माँ (कविता) - तर्कशील भारत

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Sunday, May 10, 2020

माँ (कविता)

माँ (कविता)


माँ

इसी दुनिया में 
दो तरह के लोग रहते हैं
एक तरफ 
दौलत की अंधी दौड़ में 
बदहवास भागते वे लोग हैं 
जिनके लिए 
रिश्ते नाते 
भावनाएं संवेदनाएं
सबकी कीमत तय होती है
और दूसरी ओर
वे मुट्ठीभर लोग रहते हैं
जिनके लिए
रिश्ते नाते
भावनाएं संवेदनाएं
सब
निशुल्क होते हैं

कुछ लोग 
माँ की ममता 
और उसके दूध का कर्ज
ओल्डएज होम की 
फीस के रूप में चुकाते हैं

तो कुछ
माँ की ममता 
और उसके दूध का कर्ज
कभी अदा नही कर पाते
लेकिन 
माँ की परवरिश और उसके 
आँचल का फर्ज 
जरूर अदा कर देते हैं

माँ 
सिर्फ एक अक्षर का छोटा सा
शब्द ही तो है
लेकिन इस मामूली शब्द में 
प्रकृति का सबसे गूढ़ रहस्य छुपा है
वह है सृजन,

सृजन जीवन का
सृजन जीवों का
सृजन हर उस प्राणी का
जो इस प्रकृति की गोद में
पैदा होता है विचरता है 

माँ 
ही तो है
जो हमारा निर्माण करती है
माँ के गर्भ से निकलकर ही
हम धरती पर आते हैं
मां के आँचल से ही 
हमारा संसार शुरू होता है

एक माँ के लिये 
उसकी संतान ही 
उसकी जान होती है
उसकी रूह 
उसकी आन बान शान 
और उसकी पहचान होती है

अपने पेट मे अपनी संतान को 
नौ महीने रखने वाली माँ
कभी उगताती नही
कभी परेशान नही होती

प्रसव की भयानक पीड़ा को
वो अपनी मातृत्व की वेदना में 
सह लेती है

माँ की खोख से निकलकर
आये एक नन्हे बच्चे के लिए 
माँ ही उसकी शुरुआती दुनिया होती है 
माँ की छाया में वो बड़ा होता है 
माँ की ममता उसे इंसान बनाती है
माँ के प्यार और डांट से वह 
सही और गलत में फर्क करना सीखता है 
माँ की गोद ही उसका समाज होता है 
माँ के आंचल की छांव में 
उसकी हस्ती का निर्माण होता है 
माँ के दूध से उसका जिस्म आकार लेता है 
मां की आंखों से ही वह 
दुनिया को देखना शुरू करता है 
इसलिए एक इंसान सबसे पहला शब्द 
माँ ही सीखता है.

एक शिशु को एक इंसान बनाने में 
एक माँ का पूरा आस्तित्व समाया होता है

लेकिन वही इंसान 
माँ की ममता को भुला दे 
माँ की वेदना को न समझे 
माँ को तब छोड़ कर चला जाये 
जब माँ को 
अपनी संतान के सहारे की 
सबसे ज्यादा जरूरत होती है 
तब भी वो माँ ऐसी संतानों को 
बददुआ नही देती...

ओल्डएज होम में
संतानों के सालाना विजिट के इंतजार में
पथराई बूढ़ी आंखे भी 
कभी ममताविहीन नहीं होतीं....

ऐसी ही होती है माँ.

-शकील प्रेम

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