जब मैं छोटी थी - तर्कशील भारत

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Wednesday, September 25, 2019

जब मैं छोटी थी


    जब मैं छोटी थी                                                                                
बहुत हंसती थी 
खिलखिलाती थी 
इठलाती थी 
 मां की आँचल से बंधी 
 मेरी वह छोटी सी दुनिया 
 आज की इस ग्लोबल दुनिया से 
बिल्कुल अलग थी 
वहां केवल खुशियां थी 
उम्मीदें थी 
हंसी ठिठोली के साथ 
 कुछ डांट और फटकार भी थी 
ममता में सराबोर 
उसके धीमे तमाचे 
मुझे सही और गलत का 
एहसास करा देते थे 
मेरी निर्बाध उदंडता पर 
लगाम लगा देते थे 
जब मैं बड़ी हुई 
मेरी सोच समझ सपने भी 
बड़े हुए 
साथ ही मेरे लिए 
 मेरी माँ की चिंताएं भी 
बड़ी हो गई 
मां का आँचल छूटा 
और मेरे लिए खींची गई 
अनगिनत रेखाएं 
 मेरे सामने खड़ी हो गईं 
ये अनगिनत रेखाएं 
अदृश्य थी 
लेकिन थी बहुत कठोर... 
 जल्द ही इन रेखाओं के साथ 
मैंने एडजस्ट करना सीख लिया 
वैसे ही जैसे बचपन मे 
मां के आंचल के साथ 
मैं एडजस्ट हो गई थी 
इन अनगिनत रेखाओं के साथ 
अनगिनत चिंताएं भी थी 
जो अब मेरी माँ से ज्यादा 
मुझे सता रही थी 
फिर जल्द ही 
इन चिंताओं के साथ भी मैंने 
एडजस्ट करना सीख लिया 
मैं चाहती थी 
मैं भी डॉक्टर बनूं 
मुफ्त में सबका इलाज करूँ 
मैं भी ड्राइवर बनूँ देश की सैर करूँ 
मैं भी पायलट बनूं 
दुनिया को ऊंचाइयों से देखूं 
मैं भी कल्पना और सुनीता बनूं 
अंतरिक्ष की सैर करूँ 
लेकिन जल्द ही 
 मुझे पता चला कि 
मुझे क्या बनना है ? 
मेरी शादी तय कर दी गई 
मैं डॉक्टर नही 
दुल्हन बन गई 
पायलट की जगह 
 किसी की पत्नी बना दी गई 
वक्त ने मुझे 
और भी बहुत कुछ बना दिया 
किसी की भाभी बनी 
किसी की बहू 
किसी की देवरानी तो 
किसी की जेठानी बनी 
तरक्की हुई तो जल्द ही 
 माँ भी बन गई 
अब मेरी गोद में 
मेरी एक बेटी है 
जो धीरे धीरे बड़ी हो रही है 
अभी वह छोटी है 
बहुत हंसती है 
खिलखिलाती है 
इठलाती भी है 
 मेरे आँचल से बंधी 
 मेरी बेटी की यह छोटी सी दुनिया 
 आज की इस ग्लोबल दुनिया से 
बिल्कुल अलग है 
यहां केवल खुशियां हैं 
उम्मीदें हैं 
हंसी ठिठोली के साथ 
 कुछ डांट और फटकार भी है 
उसकी पीठ पर पढ़ने वाले 
ममता में सराबोर मेरे धीमे तमाचे 
उसे सही और गलत का 
एहसास करा देते हैं 
और उसकी निर्बाध उदंडता पर 
लगाम लगा देते हैं 
अब वह बड़ी हो रही है 
उसकी सोच समझ सपने भी 
बड़े हो रहे है 
साथ ही 
 उसके लिए मेरी चिंताएं भी 
बड़ी हो रही हैं 
सोचती हूँ 
जब मेरा आँचल छूटेगा 
और 
अनगिनत अदृश्य कठोर रेखाएं 
 उसके सामने खड़ी होंगी 
तब वह क्या बन पाएगी ? 

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