जो तठस्थ है वो अपराधी है - कविता - तर्कशील भारत

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Saturday, August 10, 2019

जो तठस्थ है वो अपराधी है - कविता


दौरेवक्त वह भी था
जिसमे जिंदा थे कुछ चेहरे
जिन्होंने दिखाए थे 
भविष्य के हसीन सपने
जिन्होंने बनाये थे
कुछ नए कीर्तिमान
दस्तूर और संविधान
इनमे कुछ क्रांतिवीर थे
तो कुछ कायर भी थे
कुछ भगत सिंह थे
तो कुछ डायर भी थे
इतिहास के वो नायक और खलनायक
दोनों आज हमारे बीच नही हैं

क्योंकि 
बीता हुआ वह दौरेवक्त गुजर चुका है
हर आदमी उस वक्त का अब मर चुका है

आज जिंदा हैं तो
उनकी कुछ तस्वीरें
जिनमें से कुछ पर
हम फूल चढ़ाते है
और कुछ पर 
आज हम थूकते हैं

आज की दुनिया 
और इस दुनिया के
सारे नियम कायदे कानून
सारी विसंगतियां समस्याएं
गम सितम और रुदन
सब उन्ही लोगों की देन है 
जो हम से पहले जिंदा थे
जिन्होंने बनाये थे कुछ उसूल
नियम लोकतंत्र और कानून

उस दौरेवक्त मे
वे भी थे
जो सुख भोग रहे थे
और वे लोग भी थे 
जो दाने दाने को तरस रहे थे
वे भी थे
जो हालात बदलने की चाह रखते थे
और वह भी थे
जिन्होंने परिवर्तन को रोकने में
अपनी पूरी ताकत लगा दी थी

उस दौरेवक्त मे
वे लोग भी थे
जिनमे औरों के लिए 
कुछ कर गुजरने का
जज्बा था
और वे भी थे
जिन्हें औरों को लूटने की आदत थी

इतिहास के उस दौर में
वे लोग भी थे
जो हर हाल में
क्रांति चाहते थे
जो पूरे निजाम को 
बदल देना चाहते थे
वर्षों के 
दुर्भाग्य को मिटा देना चाहते थे
नई ऊर्जा के साथ 
नई संस्कृति को 
बना देना चाहते थे
वे चाहते थे की
सभ्यताओं का निर्माण करने वाला मजदूर
बेघर न रहे
सभ्यताओं को सभ्य बनाने के लिए
इंसानों का तन ढंकने वाला बुनकर
नंगा न रहे
और 
सभ्यताओं का पोषण करने वाला किसान
खुद भूखे पेट न सोए
यही वे लोग थे 
जिनकी मजारों पर
हर बरस लगते हैं मेले
और जिनकी तस्वीरों पर
हर बरस
चढ़ाए जाते हैं
किस्म किस्म के फूल

उसी दौरेवक्त वक्त में
वे लोग भी थे
जो सत्ता की चाटुकारिता में लीन थे
जिन्होंने उस दौर में भी
अपने लिए मौके तलाश लिए थे
और हर क्रांतिवीर की राहों में
कांटे बिछा दिए थे

जो नही चाहते थे कि 
शोषण का अंत हो
गरीबी न रहे
अत्याचार समाप्त हो 
और अन्याय भी खत्म हो जाये

न्याय और समानता की अवधारणा के विरुद्ध
षड्यंत्रों में लगे ये लोग
अराजकता और विसमता के पक्ष में भी खड़े थे
वे चाहते थे कि
सत्ता और धर्म की गुलामी में जुटा समाज
हमेशा शोषणवादी ताक़तों का 
मानसिक गुलाम बना रहे
और 
इन दोनों की चाटुकारिता में
हरामखोरों का पेट भरता रहे

यही वह वर्ग था
जो दमन और शोषण के समर्थन में खड़ा था
यही वो वर्ग था 
जो समाज को 
वक्त में और पीछे 
ले जाने की जिद पर अड़ा था

इतिहास के पन्नो में
आज वे लोग भी जिंदा है
जो लुटेरों के साथ थे
लेकिन 
उनकी चिताओं पर आज
कोई मेला नही लगता
और न ही 
चढ़ाए जाते हैं 
किस्म किस्म के फूल

चाटुकारिता के उस दौर में 
हुए थे जो मशहूर
जीते थे जिन्होंने तमगे
कमाया था नाम और शोहरत
दलाली में
इकट्ठी की थी जिन्होंने
ढेर सारी दौलत
आज हम उन्हें गद्दार कह कर
नवाजते हैं 
आज हम 
उन्हें कायर और दलाल कहते हैं
यही उनका असली इनाम है
और यही उनके लिए
वक्त का इंसाफ भी है

उस दौरेवक्त मे
कोई फांसी पर टांगा गया
कोई गोली से उड़ा दिया गया
किसी ने अपनी पूरी जिंदगी
जेल की काल कोठरी में बिता दिया
किसी ने वतन के लिए
अपना परिवार दाव पर लगा दिया

और उसी दौरेवक्त में
किसी ने चाटुकारिता में इनाम जीते
किसी ने मुखबिरी में तमगे पाये
कोई नेता बना कोई अभिनेता बना
कोई कायदे आजम हुआ कोई महात्मा बना

शोषक और शोषितों के बीच 
क्रांतिवीरों और चाटुकारों से अलग
एक वर्ग और भी था
जो इतिहास के उस दौर में
तठस्थ था
तमाशबीन था
निष्क्रिय था
जो
जबान होते हुए
गूंगा बना हुआ था
आंखे होते हुए भी 
अंधा बना हुआ था
कान होते हुए भी
बहरा बना हुआ था

जब चारों ओर
दर्द आंसू और रुदन के सिवा कुछ न था
जब चारो ओर 
जुल्म सितम और षड्यंत्रों के सिवा कुछ न था
तब यह वर्ग
अपनी जिंदगी को जीने में व्यस्त था
खुद के बनाये दायरे में मस्त था
उसकी खिड़कियां तो खुली थी
लेकिन दरवाजे बंद थे
इसलिए
वह घर से निकला ही नही
उसकी आंखें खुली थी
लेकिन 
उसने कुछ देखा ही नही
वह खुश था सुखी था संतुष्ट था
इसलिए वह पूरी तरह शांत था
क्योंकि
परिस्थितियां उसके प्रतिकूल थीं
और हालात उसके अनुकूल थे

वह खुश था
तठस्थ था
तमाशबीन था
क्योंकि 
उसकी संवेदनाएं खाली थी और
पेट भरा हुआ था

इसलिए मैं इतिहास में जाकर
ढूंढता हूँ हर उस सख्स को
जिसके सामने 
होता रहा इंसानियत का कत्ल
लेकिन 
वह तमाशबीन बना रहा
और सब कुछ देखते हुए भी
तठस्थ बना रहा

क्रांतिवीर लड़ते रहे मरते रहे
लटकाए जाते रहे
गोली खाते रहे
लेकिन वो तठस्थ बना 
बस देखता रहा

मैं इतिहास में जाकर
थूकता हूँ 
हर उस सख्स पर
जिसके सामने 
गूंजती रहीं 
बेबसों की चीखें
लुटती रही अस्मते
चीखती रही औरतें
सिसकती रहीं माएँ
लेकिन बहरे कानों तक 
वह सदायें कभी पहुंच ही न पाई
जिसके सामने
मरते रहे इंसान
जलते रहे मकान
डूबती रही कश्तियाँ
उजड़ती रही बस्तियां
बिलखते रहे लोग
बिखरते रहे ख्वाब
छूटते रहे अपने
और टूटते रहे सपने
लेकिन हर हाल में
वो बस तठस्थ बना रहा

इसलिए मैं समझता हूँ
हर दौरेवक्त का सबसे बड़ा अपराधी
वही होता है जो
अपने दौर की विसमताओं के विरुद्ध
खामोशी की चादर ओढ़े सोए रहता है
और तठस्थ होकर 
तमाशबीन की भूमिका अदा करता है

आज की दुनिया मे
जितनी भी विसमताएँ हैं सब 
उन्ही लोगों की देन है
जो इतिहास के 
हर पड़ाव पर
तठस्थ थे
तमाशबीन थे 
गूंगे बहरे और अंधे थे

बीता हुआ वह दौरेवक्त गुजर चुका है
हर आदमी उस वक्त का अब मर चुका है

दौरे वक्त यह भी गुजर जाएगा 
तब इस वक्त का कोई नजर न आएगा

बाकी रहेंगी
इस दौर की 
दर्दो सितम की वो 
जिंदा तस्वीरें
जिन्हें देखकर
रोयेंगी
आने वाली पीढियां
और इतिहास में जाकर हमसे पूछेंगी
की जब उठ रही थी चीखें
तब तुम कहाँ थे ?
डूब रही थी कश्तियाँ
उजड़ रही थी बस्तियां
तब तुम कहाँ थे
बिखर रहे थे ख्वाब
और टूट रहे थे सपने
तब तुम कहाँ थे ?

जब झूठ का शोर था
दमन का जोर था
व्यथाओं का दौर था
और दर्द चारों ओर था
तब तुम कहाँ थे ?
उत्पीड़न की सदायें गूंज रही थी
चारों दिशाओं में
तब तुम कहाँ थे ?
अन्याय और आतंक फैला था
फ़िज़ाओं में
तब तुम कहाँ थे ?

जब
अपराधी भयमुक्त थे
लोग भययुक्त थे
और
भेड़िये उन्मुक्त थे
तब तुम कहाँ थे ?

आने वाली पीढियां
इतिहास में आकर
थूंकेंगी तुम पर
मुझ पर
और हर उस आदमी पर
जो आज के इस दौरेवक्त में 
तठस्थ है तमाशबीन है और 
मूकदर्शक बना हुआ है

आने वाली पीढियां 
इतिहास में जाकर
पूँछेंगी 
हर आदमी से कुछ सवाल
बार बार
जिनका जवाब 
देने के लिए 
इस दौरे वक्त का
कोई भी रहनुमा
जिंदा न होगा

लेकिन जिंदा होंगी
जिंदा लोगों की 
वो खूबसूरत तस्वीरें
जिनपर चढ़ाए जाएंगे 
किस्म किस्म के फूल
और इन खूबसूरत तस्वीरों से अलग
कुछ बदसूरत तस्वीरें 
मेरी और तुम्हारी भी होंगी
जिनपर
थूक रहे होंगे लोग

और पूछ रहे होंगे
वही सवाल बार बार
की जब 
सत्ता धर्म और मीडिया का 
घिनौना गठजोड़ 
मिलकर
शोषम दमन और गुलामी की
बेड़ियों को मजबूत करने में लगा था
तब तुम कहाँ थे

जब 
सामाजिक धरातल पर
खुदा ईश्वर और गॉड के खाद पानी से
घृणा के बीज बोए जा रहे थे 
और उन बीजों से निकलने वाली कोपलों पर
हिंसा और दंगों की फसलें उगाई जा रही थी
तब तुम कहाँ थे ?

जब चारों ओर 
उदासियों का भयंकर कोहरा पसरा हुआ था
वातावरण में नफरतों का जहर घोला जा रहा था
सत्य की राह पर चलने वाले अकेले जा रहे थे
अमनपसंद लोग हाशिये पर धकेले जा रहे थे
तब तुम कहा थे ?

आने वाली पीढियां 
इतिहास में आकर
पूँछेंगी 
आज के हर आदमी से कुछ सवाल
बार बार
जिनका जवाब 
देने के लिए 
इस दौरे वक्त का
कोई भी इंसान
जिंदा न होगा

जिंदा होंगी
इस दौर की कुछ तस्वीरें
जिनमें से कुछ पर 
चढ़ाए जाएंगे 
किस्म किस्म के फूल
और कुछ पर
थूक रहे होंगे लोग

क्योंकि 
जो अपने सुख के लिए
औरों को दुखी रखते है
वक्त देता है उन्हें कायर होने का खिताब

जो अपने सुख के लिए
चाटुकारिता में लीन होते हैं
वक्त करता है उनका भी हिसाब

जो धर्म की आड़ में छुपाते हैं अपने गुनाह
वक्त पढ़ता है उनकी भी किताब

दूसरी ओर...
जो सत्य प्रेम और परिवर्तन की राह में 
मिटने को तैयार होते हैं
वक्त उनकी सम्मानजनक यादों को 
हमेशा जिंदा रखता है

जो मानवता के आगे 
दौलत और शोहरत की परवाह नही करते
वक्त उनके व्यक्तित्व को 
बड़े जतन से सहेज कर रखता है

और जो लोग
क्रूरता के दौर में भी
अपनी संवेदनाओं को बचा लेते हैं
वक्त उनकी वेदनाओं को
अगली पीढ़ी तक पहुंचा देता है

इसलिए मुखर होकर 
झूठ घृणा शोषण और पाखण्डों के विरुद्ध
लड़ते रहना ही
आज के दौर की सबसे बड़ी जरूरत है

वर्ना आने वाली पीढियां
थूंकेंगी मुझपर 
तुम पर और उन सभी लोगों के मुंह पर
जो आज के इस दौरेवक्त मे भी 
तठस्थ हैं तमाशबीन हैं 
और मूकदर्शक बने हुए हैं

इसलिए

मैं समझता हूँ
आज जो तठस्थ है
सबसे बड़ा अपराधी वही है
सबसे बड़ा अपराधी वही है

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