संविधान की मोब्लिंचिंग - तर्कशील भारत

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Sunday, September 8, 2019

संविधान की मोब्लिंचिंग


देश की राजधानी दिल्ली में पिछले दिनों जो हुआ उससे आपकी यह धारणा बदल जाएगी कि दिल्ली दिल वालों का शहर है एक महिला को जो 8 महीने की गर्भवती थी उसे बच्चा चोर समझ कर करीब सौ लोगों की भीड़ ने पीटना शुरू किया डेढ़ घण्टे तक भीड़ उसे पीटती रही पुलिस को खबर लगी तब उस वहशी भीड़ से उस महिला की जान बच पाई.
शर्मनाक बात यह की औरत गूंगी बहरी भी थी जो अपने बचाव में कुछ बोल भी नही सकती थी.

लक्ष्मी नाम की इस अभागी महिला को किसी ज्योतिष ने बताया था कि वह अगर अपने दुखों से मुक्ति चाहती है तो एक बार उसे लोगों से चंदा लेकर वैष्णो देवी की यात्रा करनी चाहिए इसी यात्रा के लिए वह चंदा लेने घर घर घूम रही थी इसी दौरान उसे बच्चा चोर समझ लिया गया और उसे मारने के लिए 100 लोगों की भीड़ जमा हो गई लोग उसे पीटते रहे और इस दौरान कुछ लोग वीडियो बनाने में लगे रहे 100 से ज्यादा लोगों की इस भीड़ में एक आदमी भी ऐसा नही था जिसके दिल मे थोड़ी सी भी संवेदनाएं बची हों एक गूंगी बहरी औरत जो आठ महीने की गर्भवती थी रहम की भीख मांगती रही लेकिन उस भीड़ में शामिल एक आदमी का भी दिल नही पसीजा.

 इस घटना के अगले ही दिन 5 तारीख की रात को दिल्ली की एक बस में एक युवक को चोरी के शक में जमकर पीटा जाता है फिर उसे निवस्त्र कर चलती बस से नीचे फेंक दिया जाता है.

इस तरह की तमाम घटनाओं में भीड़ का जो चरित्र हमें नजर आता है वह बेहद डरावना है बीते कुछ समय से पूरे देश मे इस तरह की जो वारदातें हो रही हैं वह उस भयावह भविष्य का ट्रेलर हैं जहां कोई सुरक्षित नही बचेगा वो भी नही जो आज लिंचिंग कि इस भीड़ का हिस्सा हैं जब उनके किसी सगे संबंधी का ऐसा ही कोई वीडियो वाइरल होगा तब उन्हें इस बात का एहसास होगा कि भीड़तंत्र क्या चीज है.

आज हम सभी को यह गंभीरता पूर्वक सोचना होगा कि हम कहाँ जा रहे हैं ? कैसा समाज बना रहे हैं ?

गौर करने वाली बात है कि इस भीड़तंत्र का हर आदमी सदियों पुरानी उस धार्मिक व्यवस्था का हिस्सा है जिसमे पग पग पर ईश्वर अल्लाह की अवधारणा मौजूद है यह वही भीड़ है जो मंदिर मस्जिदों मजारों की चौखटों पर खड़ी मिलती है तीर्थयात्रा त्योहार तरह तरह के धार्मिक पाखण्डों में डूबी इस भीड़ को धार्मिक गिरोहों ने ऐसा वहशी जानवर बना दिया है जिसकी संवेदनाएं मर चुकी हैं.

जानवरों में भी एक तरह की सामूहिकता देखने को मिलती है खूंखार जंगली जानवरों का झुंड कभी भी अपनी ही प्रजाति के किसी दूसरे जानवर की लिंचिंग नही करता लेकिन इंसान ऐसा कर रहा है वह अपनी ही प्रजाति के दूसरे इंसानों का झुंड में शिकार कर रहा है

इस भीड़ का हर सदस्य यह मानता है कि सब कुछ ऊपर वाला करता है वह यह भी मानता है कि सब कुछ भाग्य में लिखा हुआ है और वह इस बात पर भी यकीन रखता है कि लिखे को कोई टाल नही सकता लेकिन यह सब मानते हुए भी वह अपने ऊपर वाले के सिस्टम की धज्जियां उड़ा रहा है भाग्य को दुर्भाग्य में बदल रहा है और अपने तथाकथित ऊपर वाले के लिखे को मिटा भी रहा है.

यह हमारे सिस्टम की विफलता है और हमारे धर्म की असफलता क्योंकि दोनों मिलकर भी इंसान के अंदर इंसानियत का विकास नही कर पाए.

इस भीड़ तंत्र द्वारा की जा रही तबाही का जिम्मेदार कौन है ? इसका जवाब किसी के पास नही है.

सदियों से इंसानी समाज को धर्म के नाम पर चूसने वाली तमाम धार्मिक संस्थाएं इंसान को हैवान बनने से नही रोक पाईं क्योंकि हमारे समाज ने न्याय की परिभाषा को कभी समझा ही नही हमने इंसानों में जातियां बनाई जातियों में उपजातियां पैदा की फिर उनमें परंपराओं और मान्यताओं की फूट डाली जिसकी वजह से समाज में परस्पर विश्वाश सहयोग समानता करुणा और सदभाव की परंपरा का विकास ही नही हो पाया और इन सामाजिक विद्रूपों को दूर करने की ओर किसी भी सरकार ने ईमानदारी से काम भी नही किया जिसकी वजह से आज समाज कई स्तरों पर टुकड़े टुकड़े हो चुका है संविधान की प्रस्तावना में जिन भारत के लोगों की बात की गई है वे भारत के लोग भारत मे कही रहते ही नही संविधान की प्रस्तावना की वो अवधारणा जो हमे भारतीय होने की बात करती है 73 वर्षों बाद आज भी मात्र परिकल्पना ही है.

हम भारत के लोग तब तक नही बन पाएंगे जब तक ऊंच नीच धर्म मजहब अमीरी गरीबी जाती नस्ल भाषा और क्षेत्र के नाम पर बंटे रहेंगे.

 सामाजिक विकारों के लिए सबसे बड़ी वजह गलत जानकारियां होती हैं जो हमे संस्कारों से प्राप्त होते हैं चाहे वह धार्मिक मान्यतायें हो या आज के पूंजीवादी मीडिया द्वारा परोसी जा रही खबरें सब प्रोपगेंडा का हिस्सा होते हैं जो हमे झूठ के आवरण में लपेटे रखते है सत्ता धर्म और मीडिया के पूंजीवादी तिलस्म में हम अपने देश की वह असली तस्वीर नही देख पाते जिसका हम खुद हिस्सा होते हैं ऐसे में सामाजिक व्यवस्था छिन्न भिन्न होकर भीड़ में तब्दील हो जाती है जिसे धर्म के मजबूत डंडे से हांका जाता है राजनीति मीडिया और धर्म द्वारा भीड़ की मानसिकता में घृणा की विस्फोटक कुंठाओं को इंस्टाल किया जाता है और फिर भीड़ को किसी के खिलाफ खड़ा कर दिया जाता है तब भीड़ खुद ही तंत्र बन जाती है और खुद ही अपनी कुंठाओं को शांत करने लगती है इसी को भीड़ तंत्र कहते हैं सत्ता के इशारों पर यही भीड़ भेड़ और भेड़िया दोनों की भूमिका अदा करती है.

इसी भीड़तंत्र ने कुछ दिनों पहले असम में मां और बेटे को मार डाला था.

पिछले कुछ सालों में इसी भीड़ तंत्र ने न जाने कितने निर्दोषों को मौत के घाट उतार दिया.

यह उस नए भारत की तस्वीर है जो चाँद पर पहुंचने का जश्न मना रहा है यह उस इंडिया की हकीकत है जो अब डिजिटल हो चुका है यह उस हिंदुस्तान की सच्चाई भी है जहां सबसे ज्यादा करोड़पतियों रहते हैं.

यह घटनाएं पहले भी हुआ करती थीं लेकिन तब कभी कभार घटने वाली इस तरह की घटनाओं के खिलाफ समाज का एक बड़ा हिस्सा उठ खड़ा होता था लेकिन आज यह घटनाएं इतनी आम हो चुकी हैं की प्रतिदिन मोब लिंचिंग के नाम पर जिंदगियों को तबाह किया जा रहा है बुजुर्गों बच्चों औरतों तक को भीड़ द्वारा कुचला जा रहा है.

आखिर अचानक इतनी नफरत क्यों पैदा हुई एक समाज खूनी भीड़ में कैसे तब्दील हो गया वो समाज जो इतना धार्मिक है कि उसे कण कण में भगवान नजर आता है फिर वह इंसान में इंसान क्यों नही देख पाता ? वो कौन सी कुंठा है जो किसी निरीह इंसान को पीट पीट कर मार डालने से ही शांत होती है ? यही कुंठा उन भ्रष्ट नेताओं के प्रति क्यों नही दिखाई देती जो समाज को सरेआम लूट रहे हैं ? जो समाज में घृणा के बीज बो रहे है जनमानस को एक दूसरे से लड़ा रहे हैं ?

सरकारें किस लिए होती हैं प्रशाशन व्यवस्था मीडिया और कानून किसलिए होता है अगर इन सबने मिलकर संविधान की प्रस्तावना को ईमानदारी से समझा होता तो वो वास्तविक लोकतंत्र कायम हो चुका होता जिसकी नींव में हमारी कई पीढ़ियों का बलिदान शामिल है.

आज भारत के लोग लोकतंत्र का नही भीड़तंत्र का हिस्सा हो चुके है जो भारत के ही लोगों की मोब्लिंचिंग कर रहे हैं.

क्या ये वही भारत है जिसकी परिकल्पना हमारे महापुरुषों ने की थी ? क्या यह वही हिंदुस्तान है जिसके लिए न जाने कितने भगत सिंह फांसी के तख्ते पर टांगे गये थे ? क्या यह वही इंडिया है जिसकी नींव में हजारों शहीदों की कुर्बानियां दफन हैं ?

ये सवाल अगर आपको परेशान नही करते तो समझिए कि आप भी उसी भीड़ तंत्र का हिस्सा है जिसके चंगुल में फंसकर अब तक न जाने कितने बेमौत मारे जा चुके हैं.

जिस दिन आपका बच्चा आपकी बीबी आपका भाई या आपका बाप ऐसे ही किसी इंसान नुमा जानवरों के झुंड में फंस कर जिंदगी की भीख मांगते हुए किसी वीडियो में दिखेगा उस दिन आप किसे दोष देंगे ? उस भीड़ को जिसका हिस्सा कभी आप भी थे ? या अपने भाई बाप मां और बेटे को कुसूरवार कहेंगे जो इस वहशी भीड़ का शिकार हुए ?

सोचिएगा जरूर

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