू हो गई और करीब अगले 200 वर्षों तक यह लगातार जारी रहा इसमे सबसे ज्यादा तबाही 1618 से 1648 के बीच हुई जिसे 30 एड्स वॉर भी कहा जाता है इस 30 ईयर वार में तकरीबन 80 लाख ईसाई आपस में लड़ लड़कर खत्म हो गये इस बीच यूरोप में कोई तरक्की नही हुई धर्म की इस लड़ाई में ज्ञान विज्ञान प्रगति और मानवता के लिए कोई जगह बची ही नही थी आखिरकार जब लड़ लड़ कर पूरा यूरोप तबाह हो गया तब लोगों को सूझी की धर्म और सत्ता का गठजोड़ सिर्फ और सिर्फ बर्बादी ही दे सकता है इसलिए दोनों का सैपरेशन जरूरी है यहीं से सेपरेशन ऑफ रिलीजन फ्रॉम स्टेट का उदय हुआ.

30 जनवरी 1648 को फ्रांस डेनमार्क स्वीडन और रोमन कैथोलिक स्टेट के तमाम छोटी बड़ी रियासतों के बीच एक समझौता हुआ जिसे ट्रीटी ऑफ वेस्ट फेलिया कहते हैं इस समझौते के अनुसार यूरोपियन महाद्वीप के तमाम देशों ने यह तय किया की धर्म का रिलीजन से कोई सम्बन्ध नही होगा.

यहीं से सेक्युलर स्टेट का कॉन्सेप्ट दुनिया को मिला जिसपर चलते हुए जल्द ही यूरोप में पुनर्जागरण या enlightment का दौर शुरू हुआ इसकी बदौलत ही यूरोप साइंस ह्यूमैनिटी फिलॉसफी और राजनीति का सबसे ताकतवर केंद्र बन पाया और दुनिया ने वह सब कुछ हासिल किया जिसे आज हम ह्यूमैनिटी डेमोक्रेसी साइंस और टेक्नोलॉजी कहते हैं.

बर्मिंघम के जॉर्ज जेकब हॉलीयाक ने सन् 1846 में सेक्युलरिज्म शब्द को परिभाषित करते हुए लिखा था"

"सत्ता द्वारा आस्तिकता-नास्तिकता धर्म और धर्म ग्रंथों में उलझे बगैर मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, चारित्रिक एवम बौद्धिक स्वभाव को मानवता के उच्चतम बिंदु तक विकसित करने के लिए स्थापित किया गया न्याय ज्ञान और सेवा का दर्शन ही सेक्युलरिज्म है"

आज पूरी दुनिया के लगभग सभी देश जार्ज जेकब के इसी सेक्युलर मूल्यों पर चलते हैं.

यूरोप अमेरिका कनाडा रसिया ऑस्ट्रेलिया अफ्रीका जैसे तमाम देशों ने सेक्युलरिज्म को अपने देश और समाज का अभिन्न हिस्सा बनाया है क्योंकि उन्हें मालूम है की एक बेहतर सामाजिक व्यवस्था की कल्पना सेक्युलरिज्म के बिना अधूरी है सेक्युलरिज्म डेमोक्रेसी की रीढ़ की हड्डी है इसके बिना लोकतंत्र का वजूद ही नही.

यही कारण है की भारत पाकिस्तान बांग्लादेश के वे कट्टर लोग भी पश्चिम की ओर भागते हैं जो अपने देश में सेक्युलरिज्म को दिन रात कोसते हैं. 

पाकिस्तान और बांग्लादेश के जो मुल्ला मौलवी उलेमा दिन रात सेक्युलर लिबरल लोगों को गालियां बकते हैं वही लोग पश्चिम के सेक्युलरिज्म की बदौलत वहां बड़ी बड़ी मस्जिदें खड़ी कर रहे हैं इसी सेक्युलरिज्म की बदौलत ही भारतीय उपमहाद्वीप से हर साल हजारों परिवार पश्चिम में जाकर बस जाते हैं और वहां का हिस्सा हो जाते हैं.

पिछले 20 सालों में केवल यूरोप के अंदर भारत के 300 से ज्यादा धार्मिक संस्थानों ने अपने कार्यालय खोले हैं 135 से ज्यादा इस्कॉन टेम्पल 300 से ज्यादा मस्जिदें और 167 मदरसे यह सब इसलिए नही की आपके धर्म से वे प्रभावित होते हैं बल्कि इसी सेक्युलरिज्म की बदौलत ही आप अपने धार्मिक प्रोपगेंडे को वहां स्थापित कर पा रहे हैं.

सेक्युलरिज्म का दूसरा पहलू भी है जिसकी वजह से सेक्युलरिज्म आज पूरी दुनिया में अपनी उपयोगिता खोता जा रहा है जब तक सेक्युलरिज्म पंथनिरपेक्षता का पर्यायवाची बना रहता है यह लोकतंत्र और मानवता के लिए सबसे उपयोगी दर्शन होता है लेकिन जैसे ही यह अपना वास्तविक मूल्य पंथनिरपेक्षता को छोड़कर धर्मनिरपेक्ष हो जाता है समस्याएं खड़ी होनी शुरू हो जाती हैं क्योंकि तब यह पन्थ वाद या इज्म की आजादी के बजाए सीधे तौर पर धार्मिक आजादी देना शुरू कर देता है.

यूरोप का सेक्युलरिज्म जैसे ही धार्मिक आजादी की ओर गया इसका नाजायज फायदा उठाते हुए इस्लाम ने वहां अपनी जड़ें कायम करनी शुरू कर दीं ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि धार्मिक आजादी इस्लाम को उदंड बना देती है जिससे वह अपना दबदबा कायम करने की फिराक में लग जाता है और कई बार वह कामयाब भी हो जाता है इसका दूसरा नुकसान यह होता है की इस्लाम के रिएक्शन में दूसरे सोए हुए धार्मिक गिरोहों को भी मौका मिल जाता है और वे भी उदंडता की ओर निकल पड़ते हैं.

सेक्युलरिज्म लोकतंत्र और मानवता के लिए एक उत्कृष्ट दर्शन तभी है जब यह पंथनिरपेक्ष बना रहे लेकिन सेक्युलरिज्म जब धर्मनिरपेक्षता का पर्यायवाची हो जाता है तब यह खुद में एक समस्या बन जाता है इसलिए मैं धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ हूँ लेकिन सेक्युलरिज्म के पक्ष में हूँ.

सेक्युलरिज्म के बारे में मीडिया और राजनीति द्वारा गढ़ी गई तमाम गलतफहमियों को दिमाग से निकाल कर फेंक दीजिये क्योंकि इसके बिना कोई भी लोकतंत्र बचेगा ही नहीं हमें पंथनिरपेक्षता के रूप में सेक्युलरिज्म को बचाने की दिशा में काम करना चाहिए ताकि लोकतंत्र जिंदा रह सके.

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