एक नास्तिक की लड़ाई किसी ईश्वर से नही है - तर्कशील भारत

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Wednesday, October 30, 2019

एक नास्तिक की लड़ाई किसी ईश्वर से नही है


एक नास्तिक की लड़ाई 

किसी ईश्वर से नही है 
जो है ही नही वह उससे क्यों लड़ेगा ? 
एक नास्तिक को पता है 
की जिस दिन वह मरेगा 
उसका अंत हो जाएगा
उसके सपने
उसके जज्बात
और जो उसने हासिल किया
सब कुछ समाप्त हो जाएगा.

एक नास्तिक को
जीवन का मोल मालूम है
इसलिए वह
हमेशा अपने जीवन को
उत्कृष्ट बनाने का जतन करता है
वह सृष्टि के सारे रहस्यों को
इसी जीवन मे 
जान लेने का प्रयत्न करता है
और वह चाहता है कि 
उसकी ये दुनिया
जिसमे वह जी रहा है
साँसे ले रहा है
वह बेहतर हो जाये
सुंदर हो जाये
और सनातन बनी रहे
इसलिए एक नास्तिक 
हमेशा प्रकृति को
मानवता के अनुकूल बनाने की
जद्दोजहद करता है

वह चाहता है 
शोषण का अंत हो
पाखण्ड का नाश हो
इंसानियत कायम हो
हैवानियत बाकी न रहे
मुस्कुराहटें हो चारों ओर
और उदासियाँ भी समाप्त हो जाएं

नास्तिक की इन पवित्र भावनाओं के उलट
एक आस्तिक की 
भावनाएं संवेदनाएं 
और उसकी मनोकामनाएं
उस खुदा ईश्वर गॉड की गुलाम होती हैं
जिसे उसने कभी देखा ही नही
जिसे उसने कभी परखा ही नही

धार्मिक गिरोहों के चक्रव्यूह में फंसे
एक आस्तिक को भरोसा है कि
जिस दिन वह मरेगा
उस दिन उसकी आत्मा 
बाहर निकलेगी
और परमात्मा की ओर 
प्रस्थान कर देगी
उसे फिर से नया जीवन मिलेगा
जो उसके 
पिछले जन्मों के कर्मफल पर आधारित होगा
या उसे तिरछी नजरों वाली 72 हूरें मिलेंगी 
जो उसे शराब से नाहलायेंगी 
एक आस्तिक के लिए ये दुनिया
एक कैदखाना है
जिससे निकल कर 
उसे उस नई दुनिया तक का सफर करना है
जहां उसके लिए कोई काम न होगा
वहां वह खुल कर हरामखोरी कर सकता है
खुल कर अय्याशी कर सकता है 
जी भर कर शराब पी सकता है
काम कुछ होगा नही
वहां तो बस
अनंतकाल तक
आराम ही आराम है

जिन लोगों को 
कामचोरी कर हरामखोरी करने का 
मजा मालूम है
उन्हें हर हाल में और
किसी भी कीमत पर 
वह जन्नत चाहिए
जहां बस आराम ही आराम है
न कमाने की टेंशन
न खाने की फिक्र
बस ऐश ही ऐश
इस लिए 
एक आस्तिक 
जो इस दुनिया को 
आजमाइश का अड्डा समझता है
और मानता है कि 
इस दुनिया की हर एक चीज का नियंत्रण 
खुदा के हाथों में है
वह 
गरीबी बेबसी अन्याय
भूख कुपोषण और अवहेलनाओं को
खुदा का अजाब मानकर स्वीकार करता है
वह मानता है कि उसका प्रभु
अन्धन को आंख दे सकता है
कोढ़ी को काया दे सकता है 
बांझन को पुत्र दे सकता है 
और निर्धन को माया दे सकता है
यानी दुनिया मे जो भी विसमताएँ हैं 
उन्हें दूर करने की तमाम जिम्मेदारियों से
एक आस्तिक छुटकारा पा लेता है
अब चाहे कोई भूख से तड़पता रहे
सड़कों पर भटकता रहे
चिलचिलाती धूप में 
दो बूंद पानी की आस में
मिलों का सफर करे
कोई गंदगी में अपनी जिंदगी घसीटता फिरे
कोई दो जून की रोटी के लिए बिलखता फिरे
कोई बाढ़ से मरे या बीमारी से
कोई आतंक से मरे या लाचारी से
इन ईश्वरवादियों को कोई फर्क नही पड़ता
क्योंकि सब प्रभु की माया है
सब खुदा की नौटंकी है
जो यहां जितना बदहाली में मरेगा
मरने के बाद ईश्वर उसका इंसाफ करेगा

यही से सारी समस्याएं शुरू होती हैं
और यहीं से
एक नास्तिक की लड़ाई शुरू होती है
लेकिन
एक नास्तिक की यह लड़ाई 
किसी ईश्वर से नही है 
जो है ही नही वह उससे क्यों लड़ेगा ? 

समाज की तमाम विसमताये
आस्तिकों की सड़ी हुई 
मानसिकता से ही तैयार हुई है
और वह 
इस भयंकर त्रासदी को
खुदा का इंसाफ मानकर 
कभी भी कुछ भी 
बदलने की कोशिश नही करता
एक आस्तिक
गरीबी और बेबसी से सराबोर
दुनिया की बदरंग तक़दीर और तस्वीर को
बदलने के लिए 
खुद से
कभी भी कुछ भी नही करता

यही से सारी समस्याएं शुरू होती हैं
और यहीं से
एक नास्तिक की लड़ाई शुरू होती है
लेकिन 
एक नास्तिक की यह लड़ाई 
किसी ईश्वर से नही है 
जो है ही नही वह उससे क्यों लड़ेगा ? 

क्योंकि उसकी नजर में
 ये सब तो रंगमंच की कठपुतलियां है
जिसकी डोर
ऊपर वाले के हाथ मे है
तब वह 
किसी उदास आंखों के मर्म को क्यों जाने
किसी रोती हुई आंखों को क्यों पोछे
किसी लाचार कंधों का सहारा क्यों बने
किसी बुझते हुए दिए को वह रौशन क्यों करे
हजारों मील
भटकते हुए मासूम बचपन के लिए
वह दो कदम भी क्यों चले
एक आस्तिक का पूरा जीवन
खयाली किताबों के 
खोखलें पन्नों से आगे नही बढ़ पाता
वह जब भी इन किताबों पर शक करता है 
खतरनाक गिरोहों के कान खड़े हो जाते है
और वे उस नादान आस्तिक के सामने
जहालत की दीवार बन कर खड़े हो जाते हैं 

जिन्हें अगला जन्म सुधारना है उन्हें
इस दुनिया से जल्द छुटकारे की आस है
जिन्हें जन्नत जाना है उनके लिए भी 
यह जन्म यह जीवन यह दुनिया 
सब बोझ है
लेकिन
इस बोझ को त्यागने को कोई तैयार नही
मतलब 
दोनों हाथों में लड्डू चाहिए
यहां भी वहां
इस जन्म में भी
और मरने के बाद भी
लेकिन इस दुनिया को
बेहतर बनाने की
कोई योजना 
इन आस्तिकों के पास नही
इस दुनिया की सारी विसमताएँ 
परेशानियां भूख शोषण कुपोषण और अन्याय
सब ईश्वरवादियों की वजह से ही है
नास्तिकों ने हमेशा हर युग मे
धार्मिक गिरोहों द्वारा
फैलाई गंदगी ही साफ की है
इनके द्वारा बर्बाद की गई दुनिया को
हर युग मे
नास्तिकों ने ही 
संवारा है 
इसलिए आज की दुनिया पर
पहला हक 
नास्तिकों का ही है

आस्तिकों ने
हमेशा कल्पना के घोड़े ही दौड़ाए हैं
स्वर्ग नरक
ईश्वर अल्लाह
गॉड यहोवा
भूत पिशाच
आसमानी किताबे
रोजा नमाज
व्रत त्योहार
जादू टोना
रोना धोना
झूठ लूट और पाखंड
मूर्ख बनाये रखने के षड्यंत्र
कल्पना की इन पुरातन उड़ानों से भी
एक नास्तिक को कोई दिक्कत नही होती
वो खूब खयाली पुलाव पकाएं
खूब हवाई सफर करें
दूध और शहद में नहाएं
किसी को कोई फर्क नही पड़ता
लेकिन जब 
आस्तिकों के इस खयाली पुलाव के नाम पर
तरह तरह के धार्मिक गिरोह पनपने लगते हैं
और ये तमाम गिरोह 
तरह तरह के पाखण्डों को 
धर्म बता कर 
निरीह जनता को लूटने लगते हैं
तब समाज के कुछ बुद्धिवादी लोगों को
जिन्हें
धार्मिक गिरोहों के
खतरनाक मंसूबों का
एहसास हो जाता है
वे शोषण की इस संस्कृति का 
विरोध शुरू करते है
जिन्हें शोषणवादी धार्मिक गिरोह
नास्तिक कहते हैं 
जिन्हें मरने के बाद के जीवन पर भरोसा है
उन्हें 
मरने से पहले की जिंदगी का 
मोल नही मालूम
इसलिए वे 
इस जीवन की बेहतरी से ज्यादा
परलोक सुधारने की कसरत करते हैं
यही से सारी समस्याएं शुरू होती हैं
और यहीं से
एक नास्तिक की लड़ाई शुरू होती है
लेकिन एक नास्तिक की यह लड़ाई 
किसी ईश्वर से नही है 
जो है ही नही वह उससे क्यों लड़ेगा ? 

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