दया दान पुण्य और परोपकार - तर्कशील भारत

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Wednesday, October 30, 2019

दया दान पुण्य और परोपकार


दया दान पुण्य और परोपकार जैसे शब्दों का आविष्कार उन लोगों ने किया है जिनकी वजह से दुख तकलीफें अन्याय और शोषण की यह अमानवीय संस्कृति तैयार हुई है आप मेरी इन बातों से असहमत हो सकते हैं लेकिन यही सच है क्योंकि दयावान बनने के लिए लाचार लोगों की जरूरत होती है दानी बनने के लिए भिखारियों की आवश्यकता होती है और पुण्य या सबाब का काम तभी कर पाओगे जब आपको उस पुण्य या सबाब के बदले में कुछ रिवार्ड पाने की चाह होगी. पराए पर उपकार यानी परोपकार तभी कर पाओगे जब आपके उपकार को लालायित तुच्छ लोग उप्लब्ध होंगे इसलिए कुछ लोगों को महान बनने के लिए हमेशा गरीब बदहाल बेबस और लाचार लोगों की जरूरत होती है दया दान पुण्य और परोपकार जैसे भारी भरकम शब्दों के कारण ही गरीबी शोषण बदहाली दर्द आंसू और अवहेलनाएँ जस की तस बनी रहती हैं और इन तमाम सामाजिक विसंगतियों के सहारे कुछ लोग दया दान पुण्य और परोपकार कर महान बन जाते हैं. क्योंकि ये भारी भरकम शब्द रचे ही इसीलिए गये हैं ताकि शोषणवादी गिरोह शोषण करते हुए भी शोषितों के बीच महान बना रहे. जब से फुटपाथों का निर्माण हुआ है तभी से गरीबों की कई पीढ़ियां यहां कुछ महान लोगों के दया दान पुण्य और परोपकार के सहारे पल रही है क्या बदला कुछ भी तो नही कुछ लोग फुटपाथों पर भटकते इन बच्चों को खाना खिलाकर इन्हें कपड़े पहना कर महान जरूर बन गए लेकिन हालात वही के वही हैं. न जाने कब से मंदिरों मजारों गुरुद्वारों के बाहर खड़ी इंसान नुमा एलियंस की भीड़ महान लोगों के दया दान पुण्य और परोपकार के सहारे ही अपना पेट भर रही है और ईन धर्मस्थलों के आगे खड़ी लाचार लोगों की लम्बी कतारों में इन बेबस लोगों की न जाने कितनी पीढियां खप चुकी हैं. भिखारी और दानी दोनों एक दूसरे की जरूरत हैं भिखारी दानियों को पैदा करता है फिर दानी लोग मिलकर भिखारियों की भीड़ बढ़ाते हैं मतलब दोनों प्रजातियों का आस्तित्व एक दूसरे पर निर्भर है. जितने भी समृद्ध देश दुनिया मे हैं वहां ये दोनों तरह की प्रजाति गायब है इसलिए वो देश समृद्धि और खुशहाली के शिखर पर हैं वहां दया दान पुण्य और परोपकार की संस्कृति नही है इसलिए वहां गरीबी बेबसी भूख कुपोषण और अन्याय भी नही है और यही कारण है कि वहां के लोग मानव विकास में सबसे आगे हैं. शब्दों की भी अपनी फिलॉसफी होती है हर शब्द का अपना मनोविज्ञान होता है दया दान पुण्य और परोपकार जैसे शब्दों के पीछे भी फिलॉसफी है और मनोविज्ञान है जिसे समझने की जरूरत है. हमे यह समझना होगा कि सृष्टि के हर तत्व में कुछ गुण होते है जिससे उसकी पहचान होती है चाहे जड़ हो या चेतन सबके अपने अपने गुण है जैसे पृथ्वी का गुण है कि वह अपनी धुरी पर घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा करती है सूरज का गुण है कि वह सौरमण्डल के सभी ग्रहों उपग्रहों को ऊर्जा देते हुए आकाशगंगा की परिक्रमा करता है जल वायु नदी पहाड़ समुद्र ये सब कुछ नियमों से बंधे हुए है जो इनकी पहचान है इसी तरह जीवन के जितने भी अवयव हैं जैसे बैक्टीरिया पंछी मछली रेप्टाइल या स्तनपाई सबके पास अपनी अलग पहचान है सबके पास उनका अपना विशेष गुण है जो उन्हें दूसरों से अलग पहचान देता है. यह नैसर्गिक गुण अच्छा या बुरा नही होता बल्कि यह उनके और उनकी प्रजाति के आस्तित्व के लिए बेहद जरूरी होता है जैसे शेर का गुण है कि वह हिरण को मार कर खाता है तो उसका यह गुण उसकी पहचान भी है और उसके आस्तित्व के लिए जरूरी भी है. इसी तरह मानव के भी कुछ गुण हैं जो उसे दूसरे जीवों से अलग बनाते हैं और मानव होने का सबसे बड़ा गुण है उसका सामाजिक होना. करोड़ों वर्षों के विकासक्रम के दौरान आखिरकार इंसान एक सामाजिक प्राणी बना जिससे उसे पनपने का मौका मिला उसने जाना कि सामाजिकता से ही वह सुरक्षित रह सकता है और उन्नति कर सकता है आगे चलकर मानव प्रजाति के आस्तित्व में बने रहने के लिए उसका सामाजिक प्राणी बने रहने का गुण ही उसकी सबसे बड़ी जरूरत बन गई. सामाजिक प्राणी होने से सामूहिक चेतना का विकास हुआ खानाबदोश जीवन में संघर्ष के दौरान ज्यादा श्रम के बदले उसे थोड़ा कुछ मिलता था तो सामाजिक हो जाने के बाद कम श्रम के बदले ज्यादा कुछ मिल जाता था जिससे उसका बहुत सारा समय बच जाता था इस नए सामाजिक ताने बाने का मानव पहले से ज्यादा सुरक्षित भी था जिससे उसके लिए बौद्धिक उन्नति के मार्ग खुल गए. कुछ लोग जो सामाजिकता की इस संस्कृति में फिट नही बैठते थे वो अराजकता पैदा करते थे तो डर भय दण्ड और लालच द्वारा समाज के इन अराजक तत्वों को काबू में किया जाता और कुछ लोग प्राकृतिक आपदाओं की वजह से मुख्यधारा से पिछड़ जाते थे तो सहयोग की संस्कृति द्वारा इन पिछड़े हुए लोगों को मुख्यधारा से जोड़ा जाता. इस तरह शुरुआती सामाजिक नियमों का निर्माण हुआ और भय लालच दंड और सहयोग की परंपरा का विकास शुरू हुआ और यही से सहयोग मानव का गुण बन गया जो मनुष्य के सामाजिक प्राणी बने रहने के लिए बेहद जरूरी था. आगे चलकर आबादी बढ़ी तो समाज की जरूरतें भी बढ़ी और सामाजिकता को व्यवस्थित रखने की चुनौतियां भी बढ़ी जिससे कई बड़ी छोटी सभ्यताओं का उदय हुआ प्रत्येक सभ्यताओं के नए नियम कानून बने जो आगे चलकर परंपराओं में बदल गए जैसे जैसे मानवता समृद्धि की ओर बढ़ी सामाजिकता को बनाये रखने के लिए नए नियमों की जरूरत भी बढ़ती चली गई क्योंकि मनुष्य के यहां तक पहुंचने में समाज की सबसे अहम भूमिका थी इसलिए मनुष्य ने समाज की इस अहमियत को हर युग मे पहचाना और परिष्कृत किया. आगे चलकर सामाजिक भावनाओं ने सामाजिक वर्चस्व की मानसिकता को जन्म दिया जिससे एक इंसानी समाज दूसरे इंसानी समाज से होड़ करने लगा सामाजिक वर्चस्व की इसी मानसिकता के कारण सभ्यताएं साम्राज्यों में बदली और साम्राज्यवाद का उदय हुआ जिसकी वजह से लाखों युद्ध हुए इस भयंकर अराजकता में अपने अपने वर्चस्व के लिए सभी साम्राज्यों को फिर से नए नियमों की जरूरत पड़ी. इसी दौरान करुणा मैत्री सदभाव अहिंसा और क्षमा जैसे शब्द भी इंसानी सभ्यताओं का हिस्सा बने और आगे चलकर यह तमाम शब्द इंसान के सामाजिक प्राणी होने के गुण बन गये जिनमे इन मानवीय गुणों का अभाव होता वह समाज के लिए खतरा बन जाता इसलिए लगभग सभी सभ्यताओं में इन मानवीय गुणों को स्वीकार कर लिया गया आगे चलकर इन्ही मानवीय गुणों की विवेचना अनेकों दार्शनिकों ने की और इसी मानवीय दर्शन पर बड़े बड़े दर्शनशास्त्र लिखे गए. इन तमाम मानवीय शब्दों के पीछे की फिलॉसफी और मनोविज्ञान यही था कि सामाजिक व्यवस्था में अराजकता खत्म हो और मानवता निर्बाध रूप से आगे बढ़ती चली जाए ये तमाम शब्द एक इंसान द्वारा दूसरे इंसान के शोषण के खिलाफ ही बने थे ताकि सामाजिकता कायम रहे समाज का हर इंसान समाज मे खुद को सुरक्षित महसूस करे और प्रत्येक मनुष्य सामाजिक उत्थान में उपयोगी साबित हो सके. लंबे वक्त तक इंसानी समाज करुणा मैत्री सदभाव अहिंसा क्षमा और सहयोग जैसे मानवीय गुणों के सहारे आगे बढ़ता चला गया इन्ही मानवीय गुणों पर आधारित सोच की बदौलत ही इंसानी सभ्यताओं ने विज्ञान प्रौधोगिकी लोकतंत्र और न्यायव्यवस्था की नई इबारतें लिखीं जिसपर चल कर आज हम यहां तक पहुंचे हैं. लेकिन इतिहास के किसी पड़ाव पर जब आबादी और बढ़ी तो सामाजिक व्यवस्थाओं में विकार पैदा होने लगा लूट झूठ शोषण और पाखंडवाद की मानसिकता ने सामाजिक ताने बाने को विकृत रूप दे दे दिया इस नई संस्कृति ने संपन्नता और विपन्नता की खाई को पैदा कर दिया जिसमे समाज का एक हिस्सा सभी संसाधनों का मालिक बन बैठा तो एक बहुत बड़ा वर्ग इन संसाधनों की पहुंच से दूर छिटक कर हाशिये पर जा पहुंचा. इस बड़े वर्ग को काबू में रखने के लिए समृद्ध वर्ग तीन भागों में विभाजित हुआ राजनैतिक वर्ग धार्मिक वर्ग और पूंजीपति वर्ग तीनों के आपसी गठजोड़ ने इस सामाजिक असंतुलन को बरकरार रखने के लिए कई नए नियम रच डाले जिससे वंचित वर्ग में कभी विद्रोह की भावना पैदा न हो सके. राजनैतिक गिरोह ने वंचित तबके को सामाजिक सुरक्षा और मूलभूत अधिकारों के नाम पर हमेशा भ्रम में रखा तो धार्मिक गिरोहों ने उसे समझाया कि तुम्हारे दुखों की असली वजह तुम्हारा भाग्य है तुम्हारे वर्तमान के दुख पिछले जन्म का परिणाम है या सुख भोगने वाले लोग दुख भोगने वाले लोगों को समझाते हैं कि कलयुग में दुख ही दुख है कलयुग खत्म होगा तो सतयुग आएगा जहां सुख ही सुख होगा अल्लाह को गरीब पसंद हैं जितना दुख झेलोगे खुदा आख़िरत में इंसाफ करेगा और तुम्हे जन्नत में उससे बेहतर सुख सुविधाएं प्रदान करेगा जिसकी चाह तुम दुनिया मे रखते हो. राजनैतिक और धार्मिक गिरोहों के इन षड्यंत्रों से पूंजीपति वर्ग और मजबूत हुआ इस तरह इन तीनों वर्गों का भयंकर गठजोड़ तैयार हुआ और शोषण अन्याय लूट झूठ और पाखण्डों के नए कीर्तिमान स्थापित करता चला गया तीनों के इस प्रायोजित बर्गलाहट में बहुसंख्यक शोषित वर्ग मुफलिसी में मुस्कुराना सीख गया और फिर शाशक और शोषक वर्गों द्वारा बनाई गई विघटनकारी नीतियों का शिकार होकर शिक्षा न्याय समता और उन्नति के मार्ग से सदा के लिए दूर हो गया. यहीं से दया दान पुण्य और परोपकार की मानसिकता का उदय हुआ जिसके सहारे वंचित समाज मे शोषक वर्ग के प्रति प्रतिकार की भावना को खत्म कर दिया गया और वंचित समाज मे प्रतिकार की जगह कृतज्ञता का भाव भर दिया गया. इस तरह समाज दानवीर दयावान पुण्यात्मा और परोपकारी महात्माओ की भीड़ से भर गया जिनमे दया तो थी लेकिन वे परिस्थितियों को नही बदल सकते थे जो दान तो दे सकते थे लेकिन उत्थान नही कर सकते थे ऐसे तमाम महान आत्मा पुण्य तो कर सकते थे लेकिन परिवर्तन करने की क्षमता उनमे नही थी वे परोपकार तो कर सकते थे लेकिन किसी अभागे की किस्मत नही बदल सकते थे क्योंकि महान आत्माओं की ये विशाल भीड़ ईश्वर के नियमों से बंधी थी और मानती थी कि हालात में बदलाव करना उनके बस की बात नही है वे तो बस महान बनने के लिए ही पैदा हुए हैं और सदा महान बने रहने के लिए उन्हें दानी दयालु पुण्यात्मा और परोपकारी बने रहना जरूरी है दान दया पुण्य और परोपकार के लिए ऐसे लोगों की भी जरूरत है जिनपर दया दान पुण्य और परोपकार कर महान बना जा सके. इसी मानसिकता ने कभी गरीबी खत्म नही होने दी क्योंकि गरीब और गरीबी के प्रति जो मानवीय संवेदनाएं होनी चाहिए वो दान दया पुण्य और परोपकार की मानसिकता के कारण कभी पनपी ही नही. करुणा सहयोग न्याय और संवेदनशीलता के मानवीय गुण को हमने दया दान पुण्य और परोपकार में बदल दिया जिससे एक मानव का दूसरे मानव के प्रति कर्तव्य की भावना समाप्त हो गई और एक मानव दूसरे के लिए महान बनता चला गया. हमने करुणा मैत्री सद्भाव और सहयोग के मानवीय गुण को त्याग कर दान दया पुण्य और परोपकार का मार्ग अपना लिया जिससे परिस्थितियों में बदलाव की जरूरत ही खत्म हो गई क्योंकि दान दया पुण्य और परोपकार की इस मानसिक प्रवित्ति से शोषक और शोषित दोनों वर्ग संतुष्ट हो गए एक का मुफ्त में पेट भरने लगा और दूसरा पराए पर किये गए इस बड़े उपकार से महान बनने लगा. इसी मानसिकता ने भीख भंडारा जकात इमदाद और खैरात जैसी कुत्सित सोच को जन्म दिया जिसके द्वारा समृद्ध तबका परस्पर सहयोग की भावना से आजाद होकर महान आत्मा की श्रेणी में पहुंच गया महान बनने की इसी होड़ की वजह से गरीबी और गरीबों की जरूरत बनी रही और गरीबी बहुसंख्यक आबादी की सोच और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन कर सदा के लिए स्थाई हो गई.. आज इसी मानसिकता की वजह से देश मे 31 लाख रजिस्टर्ड एनजीओज खड़े हो चुके हैं जो दया दान पुण्य और परोपकार की मानसिकता को साथ लेकर महान कार्य करने में जुटे हुए हैं देश मे स्कूलों की संख्या 15 लाख है और इन गैरसरकारी संस्थाओं की संख्या 31 लाख. दुनिया के कई देशों की आबादी से ज्यादा तो हमारे देश मे समाज सुधारने वाले संगठन काम कर रहे हैं फिर भी स्थिति जस की तस है क्योंकि गरीब और गरीबी दूर करने वाली इन सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं के पास योजनाएं तो बहुत हैं लेकिन उन योजनाओं में संवेदनाएं सिरे से गायब हैं. जो देश मानवता के सबसे उत्कृष्ट पायदान पर खड़े हैं वहां के कल्चर में दया दान पुण्य और परोपकार की मानसिकता नही है इसलिए न तो वहां थोक के भाव मे महात्मा पैदा होते हैं और न ही वहां समाज सुधार करने वाले लाखों संगठनो की जरूरत पड़ती है फिर भी वहां गरीबी कुपोषण लाचारी और अन्याय का नामोनिशान भी नही है क्योंकि उनकी सभ्यता वास्तविक मानवीय गुणों को समझती है जो करुणा मैत्री सदभाव न्याय समानता और सहयोग पर आधारित है इन्ही सारे शब्दों को मिलाकर एक शब्द बनता है मानवता और जहां दया दान पुण्य और परोपकार होता है वहां मानवता के ये सभी गुण निष्क्रिय हो जाते हैं. एक परोपकारी अगर अपने पूरे जीवन भर भी भंडारा चलाये तो उससे किसे फर्क पड़ता है ? भंडारा खाकर उसे सुबह शौच में बदलने वाली जनता वैसी की वैसी बनी रहती है और भंडारा चलाने वाला वह आदमी महान हो जाता है. इस तस्वीर को देखिये इसे किसी ने मेरे व्हाट्सअप पर भेजा था इस तस्वीर में एक बच्चा मिठाई की दुकान के आगे खड़ा है तस्वीर पर लिखा है कि जब भी आप ऐसे किसी बच्चे को देखें तो उसे मिठाई खिला दें मैं पूछता हूँ आप अपने पूरे जीवन मे ऐसे लाखों बच्चों को मिठाई खिला दे उससे क्या हो जाएगा ? हाँ कुछ ही समय मे आपको दुनिया महान जरूर कहने लगेगी लेकिन इस जैसे वो लाखों बच्चे वैसे के वैसे बने रहेंगे. अगर इन लाखों बच्चों को मिठाई खिलाने की बजाए आप इनमे से मात्र एक बच्चे को भी आप शिक्षित कर कामयाब बना दें तो आगे चलकर वही बच्चा कइयों को गुरबत के उस भयंकर दलदल से बाहर निकाल सकता है इसे ही वास्तविक परिवर्तन कह सकते हैं और यही संवेदनशीलता गरीबी के इस भयंकर दुर्भाग्य को सदा के लिए मिटा भी सकता है वर्ना मिठाई खिला खिला कर दया दान पुण्य और परोपकार करते रहिए कुछ नही होगा हाँ आप महान जरूर बन जाएंगे. ठीक ऐसे ही जकात खैरात इमदाद बांटने वाली मानसिकता से भी हालात नही बदलते जो जितना जकात देता है वो उतना ही बड़ा दानी हो जाता है. आपको पता है कि राजधानी दिल्ली की सड़कों की लाल बत्तियों पर कितने बच्चे भीख मांगते है ? ग्रीन लैंड की पूरी आबादी के डेढ़ गुना यानी करीब 73 हजार बच्चे राजधानी की सड़कों पर भटक रहे हैं और इसी राजधानी में करोड़पतियों की संख्या इन बच्चों से ज्यादा है अगर एक करोड़पति परिवार एक बच्चे की ही जिम्मेदारी उठा ले तो इन 73 हजार बच्चों का भविष्य सुधर सकता है लेकिन ऐसा वे क्यों करेंगे ? उनके पास जो है वो उनके परमात्मा ने दिया है तब वे अपने उस खुदा की भक्ति क्यों न करें जिसने उन्हें धनवान बनाया है और उनके अनुसार सड़कों पर भटकते ये बच्चे अपने पिछले जन्मों का कर्मफल ही तो भोग रहे हैं ? फिर ये लोग अपने ईश्वर की बनाई इस व्यवस्था से खिलवाड़ कैसे कर सकते हैं ? देश को गुरबत की सडांध में धकेलने के लिए यही मानसिकता जिम्मेदार है और इस मानसिकता के लोग ही दया दान पुण्य और परोपकार पर आधारित इस व्यवस्था को बनाये रखना चाहते हैं इसी वजह से इस सनातन विकृति में कभी परिवर्तन नही हो पाता. देश बनता है गांवों से कस्बो से लेकिन इन गांवों कस्बो की स्थिति जाकर देख आइये चारों ओर बदहाली परेशानी और लाचारी का अंबार मिलेगा इन देहातों के सक्षम लोग कस्बो में बस गए कस्बो के सक्षम लोग शहरों की ओर भाग गए और शहरों के सक्षम के लोग विदेशों में जा कर बस रहे हैं लेकिन कोई अपने मूल स्थान के हालातों को बदलने के लिए कुछ नही करता इस पलायनवादी संस्कृति की वजह से ही हालात जस के तस बने हुए हैं. विदेशों में बसने वाले लोग जब वहां की मानवतावादी सभ्यता में रच बस जाते हैं तो सदा के लिए वही के होकर रह जाते हैं क्योंकि उन देशों में सामाजिक सुरक्षा न्याय और परस्पर सहयोग की उत्कृष्ठ व्यवस्था कायम है जिसमे उन्हें अपनी पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित नजर आता है इन देशों में रहने वाले ये लोग कभी यह नही सोचते कि हमारा देश ऐसा क्यों नही बन सकता ? दया मनुष्य की करुणा को नष्ट कर देता है दान की मनुवृत्ति परस्पर सहयोग की भावना को खत्म कर देती है पुण्य की मानसिकता से परिवर्तन की आवश्यकता खंडित होती है और परोपकार की सोच से एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के प्रति कर्तव्य की सार्थक चेस्टा नष्ट हो जाती है इसलिए मानवता के विकास में करुणा सहयोग परिवर्तन और कर्तव्य की अहमियत है इसके उलट दान दया पुण्य और परोपकार की मानसिकता मानवता के मार्ग में बाधक ही साबित होती है. अगर हम मानवता के वास्तविक मूल्यों को पुनर्स्थापित करना चाहते हैं तो हमे मानवता के बुनियादी उसूलों को ही अपना धर्म बनाना होगा जिसमे एक इंसान का दूसरे इंसान के प्रति कर्तव्य सर्वोपरि होगा तभी हम समता बन्धुता न्याय सत्य प्रेम सहयोग और मानवीय संवेदनाओ पर आधारित उत्कृष्ट सामाजिक व्यवस्था कायम कर पाएंगे और इस नई मानवीय व्यवस्था में दया दान पुण्य और परोपकार के लिए कोई जगह नही होगी.

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