युवा नही बल्कि बोझ हो मानवता पर (कविता) -शकील प्रेम - तर्कशील भारत

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Monday, May 4, 2020

युवा नही बल्कि बोझ हो मानवता पर (कविता) -शकील प्रेम

युवा नही बल्कि बोझ हो मानवता पर (कविता) -शकील प्रेम

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नोट- यह लेख केवल उन "युवा" भक्तों के लिए है जो आजकल अपने सच्चे मोमिन होने की नुमाइश की खातिर अफ्तार की सेल्फी के साथ शोशल मीडिया पर दिखाई दे रहे हैं.(खासकर मेरे अपने रिश्तेदार)


रमजान के नाम पर जहालत की परम्परा को सेलिब्रेट करने वाले मेरे प्रिय युवा रोजेदारों, थोड़ी भी शर्म बाकी हो तो कम से कम अफ्तारी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तो अपलोड मत करो. क्या साबित करना चाहते हो की बड़े वाले मोमिन हो अल्लाह के असली बन्दे हो ? तुम कुछ नही हो बस जाहिल हो वो भी बड़े वाले और युवा नही बल्कि बोझ हो मानवता पर.


किसके लिए यह सब कर रहे हो ? उसके लिए जो है ही नही या उसके लिए जो आसमान में कहीं मुंह छुपाए बैठा तुम्हारी अफ्तारी की तस्वीरों को देखकर खुश हो रहा है ?


थोड़ी भी अक्ल बची हो तो जरा सोचो की पूरी जिंदगी रोजा और नमाज कायम करने वाले हमारे पूर्वजों ने इससे क्या हासिल कर लिया ? अंधविश्वास और गरीबी की परम्पराओं को आगे बढ़ाने के अलावा हमारे पूर्वजों की और भी कोई खास उपलब्धि हो तो खोज निकालो, कुछ नही मिलेगा जहालत के सिवा.


रोजा नमाज के नाम पर न तो हमारे पूर्वजों ने कुछ हासिल किया न हमे कुछ हासिल होने वाला है ठहर कर जरा सोचिए कहीं हम भी आज वही गलती तो नही कर रहे हैं जो हमारे बुजुर्गों ने किया ? धर्म के जंजाल में आकंठ डूब कर भी न उन्हें कुछ मिला न हमे कुछ मिलेगा तो फिर क्यों आज हम भी सड़ी हुई परम्पराओं के गर्त में खुद को और अपनी नस्लों को धकेल रहे हैं ? यह जहालत नही तो और क्या है ?


आख़िरत किसने देखा है ? कौन लौटकर आया ये बताने के लिए की वास्तव में "ऊपर" सब कुछ वैसा ही है जैसा 1400 साल पहले कोई नबी अरबी लोगों को बता गया था ? 


जो युवा आज रोजा रखकर खुद को सच्चा मोमिन समझ इतरा रहे हैं वे दरअसल समाज पर बोझ हैं और युवा होने पर कलंक हैं.


भगत सिंह भी युवा थे और वे भी भूखे रहे थे वो भी पूरे 115 दिन लगातार, बीच में न सेहरी न अफ्तारी और तुम सुबह ठूंस कर खाते हो और शाम को फिर ठूस लेते हो इसी को रोजा कहकर इतराते भी हो.


तुम आख़िरत के नाम पर पूरे दिन रोजा रखते हो भगत सिंह ने इंसानियत की खातिर 115 दिन का लम्बा भूख हड़ताल किया था तुम एक खुदा की खातिर भूखे रहते हो भगतसिंह ने सारे खुदाओं की धज्जियां उड़ा दी थीं तुम धर्म के नाम पर रोजा रखते हो भगत सिंह ने धर्म को लात मार दी थी.


23 साल की ही उम्र तो थी जब वे जेल से चिल्ला कर दुनिया को बता रहे थे की "मैं नास्तिक क्यों हूँ ?" और तुम इस उम्र में दुनिया को क्या बता रहे हो ? की "देखो, मैं युवा नही बल्कि बोझ हूँ मानवता पर".





(मैं एक युवा को तब तक मानवता पर बोझ ही मानूंगा जब तक वह भगत सिंह पेरियार और अम्बेडकर की भांति अपने ही धर्म के खिलाफ उठ खड़ा न हो)

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