प्रश्न 1. इस यूनिवर्स को किसने बनाया और यह इतना एक्यूरेट कैसे काम कर रहा है ? - तर्कशील भारत

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Monday, May 4, 2020

प्रश्न 1. इस यूनिवर्स को किसने बनाया और यह इतना एक्यूरेट कैसे काम कर रहा है ?



सृष्टि में न तो कुछ भी तुक्का है न ही कुछ भी एक्यूरेट. सृस्टि के सम्बन्ध में ये दोनों ही शब्द एकदम गलत हैं 


यह सवाल हम तभी करते हैं जब हम यूनिवर्स के नियमों से अनजान होने हैं यदि हम ग्रेविटी को ठीक से समझ जाएं तो यूनिवर्स के बाकी नियमों को समझना भी हमारे लिए मुश्किल नही होगा.

ग्रेविटी वह ताक़त है जिससे सेब जमीन पर गिरता है नदियों में पानी बहता है झरने गिरते हैं इसी ग्रेविटी की बदौलत पृथ्वी सूरज चांद सितारे गेलेक्सीज और ब्लैकहोल गतिशील होते हैं. यदि आप कहेंगे की ग्रेविटी को किसने बनाया ? तो समझिए की आप ग्रेविटी को ठीक से समझे ही नहीं. तत्व है तो ग्रेविटी है तत्व नही तो ग्रेविटी नही मतलब ग्रेविटी के लिए तत्व का होना जरूरी है तत्व के लिए ग्रेविटी का होना जरूरी है.


परमाणु से लेकर विशाल कलस्टर तक सभी ग्रेविटी से बंधे हैं. सृष्टि में हमारे सौरमण्डल के इर्द गिर्द चक्कर लगाते सभी ग्रह इसी ग्रेविटेशनल फोर्स के तहत ऐसा करते हैं यहां कुछ भी ecuration नही है और न ही तुक्का.


हमारी धरती 4 अरब साल पहले भी सूरज का लगभग वैसे ही चक्कर लगाती थी जैसे आज लगाती है 3 अरब साल पहले भी हमारा यह चाँद लगभग ऐसे ही हमारी धरती का चक्कर लगाता था जैसे आज लगाता है तब भी इस बियाबान धरती पर पूर्णिमा का चाँद खिलता था तब भी बारिश होती थी नदियां बहती थीं तूफान आते थे बिजली चमकती थी लेकिन तब धरती पर जीवन नही था क्योंकि तब यहां का वातावरण जीवन के अनुकूल नही था.कल अगर धरती से जीवन खत्म हो जाए तो भी अरबों साल तक पृथ्वी चाँद बादल बारिश अपना काम वैसे ही करेगी जैसे आज करती है. 


दुनिया के किसी भी जंगल को देख लीजिये वहां पेड़ पौधे रोज पैदा होते हैं और मरते हैं इस जंगल में कहीं नदियां बहती हैं तो कहीं झरने गिर रहे हैं कहीं पहाड़ हैं तो कहीं घास झाड़ियां और खुले मैदान. इन खुले मैदानों में कुछ चींटियां हैं जिन्होंने अपनी कालोनियां बनाई हुई हैं. कुछ परिंदे हैं जिन्होंने अपने घोसले बनाये हुए है अब यदि इनमें से कुछ चींटियां और परिंदे ज्यादा समझदार होकर यह सोचने लग जाएं की यहां सब इतना एक्यूरेट क्यों है ? तो आप इसे क्या कहेंगे ? क्या यह कहना उचित होगा की यहां सब कुछ इतना एक्यूरेट है ? ये पहाड़ यहीं पर क्यों है ये नदी थोड़ा सा आगे पीछे क्यों नही ? ये घास का मैदान इतना बड़ा क्यों है ? ये झाड़ियां इतनी परफेक्ट क्यों है ? चींटियों ने यहीं क्यों अपनी कालोनी बनाई ? पक्षियों ने अपने घोसले पेड़ की इसी डाल पर क्यों बनाये ? ऐसा सोचना ही गलत है यहां कुछ भी एक्यूरेट नही है.


करोड़ों साल से जंगल का पूरा सिस्टम यूँही खुद ब खुद चल रहा है न तो यहां आकर कोई पेड़ों को उगा रहा है न नदियों को चला रहा है न बादल बिजली बारिश कर रहा है इस जंगल का पूरा निजाम खुद ब खुद चल रहा है जिस तरह इस जंगल को व्यवस्थित कहना बेवकूफी है ठीक वैसे ही इस यूनिवर्स को एक्यूरेट कहना मूर्खता है.


यूनिवर्स को किसी ने नही बनाया जैसे बादल का बनना बिजली का चमकना और बारिश का बरसना ये सब किसी दूसरी घटना के परिणाम होते हैं वैसे ही यूनिवर्स का बनना भी उससे पहले की किसी घटना का रिजल्ट है कभी हम धरती के आखिरी छोर का रास्ता ढूंढते थे और उस आखिरी छोर पर अपने खुदा की कल्पना करते थे जैसे जैसे हमारा ज्ञान धरती के छोर से निकल कर यूनिवर्स की गहराइयों में आगे बढ़ता गया हमारा ईश्वर भी हमसे उतना ही दूर भागता गया और आज वह बिग बैंग के छोर पर जाकर बैठा है.


यहां समझने वाली बात यह है की सृष्टि में आप जहां तक नजर दौड़ाएंगे या जिस भी मूवमेंट पर गौर करेंगे उन सब के पीछे आपको कारण नजर आएगा यहां या वहां अकारण कुछ भी नहीं है सृष्टि की हर क्रिया के पीछे कारण है और हर कारण के पीछे भी कारण है और फिर उसके पीछे भी कारण. अब रही बात की सृष्टि में सब कुछ इतना एक्यूरेट क्यों है ? तो यह खयाल भी हमे तब आया जब हम सृष्टि को समझने के काबिल हुए.


जब हम गुफाओं में रहते थे तब हमारी सोच सिर्फ भोजन सुरक्षा और प्रजजन तक सीमित थी आज भी दुनिया की एक तिहाई आबादी के लिए सृष्टि व्यवस्थित है या नही इस सवाल से कोई मतलब नही. क्योंकि उसकी चेतना भोजन सुरक्षा और प्रजजन तक ही सीमित है. 


कल के पहाड़ आज के मरुस्थल बन चुके हैं कल जो जंगल थे आज वे पेट्रोलियम बन चुके है और कल यही सारा का सारा पेट्रोलियम कार्बन में रूपांतरित हो जाएगा यह सृस्टि सदा से थी और सदा रहेगी बस एनर्जी का रूपांतरण होता रहेगा.


सृस्टि की हर गतिविधि क्रिया और कारण के सिद्धांत पर आधारित होती है कायनात का पूरा निजाम भी यही है इस पूरे सिस्टम में कहीं कोई ईश्वर अल्लाह या गॉड नही है और यहां या वहां कहीं उसकी जरूरत भी नहीं है इसलिए मनुष्य होने के नाते आज हमे इस सवाल का जवाब ढूंढना ही होगा की जो नही है उसे हम खोज ही क्यों रहे हैं ? 


चेतन गोयल जी कहते हैं धरती अगर अपनी जगह से थोड़ी भी इधर या उधर होती तो यह वैसी नही होती जैसी आज है क्या यह सब तुक्का है ?


सृष्टि में न तो कुछ भी तुक्का है न ही कुछ भी एक्यूरेट. सृस्टि के सम्बन्ध में ये दोनों ही शब्द एकदम गलत हैं 


यह सवाल हम तभी करते हैं जब हम यूनिवर्स के नियमों से अनजान होने हैं यदि हम ग्रेविटी को ठीक से समझ जाएं तो यूनिवर्स के बाकी नियमों को समझना भी हमारे लिए मुश्किल नही होगा.

ग्रेविटी वह ताक़त है जिससे सेब जमीन पर गिरता है नदियों में पानी बहता है झरने गिरते हैं इसी ग्रेविटी की बदौलत पृथ्वी सूरज चांद सितारे गेलेक्सीज और ब्लैकहोल गतिशील होते हैं. यदि आप कहेंगे की ग्रेविटी को किसने बनाया ? तो समझिए की आप ग्रेविटी को ठीक से समझे ही नहीं. तत्व है तो ग्रेविटी है तत्व नही तो ग्रेविटी नही मतलब ग्रेविटी के लिए तत्व का होना जरूरी है तत्व के लिए ग्रेविटी का होना जरूरी है.


परमाणु से लेकर विशाल कलस्टर तक सभी ग्रेविटी से बंधे हैं. सृष्टि में हमारे सौरमण्डल के इर्द गिर्द चक्कर लगाते सभी ग्रह इसी ग्रेविटेशनल फोर्स के तहत ऐसा करते हैं यहां कुछ भी ecuration नही है और न ही तुक्का.


हमारी धरती 4 अरब साल पहले भी सूरज का लगभग वैसे ही चक्कर लगाती थी जैसे आज लगाती है 3 अरब साल पहले भी हमारा यह चाँद लगभग ऐसे ही हमारी धरती का चक्कर लगाता था जैसे आज लगाता है तब भी इस बियाबान धरती पर पूर्णिमा का चाँद खिलता था तब भी बारिश होती थी नदियां बहती थीं तूफान आते थे बिजली चमकती थी लेकिन तब धरती पर जीवन नही था क्योंकि तब यहां का वातावरण जीवन के अनुकूल नही था.कल अगर धरती से जीवन खत्म हो जाए तो भी अरबों साल तक पृथ्वी चाँद बादल बारिश अपना काम वैसे ही करेगी जैसे आज करती है. 


दुनिया के किसी भी जंगल को देख लीजिये वहां पेड़ पौधे रोज पैदा होते हैं और मरते हैं इस जंगल में कहीं नदियां बहती हैं तो कहीं झरने गिर रहे हैं कहीं पहाड़ हैं तो कहीं घास झाड़ियां और खुले मैदान. इन खुले मैदानों में कुछ चींटियां हैं जिन्होंने अपनी कालोनियां बनाई हुई हैं. कुछ परिंदे हैं जिन्होंने अपने घोसले बनाये हुए है अब यदि इनमें से कुछ चींटियां और परिंदे ज्यादा समझदार होकर यह सोचने लग जाएं की यहां सब इतना एक्यूरेट क्यों है ? तो आप इसे क्या कहेंगे ? क्या यह कहना उचित होगा की यहां सब कुछ इतना एक्यूरेट है ? ये पहाड़ यहीं पर क्यों है ये नदी थोड़ा सा आगे पीछे क्यों नही ? ये घास का मैदान इतना बड़ा क्यों है ? ये झाड़ियां इतनी परफेक्ट क्यों है ? चींटियों ने यहीं क्यों अपनी कालोनी बनाई ? पक्षियों ने अपने घोसले पेड़ की इसी डाल पर क्यों बनाये ? ऐसा सोचना ही गलत है यहां कुछ भी एक्यूरेट नही है.


करोड़ों साल से जंगल का पूरा सिस्टम यूँही खुद ब खुद चल रहा है न तो यहां आकर कोई पेड़ों को उगा रहा है न नदियों को चला रहा है न बादल बिजली बारिश कर रहा है इस जंगल का पूरा निजाम खुद ब खुद चल रहा है जिस तरह इस जंगल को व्यवस्थित कहना बेवकूफी है ठीक वैसे ही इस यूनिवर्स को एक्यूरेट कहना मूर्खता है.


यूनिवर्स को किसी ने नही बनाया जैसे बादल का बनना बिजली का चमकना और बारिश का बरसना ये सब किसी दूसरी घटना के परिणाम होते हैं वैसे ही यूनिवर्स का बनना भी उससे पहले की किसी घटना का रिजल्ट है कभी हम धरती के आखिरी छोर का रास्ता ढूंढते थे और उस आखिरी छोर पर अपने खुदा की कल्पना करते थे जैसे जैसे हमारा ज्ञान धरती के छोर से निकल कर यूनिवर्स की गहराइयों में आगे बढ़ता गया हमारा ईश्वर भी हमसे उतना ही दूर भागता गया और आज वह बिग बैंग के छोर पर जाकर बैठा है.


यहां समझने वाली बात यह है की सृष्टि में आप जहां तक नजर दौड़ाएंगे या जिस भी मूवमेंट पर गौर करेंगे उन सब के पीछे आपको कारण नजर आएगा यहां या वहां अकारण कुछ भी नहीं है सृष्टि की हर क्रिया के पीछे कारण है और हर कारण के पीछे भी कारण है और फिर उसके पीछे भी कारण. अब रही बात की सृष्टि में सब कुछ इतना एक्यूरेट क्यों है ? तो यह खयाल भी हमे तब आया जब हम सृष्टि को समझने के काबिल हुए.


जब हम गुफाओं में रहते थे तब हमारी सोच सिर्फ भोजन सुरक्षा और प्रजजन तक सीमित थी आज भी दुनिया की एक तिहाई आबादी के लिए सृष्टि व्यवस्थित है या नही इस सवाल से कोई मतलब नही. क्योंकि उसकी चेतना भोजन सुरक्षा और प्रजजन तक ही सीमित है. 


कल के पहाड़ आज के मरुस्थल बन चुके हैं कल जो जंगल थे आज वे पेट्रोलियम बन चुके है और कल यही सारा का सारा पेट्रोलियम कार्बन में रूपांतरित हो जाएगा यह सृस्टि सदा से थी और सदा रहेगी बस एनर्जी का रूपांतरण होता रहेगा.


सृस्टि की हर गतिविधि क्रिया और कारण के सिद्धांत पर आधारित होती है कायनात का पूरा निजाम भी यही है इस पूरे सिस्टम में कहीं कोई ईश्वर अल्लाह या गॉड नही है और यहां या वहां कहीं उसकी जरूरत भी नहीं है इसलिए मनुष्य होने के नाते आज हमे इस सवाल का जवाब ढूंढना ही होगा की जो नही है उसे हम खोज ही क्यों रहे हैं ?

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